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राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम का पुनर्गठन एवं वित्तीय विस्तार

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम का पुनर्गठन एवं वित्तीय विस्तार

Delight News
📅 15 Oct2026

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) को वर्ष 2026-27 से 2030-31 के लिए 53,428 करोड़ रुपये के बजट के साथ जारी रखने की मंजूरी दी है। इसके अंतर्गत योजना का नाम बदलकर 'प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना' किया गया है तथा दिव्यांगजन पेंशन में सहायता राशि और पात्रता मानदंडों में संशोधन किया गया है।

शीर्षक (Title): राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम का पुनर्गठन एवं वित्तीय विस्तार
सारांश (Summary):
केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) को वर्ष 2026-27 से 2030-31 के लिए 53,428 करोड़ रुपये के बजट के साथ जारी रखने की मंजूरी दी है। इसके अंतर्गत योजना का नाम बदलकर 'प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना' किया गया है तथा दिव्यांगजन पेंशन में सहायता राशि और पात्रता मानदंडों में संशोधन किया गया है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
योजना का पुनर्गठन एवं नया नामकरण
ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) के ढांचे में व्यापक परिवर्तन किया गया है। अब इस मुख्य योजना को 'प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना' के नाम से जाना जाएगा। इसके साथ ही, इसके घटक उप-योजनाओं के नामों में बदलाव करते हुए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धानवस्था पेंशन योजना को 'प्रधानमंत्री वृद्धानवस्था पेंशन योजना', इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना को 'प्रधानमंत्री विधवा पेंशन योजना', इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांगजन पेंशन योजना को 'प्रधानमंत्री दिव्यांगजन पेंशन योजना' तथा राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना को 'प्रधानमंत्री परिवार लाभ योजना' का नाम दिया गया है।
दिव्यांगजन पेंशन योजना में प्रमुख संशोधन
संशोधित दिशा-निर्देशों के तहत दिव्यांगजन पेंशन व्यवस्था में तीन प्रमुख बदलाव किए गए हैं। प्रथम, पेंशन की दरों में वृद्धि की गई है, जिसके अंतर्गत 0 से 79 वर्ष आयु वर्ग के लाभार्थियों को 300 रुपये के स्थान पर 375 रुपये प्रतिमाह तथा 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के लाभार्थियों को 500 रुपये के स्थान पर 625 रुपये प्रतिमाह वित्तीय सहायता मिलेगी। द्वितीय, बेंंचमार्क विकलांगता की शर्त को 80 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत कर दिया गया है। तृतीय, न्यूनतम आयु सीमा (पूर्व में 18 वर्ष) को समाप्त कर दिया गया है, जिससे जन्म से ही पात्र दिव्यांगजन इसके तहत लाभ प्राप्त कर सकेंगे। यह संशोधन दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के अनुरूप है।
अन्य पेंशन घटकों एवं परिवार लाभ योजना की स्थिति
वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन और राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना को उनके मौजूदा स्वरूप और शर्तों के साथ ही जारी रखने का निर्णय लिया गया है। वृद्धावस्था पेंशन के तहत 60-79 वर्ष की आयु के लाभार्थियों को 200 रुपये प्रतिमाह तथा 80 वर्ष और उससे अधिक आयु वालों को 500 रुपये प्रतिमाह मिलते रहेंगे। इसी प्रकार, विधवा पेंशन के तहत 40-79 वर्ष आयु वर्ग को 300 रुपये तथा 80 वर्ष व उससे अधिक आयु वर्ग को 500 रुपये प्रतिमाह सहायता दी जाएगी। प्राथमिक कमाई करने वाले व्यक्ति की मृत्यु पर देय 'प्रधानमंत्री परिवार लाभ योजना' में 20,000 रुपये की एकमुश्त सहायता पूर्ववत प्रदान की जाएगी।
सामाजिक सुरक्षा एवं प्रशासनिक दायरा
वर्ष 1995 में शुरू की गई यह शत-प्रतिशत केंद्र प्रायोजित योजना संविधान के अनुच्छेद 41 में निहित राज्य के नीति निदेशक तत्वों के क्रियान्वयन की दिशा में एक प्रमुख कदम है। 2026-27 से 2030-31 की पांच वर्षों की अवधि के लिए स्वीकृत 53,428 करोड़ रुपये का वित्तीय परिव्यय देशभर के लगभग 3.20 करोड़ लाभार्थियों को प्रत्यक्ष वित्तीय संबल प्रदान करेगा। दिव्यांगजन पेंशन के नए मानकों से इसके लाभार्थियों की संख्या 8.33 लाख से बढ़कर लगभग 27 लाख होने का अनुमान है।
भारत-ब्रूनेई द्विपक्षीय व्यापार और सामरिक भूगोल का विश्लेषणात्मक अध्ययन

