
आंध्र प्रदेश के लंकामेश्वरम अभ्यारण्य में दिखा वन्यजीवों का नया संसार
आंध्र प्रदेश के लंकामेश्वरम वन्यजीव अभ्यारण्य में हाल ही में लगे कैमरा ट्रैप से चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। यहाँ भालू, तेंदुए और जंगली सुअर जैसे कई वन्यजीवों की समृद्ध मौजूदगी दर्ज की गई है। यह क्षेत्र बेहद दुर्लभ पक्षी जेरडन कर्सर का इकलौता घर होने के कारण भी खासा चर्चा में है।
अभ्यारण्य की भौगोलिक स्थिति और नदियाँ
यह संरक्षित क्षेत्र आंध्र प्रदेश की भौगोलिक सीमा के भीतर स्थित है। इस अभ्यारण्य की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह मुख्य रूप से पन्ना नदी के लिए कैचमेंट एरिया का निर्माण करता है। इसके अलावा, प्रसिद्ध तेलुगु गंगा नहर इसके पूर्वी हिस्से से होकर गुजरती है और आगे चलकर पन्ना नदी में ही मिलती है, जिससे इस पूरे इलाके को पर्याप्त जल स्रोत और प्राकृतिक संबल मिलता है।
दुर्लभ वनस्पतियों और अमूल्य लकड़ियों का गढ़
लंकामेश्वरम की वनस्पति इस क्षेत्र को प्राकृतिक रूप से बेहद खास बनाती है। यहाँ की पहाड़ियों पर दक्षिणी उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन, मैदानों में स्क्रब वन, और इसके साथ ही दक्षिणी शुष्क मिश्रित पर्णपाती, उष्णकटिबंधीय कांटेदार और उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार वन पाए जाते हैं। यह इलाका अत्यंत दुर्लभ और कीमती लाल चंदन (रेड सैंडर्स) तथा चंदन की लकड़ी के लिए पूरी दुनिया में विशेष महत्व रखता है। इसके अलावा, यहाँ की नदी के किनारे की वनस्पति में जामुन, जंगली आम, बांस और हार्डविकिया बिनाटा जैसी समृद्ध प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
जेरडन कर्सर का एकमात्र प्राकृतिक आशियाना
लंकामेश्वरम वन्यजीव अभ्यारण्य केवल सामान्य वन्यजीवों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर के पक्षी विशेषज्ञों के लिए भी आकर्षण का मुख्य केंद्र है। यह दुर्लभ और संकटग्रस्त पक्षी 'जेरडन कर्सर' के लिए दुनिया में एकमात्र घर और अंतिम उम्मीद है। हालिया सर्वे में मिले नए सबूतों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यदि इस अनूठे पारिस्थितिक तंत्र का सही संरक्षण किया जाए, तो यहाँ लुप्तप्राय जीवों और वनस्पतियों को बचाया जा सकता है।

कैम्ब्रियन गश्ती अभ्यास 2026: भारतीय सेना की असम रेजिमेंट ने जीता स्वर्ण पदक
यूके के वेल्स में आयोजित 'एक्सरसाइज कैम्ब्रियन गश्ती 2026' में भारतीय सेना की असम रेजिमेंट के जवानों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। 'सैन्य गश्त का ओलंपिक' कहे जाने वाले इस कठिन सैन्य अभ्यास में भारतीय दल ने 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय टीमों को पछाड़कर यह गौरव हासिल किया।
अंतरराष्ट्रीय सैन्य क्षितिज पर भारतीय सेना ने एक बार फिर अपनी बेजोड़ युद्ध क्षमता और उत्कृष्ट सामरिक कौशल का परचम लहराया है। यूनाइटेड किंगडम के वेल्स में आयोजित प्रतिष्ठित 'एक्सरसाइज कैम्ब्रियन गश्ती 2026' (Exercise Cambrian Patrol 2026) में भारतीय सेना की असम रेजिमेंट के जांबाज सैनिकों ने स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। 100 से अधिक प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय सैन्य टीमों के बीच भारतीय दल ने अपनी असाधारण शारीरिक सहनशक्ति, अनुशासन और युद्धक रणनीतियों का प्रदर्शन करते हुए केवल 10 स्वर्ण पदक विजेता टीमों में अपना स्थान बनाया।
