
उत्तराखंड में इको-सेंसिटिव जोन की समीक्षा: फूलों की घाटी को बचाने की कवायद तेज
उत्तराखंड के अधिकारियों ने हाल ही में राजाजी और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास प्रस्तावित इको-सेंसिटिव जोन (इको-सेंसिटिव जोन) की उच्चस्तरीय समीक्षा की है। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में दर्ज इस घाटी की अनूठी जैव विविधता और अल्पाइन घास के मैदानों को संरक्षित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व का अभिन्न हिस्सा
उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित यह राष्ट्रीय उद्यान अपनी अद्वितीय प्राकृतिक सुंदरता के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है। इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) का दर्जा प्राप्त है। यह पार्क 'नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व' के दो कोर जोन में से एक है (दूसरा नंदा देवी नेशनल पार्क है)। फूलों की घाटी का शांत और मनमोहक परिदृश्य नंदा देवी नेशनल पार्क के बीहड़ और पथरीले पर्वतीय wilderness को पूरी तरह से संतुलित करता है। यह पूरा क्षेत्र जांस्कर और महान हिमालयी श्रेणियों के बीच एक दुर्लभ और अनूठा संक्रमण क्षेत्र (Transition zone) बनाता है।
अल्पाइन घास के मैदान और 600 से अधिक फूलों की प्रजातियां
यह घाटी अपने भव्य अल्पाइन घास के मैदानों (Alpine meadows) और समृद्ध वनस्पतियों के लिए जानी जाती है। यहाँ लगभग 600 से अधिक प्रजातियों के आकर्षक और दुर्लभ फूल पाए जाते हैं, जिनमें ऑर्किड, पोपी, प्रिमूला, गेंदा, डेज़ी और एनेमोन शामिल हैं, जो खिलने पर पूरी घाटी को रंगों से भर देते हैं। इसके अलावा, पार्क के कुछ हिस्सों में बर्च (भोजपत्र) और रोडोडेंड्रोन (बुरांश) के उप-अल्पाइन जंगल भी इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं।
दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक आशियाना
यह राष्ट्रीय उद्यान सिर्फ फूलों के लिए ही नहीं, बल्कि कई दुर्लभ और संरक्षित वन्यजीवों का भी सुरक्षित ठिकाना है। यहाँ ग्रे लंगूर, उड़ने वाली गिलहरी (flying squirrel), हिमालयी नेवला, काला भालू, लाल लोमड़ी, चूना तितली (lime butterfly) और दुनिया के सबसे रहस्यमयी जीवों में से एक हिम तेंदुआ (snow leopard) जैसे अद्भुत जीव पाए जाते हैं। इको-सेंसिटिव जोन के दायरे तय होने से इस नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को और अधिक सुरक्षा मिलने की उम्मीद है।

महंगाई और खस्ताहाल शिक्षा के खिलाफ सुलगा फ्रांस, प्रदर्शनों में भड़की भीषण हिंसा
फ्रांस में बढ़ती महंगाई और स्कूलों की बदहाल स्थिति के खिलाफ शुरू हुआ राष्ट्रव्यापी आंदोलन अब उग्र रूप ले चुका है। छात्रों के प्रदर्शन से शुरू हुए इस आंदोलन में ट्रेड यूनियनों और आम जनता के शामिल होने के बाद कई शहरों में आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसक झड़पें देखने को मिल रही हैं।
स्कूलों की बदहाली से उठी विरोध की चिंगारी
इस व्यापक असंतोष की शुरुआत सितंबर के अंत में पेरिस के उपनगरीय इलाकों के स्कूलों से हुई थी। छात्र और शिक्षक कक्षाओं में शिक्षकों की भारी कमी, खस्ताहाल ढांचागत सुविधाओं और अत्यधिक भीड़ के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे। धीरे-धीरे इस छात्र आंदोलन को ट्रेड यूनियनों, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों और 'येलो वेस्ट' (Yellow Vest) आंदोलनकारियों का भी साथ मिल गया। इसके बाद यह विरोध केवल शिक्षा सुधारों तक सीमित न रहकर बढ़ती महंगाई और जीवन यापन की ऊंची लागत के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन में बदल गया।
पेरिस सहित प्रमुख शहरों में हिंसा और तोड़फोड़
पेरिस, लियोन, मार्सेय, लिले और रेंस जैसे प्रमुख फ्रांसीसी शहरों में प्रदर्शनकारियों और दंगा रोधी पुलिस के बीच तीखी झड़पें दर्ज की गई हैं। कई स्थानों पर गाड़ियों, दुकानों और सरकारी इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले और वॉटर कैनन का इस्तेमाल करना पड़ा है। उपद्रव, लूटपाट और हिंसा के आरोप में सुरक्षा बलों ने देश भर में 1,800 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया है।