भारत-ब्रूनेई द्विपक्षीय व्यापार और सामरिक भूगोल का विश्लेषणात्मक अध्ययन

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📅 15 Oct2026

हाल ही में संपन्न भारत-ब्रूनेई संयुक्त व्यापार समिति की तीसरी बैठक के माध्यम से द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को गति प्रदान की गई है। बोर्नियो द्वीप के उत्तर में स्थित ब्रूनेई दक्षिण चीन सागर से घिरा दक्षिण पूर्व एशियाई देश है, जो अपने रणनीतिक महत्व और प्राकृतिक संसाधनों के लिए विशिष्ट पहचान रखता है।

शीर्षक (Title): भारत-ब्रूनेई द्विपक्षीय व्यापार और सामरिक भूगोल का विश्लेषणात्मक अध्ययन
सारांश (Summary):
हाल ही में संपन्न भारत-ब्रूनेई संयुक्त व्यापार समिति की तीसरी बैठक के माध्यम से द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को गति प्रदान की गई है। बोर्नियो द्वीप के उत्तर में स्थित ब्रूनेई दक्षिण चीन सागर से घिरा दक्षिण पूर्व एशियाई देश है, जो अपने रणनीतिक महत्व और प्राकृतिक संसाधनों के लिए विशिष्ट पहचान रखता है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
भारत-ब्रूनेई द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक सहयोग
भारत और ब्रूनेई दारुस्सलाम के मध्य द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करने और वाणिज्यिक साझेदारी को विस्तार देने की दिशा में संयुक्त व्यापार समिति (JTC) की तीसरी बैठक अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इस उच्चस्तरीय बैठक का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच वर्तमान द्विपक्षीय व्यापार की व्यापक समीक्षा करना और ऊर्जा, रक्षा, तथा प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग की नई संभावनाओं को तलाशना था ताकि पारंपरिक आर्थिक संबंधों को और अधिक मजबूत किया जा सके।
भौगोलिक अवस्थिति और रणनीतिक सीमाएं
ब्रूनेई दक्षिण पूर्व एशिया में बोर्नियो द्वीप के उत्तरी तट पर स्थित एक विशिष्ट संप्रभु राष्ट्र है। यह भौगोलिक रूप से उत्तर में सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दक्षिण चीन सागर से घिरा हुआ है, जबकि अन्य सभी दिशाओं में इसकी सीमाएं मलेशिया से मिलती हैं। उल्लेखनीय है कि ब्रूनेई का भू-भाग मलेशिया के सारावाक राज्य के एक भू-भाग द्वारा दो अलग-अलग गैर-निरंतर हिस्सों में विभाजित है। इस देश की राजधानी बंदर सेरी बेगावान है। इसके अतिरिक्त, ब्रूनेई राष्ट्रमंडल और दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (ASEAN) का एक सक्रिय सदस्य देश है, जो इसे क्षेत्रीय कूटनीति में विशेष महत्व दिलाता है।
भू-आकृति, जलवायु और प्राकृतिक संसाधन
ब्रूनेई की स्थलाकृति में उल्लेखनीय विविधता पाई जाती है, जहाँ एक ओर सपाट तटीय मैदान उत्तर में विस्तृत हैं, वहीं दूसरी ओर पूर्वी भाग में ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र और पश्चिमी भाग में पहाड़ी तराई क्षेत्र स्थित हैं। मलेशिया की सीमा के निकट पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र में स्थित 'बुकीट पागोन' देश का सबसे ऊंचा भौगोलिक बिंदु है। यहाँ की जलवायु पूरी तरह से भूमध्यसूचयी है, जिसके फलस्वरूप वर्ष भर मौसम अत्यधिक गर्म, आर्द्र और वर्षा वाला रहता है। देश के भू-भाग को बेलाइट, पांदारुआन और टुटोंग जैसी प्रमुख नदियाँ सींचती हैं। आर्थिक दृष्टिकोण से, ब्रूनेई अपनी अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और उष्णकटिबंधीय लकड़ी के विशाल प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।
अल्पाइन मस्क डियर: भारत में केवल दो नर कैद, प्रजाति संकट में