सैन्य गश्त का ओलंपिक और इसकी कठिन चुनौतियां
ब्रिटिश सेना द्वारा आयोजित होने वाले इस गश्ती अभ्यास को दुनिया भर में 'सैन्य गश्त का ओलंपिक' (Olympics of Military Patrolling) माना जाता है। 60 से अधिक वर्षों से आयोजित हो रहे इस वार्षिक सैन्य अभ्यास का संचालन ब्रिटिश सेना की 160वीं (वेल्श) ब्रिगेड मुख्यालय द्वारा किया जाता है। यह अभ्यास प्रतियोगिता के बजाय सैन्य दक्षता, नेतृत्व क्षमता, युद्ध कला (Battlecraft Syllabus) और शारीरिक दृढ़ता के मूल्यांकन पर आधारित होता है। 10 दिनों में 48-48 घंटों के आठ चरणों में विभाजित इस अभ्यास में प्रत्येक सैनिक को 32 किलोग्राम वजन के साथ 1,000 मीटर से अधिक की चढ़ाई-उतराई वाले पहाड़ी इलाकों में लगभग 60 किलोमीटर की कठिन दूरी तय करनी होती है।
असम रेजिमेंट का अदम्य साहस और समर्पण
असम रेजिमेंट के सैनिकों ने अत्यंत दुर्गम परिस्थितियों, प्रतिकूल मौसम और अत्यधिक थका देने वाले पड़ावों को पार करते हुए यह ऐतिहासिक सफलता अर्जित की है। इस वैश्विक आयोजन में ब्रिटिश सशस्त्र बलों की तीनों सेवाओं के साथ-साथ दुनिया भर के मित्र देशों की नियमित और रिजर्व सैन्य टुकड़ियों ने हिस्सा लिया था। भारतीय दल की इस उपलब्धि ने न केवल असम रेजिमेंट के अदम्य साहस और अनुशासन को साबित किया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारतीय सेना के उच्च प्रशिक्षण मानकों और पेशेवर उत्कृष्टता पर भी मुहर लगाई है।

पारिस्थितिकी संरक्षण में केरल की पहल, शुरू किया देश का पहला RLE प्रोजेक्ट
जैव विविधता संरक्षण की दिशा में केरल ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए देश का पहला 'रेड लिस्ट असेसमेंट ऑफ इकोसिस्टम्स' (RLE) प्रोजेक्ट लॉन्च किया है। केरल राज्य जैव विविधता बोर्ड द्वारा समर्थित यह परियोजना संकटग्रस्त पारिस्थितिक तंत्रों के विनाश के जोखिम का मूल्यांकन करेगी।
जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के क्षेत्र में केरल ने एक नया इतिहास रच दिया है। राज्य सरकार के तत्वावधान में केरल राज्य जैव विविधता बोर्ड (KSBB) ने भारत का पहला 'रेड लिस्ट असेसमेंट ऑफ इकोसिस्टम्स' (RLE) प्रोजेक्ट लॉन्च किया है। किसी भी भारतीय राज्य द्वारा शुरू की गई यह अपने प्रकार की पहली पहल है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण की पुरानी पद्धतियों में बदलाव लाना है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के जरिए संरक्षण के प्रयासों को केवल अलग-अलग प्रजातियों के बचाव तक सीमित न रखकर व्यापक परिदृश्य-स्तरीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन में परिवर्तित किया जाएगा।
प्रमुख संस्थानों की सहभागिता और अध्ययन का दायरा
इस दूरगामी परियोजना को केरल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (KFRI) और एमईएस असमाबी कॉलेज द्वारा संयुक्त रूप से क्रियान्वित किया जा रहा है। इस अध्ययन के तहत राज्य के सभी 14 जिलों में स्थित विभिन्न और संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों का मानचित्रण किया जाएगा। इसमें पश्चिमी घाट की ऊंची पर्वत चोटियों से लेकर घनी आबादी वाले मध्यवर्ती इलाकों और तटीय क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इस दो वर्षीय परियोजना का प्राथमिक लक्ष्य प्रकृति के इन महत्वपूर्ण हिस्सों पर मंडरा रहे विनाश के खतरों का आकलन करना है।
अंतर्राष्ट्रीय मानक और नीति निर्माण में उपयोग
पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य और उनकी संवेदनशीलता को मापने के लिए यह अध्ययन प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) के 'रेड लिस्ट ऑफ इकोसिस्टम्स' फ्रेमवर्क का उपयोग करेगा। वनों, नदियों और तटीय पट्टियों का सूक्ष्म विश्लेषण करके यह परियोजना जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले खतरों को सटीक रूप से चिन्हित करेगी। इससे प्राप्त होने वाले स्थानिक डेटा (Spatial Data) स्थानीय निकायों और योजनाकारों को सतत अवसंरचना विकास और लक्षित संरक्षण रणनीतियों के लिए साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में मदद करेंगे।

भारत की पहली प्राइवेट माइक्रो-मिसाइल 'ज्वाला' परीक्षण के लिए तैयार
भारत के रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी ने एक नया मील का पत्थर छू लिया है। देश की पहली स्वदेशी प्राइवेट-सेक्टर माइक्रो-मिसाइल 'ज्वाला' (JWALA-MK1) सॉलिड रॉकेट मोटर के सफल परीक्षण के बाद अब ट्रायल्स के लिए पूरी तरह तैयार है। यह अत्याधुनिक मिसाइल ड्रोन हमलों से निपटने में देश की मारक क्षमता को मजबूत करेगी।
भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमताओं में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। निजी क्षेत्र द्वारा देश में पहली बार विकसित की गई माइक्रो-मिसाइल 'ज्वाला-एमके1' ने सॉलिड रॉकेट मोटर के परीक्षण में बड़ी सफलता हासिल कर ली है और अब यह अंतिम परीक्षणों के दौर में प्रवेश कर चुकी है। इस मिसाइल को प्रमुख निजी रक्षा तकनीक कंपनी 'आईजी डिफेंस' (IG Defence) द्वारा विकसित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मनों के ड्रोन और मानवरहित हवाई वाहनों (UAVs) को हवा में ही नष्ट करना है, जो पारंपरिक और महंगे एयर-डिफेंस सिस्टम का एक बेहद किफायती और प्रभावी विकल्प साबित होगा।
'ग्रिड' डिफेंस इकोसिस्टम का अहम हिस्सा
ज्वाला मिसाइल अकेले काम करने वाला हथियार नहीं है, बल्कि यह आईजी डिफेंस के व्यापक 'ग्रिड' (GRID) डिफेंस इकोसिस्टम का एक भौतिक हिस्सा है। 'ग्रिड' एक उन्नत, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से लैस युद्ध प्रबंधन नेटवर्क है जो विभिन्न सेंसर, कमांड स्ट्रक्चर और हथियारों को जोड़कर एक साझा परिचालन तस्वीर तैयार करता है। इस आधुनिक नेटवर्क के जरिए ड्रोन खतरों की पल-पल की जानकारी मिलती है और तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए 'ज्वाला' मिसाइल अपने लक्ष्य को तबाह कर देती है।
तकनीकी विशेषताएं और मारक क्षमता
इस माइक्रो-मिसाइल की डिजाइनिंग और तकनीकी विनिर्देश इसे बेहद खास बनाते हैं। यह ड्यूल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर और फिन कंट्रोल तकनीक पर काम करती है। इसकी मारक क्षमता 2 किलोमीटर से लेकर 5 किलोमीटर तक है, जबकि यह 50 मीटर से लेकर 5,000 मीटर की ऊंचाई तक के लक्ष्यों को आसानी से भेद सकती है। अधिकतम रेंज पर भी इसकी सटीकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP) 2 मीटर से भी कम है।
दुश्मन के ड्रोन को नेस्तनाबूद करने के लिए इसमें 0.5 से 1.5 किलोग्राम का प्री-फ्रैगमेंटेड हाई-एक्सप्लोसिव पेलोड लगाया गया है जो प्रॉक्सिमिटी फ्यूज से लैस है। इसके अलावा, यह मिसाइल इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और जैमिंग जैसी कठिन परिस्थितियों में भी अचूक रूप से काम करने के लिए पूरी तरह सक्षम है।

मसाय ज्वालामुखी के नीचे मिला मैग्मा का नया भंडार, वैज्ञानिकों को मिले अहम सुराग