पश्चिमी यूरोप का एक प्रमुख और समृद्ध देश है फ्रांस
भौगोलिक दृष्टि से देखें तो फ्रांस उत्तर-पश्चिमी यूरोप में स्थित एक महत्वपूर्ण देश है, जिसकी राजधानी पेरिस है। इसकी सीमाएं बेल्जियम, लक्ज़मबर्ग, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, इटली, स्पेन और एंडोरा सहित 7 देशों से मिलती हैं। पश्चिम में बिस्के की खाड़ी, उत्तर-पश्चिम में इंग्लिश चैनल और दक्षिण में भूमध्य सागर इसकी समुद्री सीमाओं का निर्धारण करते हैं। लायर और सीन जैसी प्रमुख नदियाँ तथा आल्प्स, ज्यूरा और पायरेनीस जैसी महान पर्वत श्रृंखलाएँ इसके प्राकृतिक परिदृश्य को समृद्ध बनाती हैं।

इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल का बड़ा फैसला: ऑटोमेकर कंपनी को 13,000 करोड़ रुपये का फायदा
इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) के एक अनुकूल फैसले से देश की एक प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनी को लगभग 13,000 करोड़ रुपये का भारी टैक्स लाभ मिलने की उम्मीद है। यह फैसला कर विवादों के निपटारे में ITAT की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है।
क्या है इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT)
आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण यानी ITAT एक ऐसा अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) संस्थान है जिसकी स्थापना जनवरी 1941 में की गई थी। यह सीधे कर अधिनियमों (Direct Taxes Acts) के तहत आने वाली अपीलों को सुनने और उनका निपटारा करने में माहिर है। साल 1961 के आयकर अधिनियम के तहत आने वाले विवादों का यह समाधान करता है। जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब इसमें सिर्फ छह सदस्य और तीन बेंच थीं (दिल्ली, कोलकाता और मुंबई), लेकिन आज इसका विस्तार हो चुका है और वर्तमान में यह 27 अलग-अलग शहरों में कुल 63 बेंचों के साथ काम कर रहा है। प्रशासनिक रूप से यह केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
संरचना और न्यायिक ढांचा
ITAT की प्रत्येक बेंच में एक अकाउंटेंट मेंबर और एक जुडिशियल मेंबर (न्यायिक सदस्य) शामिल होते हैं। ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष (President) सदस्यों में से ही बेंच का गठन करते हैं। इसके अलावा, जरूरत पड़ने पर कुछ मामलों में तीन या उससे अधिक सदस्यों की एक 'स्पेशल बेंच' का भी गठन किया जाता है ताकि आयकर अपीलों का तेजी से निपटारा किया जा सके। कार्यप्रणाली के लिहाज से कमिश्नर ऑफ इनकम-टैक्स (अपिल्स) के बाद यह दूसरा ऐसा मंच है जो टैक्स मामलों की अपील सुनता है।
कर विवादों में अंतिम तथ्य-खोजी निकाय
ITAT कर विवादों के मामलों में 'अंतिम तथ्य-खोजी निकाय' (Final Fact-finding body) के रूप में काम करता है। यह करदाताओं और आयकर अधिकारियों दोनों को ही विवादों को सुलझाने के लिए एक सुलभ मंच प्रदान करता है। हालांकि यह क्षेत्रीय उच्च न्यायालय (High Court) के अधिकार क्षेत्र के अधीन काम करता है और उसके नियमों का पालन करता है, लेकिन इसके द्वारा दिए गए आदेश आमतौर पर अंतिम माने जाते हैं। उच्च न्यायालय में अपील तभी की जा सकती है जब निर्धारण के लिए कोई गंभीर कानूनी सवाल (Substantial question of law) सामने आए।

144 साल का लंबा इंतजार खत्म: गुजरात के बरडा वन्यजीव अभ्यारण्य में लौटे शेर
गुजरात के पोरबंदर के पास स्थित बरडा वन्यजीव अभ्यारण्य में करीब 144 साल बाद शेरों की वापसी हुई है। हालिया अध्ययन के अनुसार, 'गिर-बरडा प्रोजेक्ट' के तहत विकसित इस दूसरे सुरक्षित ठिकाने पर अब 17 एशियाई शेर आ चुके हैं, जो वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
ऐतिहासिक रियासत के शिकारगाह से सैटेलाइट हैबिटेट तक