मध्य अमरीका के निकारागुआ स्थित मसाय ज्वालामुखी को लेकर वैज्ञानिकों को नई और महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं। सेटेलाइट मापों से पता चला है कि इस ज्वालामुखी के नीचे स्थित एक मैग्मा भंडार खाली हो रहा है, जबकि दूसरे में नया मैग्मा प्रवेश कर रहा है। इस खोज से भविष्य में ज्वालामुखियों की निगरानी और खतरों के पूर्वानुमान को और बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
मध्य अमरीका के देश निकारागुआ में स्थित प्रसिद्ध मसाय ज्वालामुखी की भूमिगत संरचना को लेकर वैज्ञानिकों ने बड़ा खुलासा किया है। उपग्रह मापों (Satellite Measurements) से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चला है कि इस ज्वालामुखी के नीचे मैग्मा प्रणाली की हलचल बेहद जटिल है। आंकड़ों के अनुसार, ज्वालामुखी के भीतर एक मैग्मा चैंबर खाली हो रहा है, जबकि उसी समय गहराई में स्थित दूसरे चैंबर में नया मैग्मा भर रहा है। भूमिगत मैग्मा के इस प्रवाह की खोज से वैज्ञानिकों को भविष्य में ज्वालामुखी विस्फोटों के पूर्वानुमान और सुरक्षा निगरानी तंत्र को मजबूत करने में काफी मदद मिलेगी।
मसाय ज्वालामुखी का भौगोलिक महत्व और बनावट
मसाय ज्वालामुखी निकारागुआ की राजधानी मनागुआ से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित एक सक्रिय बेसाल्टिक शील्ड-जैसा काल्डेरा ज्वालामुखी है। यह मध्य अमरीकी ज्वालामुखीय चाप (Central American Volcanic Arc) का एक प्रमुख हिस्सा है, जिसका निर्माण कैरेबियन प्लेट के नीचे कोकोस प्लेट के धंसने (Subduction) के कारण हुआ है। इस ज्वालामुखी में 6 गुणा 11.5 किलोमीटर आकार का एक विशाल काल्डेरा मौजूद है, जो पिछले 6,000 वर्षों में हुए प्लीनियन विस्फोटों की श्रृंखला के कारण बना था। इस काल्डेरा के भीतर कई ढहे हुए क्रेटर और सिंडर कोन हैं, जिनमें से वर्तमान में सक्रिय 'सेंटियागो क्रेटर' का निर्माण 1850 से 1853 के बीच हुआ था।
लावा झील और जहरीली गैसों का उत्सर्जन
यह ज्वालामुखी अपनी निरंतर बहती लावा झील और भारी मात्रा में जहरीली गैसों के उत्सर्जन के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। सामान्य तौर पर इसकी गतिविधियां राख के उत्सर्जन, लावा के फव्वारों और कभी-कभी लावा प्रवाह के साथ स्ट्रॉमबोलियन से वल्केनियन प्रकार की होती हैं। वर्तमान में सेंटियागो क्रेटर में एक संवहनी (convecting) लावा झील मौजूद है, जिससे लगातार गैसों का रिसाव होता रहता है। यह ज्वालामुखी अत्यधिक मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड गैस छोड़ता है; उदाहरण के लिए, वर्ष 1981 में इसके सेंटियागो क्रेटर से प्रति वर्ष 5,00000 टन की दर से सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जित हुई थी।
राष्ट्रीय उद्यान और पर्यावरण संरक्षण
मसाय की समृद्ध और अनूठी प्राकृतिक संरचना को देखते हुए वर्ष 1979 में इसे निकारागुआ का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। इसे आधिकारिक तौर पर 'मसाय ज्वालामुखी राष्ट्रीय उद्यान' (Parque Nacional Volcán Masaya) के नाम से जाना जाता है। ज्वालामुखी क्षेत्र होने के बावजूद यह हर साल बड़ी संख्या में पर्यटकों और शोधकर्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। हालिया उपग्रह अध्ययनों से मिली नई जानकारी के बाद अब इस क्षेत्र के पास रहने वाले लाखों लोगों की सुरक्षा और ज्वालामुखी जोखिम प्रबंधन को एक नया आधार मिलेगा।
Delight News
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