गुजरात के पोरबंदर के पास बरडा पहाड़ियों में फैला यह अभ्यारण्य लगभग 192.31 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है और इसकी स्थापना 1979 में हुई थी। स्थानीय रूप से इसे 'जाम बरडा' के नाम से जाना जाता है, जो कभी जामनगर और पोरबंदर के राजसी परिवारों का निजी शिकारगाह हुआ करता था। राज्य सरकार ने एशियाई शेरों के लिए इसे दूसरा घर बनाने के उद्देश्य से 1979 में 'गिर-बरडा प्रोजेक्ट' की शुरुआत की थी। आज यह गुजरात का पहला पूरी तरह से सुरक्षित सैटेलाइट लायन हैबिटेट बन चुका है, जहां वर्तमान रिपोर्ट के मुताबिक 17 एशियाई शेर स्वतंत्र रूप से रह रहे हैं।
जैव विविधता और प्राकृतिक बनावट का अनूठा संगम
बरडा अभ्यारण्य की भौगोलिक और प्राकृतिक बनावट शेरों और अन्य वन्यजीवों के अनुकूल है। यह चारों तरफ से कृषि क्षेत्रों, बंजर भूमि और जंगलों से घिरा हुआ है, और इसका पूरा इलाका पहाड़ी है। यहाँ से बिलेशवरी और जोघरी नदियाँ गुजरती हैं, साथ ही खंभाला और फोदरा बांध भी स्थित हैं। यहाँ मालधारी, भरवाड, रबारी और गढ़वी जैसी पारंपरिक जनजातियाँ निवास करती हैं। दक्षिण उष्णकटिबंधीय और शुष्क पर्णपाती जंगलों वाले इस क्षेत्र में गुजरात की सबसे अधिक यानी लगभग 650 प्रकार की वानस्पतिक विविधता पाई जाती है।
समृद्ध वन्यजीवों और पक्षियों का स्वर्ग
शेरों के अलावा यह अभ्यारण्य तेंदुओं, भेड़ियों, सांभर, चिंकारा, लकड़बग्घा और नीलगाय जैसे कई वन्यजीवों का सुरक्षित ठिकाना है। पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह किसी स्वर्ग से कम नहीं है, क्योंकि यहाँ ईगल, उल्लू, और तीतर जैसे कई स्थानीय और प्रवासी पक्षी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। 144 साल बाद शेरों की इस सफल वापसी ने भारत में वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की दिशा में एक बड़ी सफलता हासिल की है।

कुफरी जामुनिया: उत्तर भारत में धूम मचा रहा सेहतमंद बैंगनी आलू
आलू की पारंपरिक परिभाषा बदलते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR-CPRI) ने पोषक तत्वों से भरपूर बैंगनी आलू की किस्म 'कुफरी जामुनिया' विकसित की है। उत्तर भारतीय मैदानों के लिए सिफारिश की गई यह बायोफोर्टिफाइड किस्म एंटीऑक्सीडेंट, जिंक, आयरन और एंथोसायनिन जैसे गुणों से भरपूर है।
औषधीय गुणों से भरपूर बैंगनी रंग और काया
साल 2024 में आधिकारिक तौर पर जारी की गई 'कुफरी जामुनिया' एक मध्यम अवधि में पकने वाली टेबल वैरायटी है, जिसके पौधे मध्यम-लंबे और अर्ध-सघन छत्र (semi-compact canopy) वाले होते हैं। इस आलू की सबसे बड़ी खासियत इसका रंग है। इसके कंद बाहर से गहरे बैंगनी और अंदर से भी बैंगनी गूदे वाले होते हैं। इसका आकर्षक रंग इस बात का प्रमाण है कि इसमें उच्च मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट, एंथोसायनिन, एस्कॉर्बिक एसिड और कैरोटिनाइड मौजूद हैं। इसके अलावा, इसमें जिंक और आयरन जैसे जरूरी खनिज भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
भंडारण और खेती के लिए है बेहद शानदार
विभिन्न स्थानों पर हुए परीक्षणों में इस किस्म ने अपनी स्थिरता और बेहतरीन प्रदर्शन का लोहा मनवाया है, जिसके बाद इसे उत्तर भारतीय मैदानों में खेती के लिए अनुशंसित किया गया है। इसके कंद आयताकार, उथली आंखों वाले और खाने में मलिदा (mealy) बनावट वाले होते हैं। इसकी एक और बड़ी खूबी इसकी मध्यम सुप्तता (dormancy) है, जो लगभग 6 से 8 सप्ताह की होती है। इसका मतलब है कि इसके कंद जल्दी अंकुरित नहीं होते, जिससे भंडारण के दौरान कम सड़न और न्यूनतम वजन घटता है।
रंगीन आलू की श्रृंखला में कुफरी नीलकंठ और कुफरी मणिक
ICAR-CPRI द्वारा सिर्फ कुफरी जामुनिया ही नहीं, बल्कि अन्य रंगीन और स्वास्थ्यवर्धक किस्में भी विकसित की गई हैं। साल 2018 में देश की पहली बैंगनी छिलके वाली विशेष किस्म 'कुफरी नीलकंठ' आई थी, जो पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बेहद लोकप्रिय है। इसके बाद 2021 में 'कुफरी मणिक' को लॉन्च किया गया, जिसके कंद गहरे लाल रंग के और अंदर से पीले गूदे वाले होते हैं। ये सभी किस्में आधुनिक खान-पान और सेहत के प्रति जागरूक लोगों के लिए एक बेहतरीन और पौष्टिक विकल्प बनकर उभर रही हैं।
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