अल्पाइन मस्क डियर: भारत में केवल दो नर कैद, प्रजाति संकट में

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📅 15 Oct2026

अल्पाइन मस्क डियर, केवल एशिया में पाई जाने वाली दुर्लभ प्रजाति, भारत, नेपाल, भूटान और चीन के 3000–5000 मीटर ऊँचाई वाले पर्वतीय वनों में रहती है। यह एकाकी शाकाहारी है, पर शिकारियों द्वारा मस्क के लिये मारना इसका मुख्य खतरा है। IUCN के अनुसार यह संकटग्रस्त है; भारतीय चिड़ियाघरों में केवल दो नर ही जीवित हैं, कोई मादा नहीं।

Alpine Musk Deer ki Parichay
Alpine musk deer (Moschus chrysogaster) ek aisa prani hai jo keval Asia mein paya jaata hai. Yeh asli hiran nahi balki Bovidae parivaar ka hissa hai, jismein antelopes, bovines, sheep aur goats shamil hain. Yahan ki khasiyat yeh hai ki yeh male musk sac ko bahar se dekh sakte hain, jo ki unke testis ke beech sthit hota hai. Mating season mein yeh apne fangs ka istemal karte hain, jo dusre males ke saath sparring ke liye upyog hote hain.

Awas aur Avastha
Yeh deer 3,000–5,000 meter ki uchaiyon par sthit coniferous aur deciduous vanon mein rehte hain. Mukhyatah India, Nepal, Bhutan aur China mein paaye jaate hain. Yeh ekakshi aur crepuscular (saanjh aur subah) jeev hote hain, jo ki forbs, grasses, moss, lichens aur shrubs ke patton aur twigs par apni aahar kiye jaate hain.

Sanrakshan ki Chunautiyan
Alpine musk deer ko mukhya roop se musk ke liye shikar kiya jaata hai, jo ki cosmetic aur traditional medicine mein upyog hota hai. Iske kaaran yeh species IUCN Red List mein Endangered, CITES Appendix I, aur Wildlife Protection Act 1972 ke Schedule I mein shamil hai. Bharat ke zoo mein abhi tak do male captive deer maujood hain, lekin koi mahila nahi hai, jo ki sanrakshan ki stithi ko aur bhi gambhir banata hai.

Samajik Aur Arthik Mahatva
Musk deer ka musk bahut maang mein hai, isliye iski raksha ke liye kadi kanooni kadam uthaye ja rahe hain. Yadi is prani ki sankhya mein girawat aati rahegi to na keval jeev jantu ki vividhata prabhavit hogi, balki local arthavyavastha aur paryatan par bhi asar padega. Isliye yeh zaroori hai ki hum is prani ki raksha ke liye aur bhi prabhavi nitiyaan apnayein.
ट्रिशना वन्यजीव अभयारण्य में दुर्लभ फ़ेयर के पत्ती बंदर का पहला कैमरे पर कैद दृश्य

ट्रिशना वन्यजीव अभयारण्य में दुर्लभ फ़ेयर के पत्ती बंदर का पहला कैमरे पर कैद दृश्य

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📅 15 Oct2026

ट्रिशना वन्यजीव अभयारण्य, दक्षिण त्रिपुरा में स्थित, 1988 में स्थापित, तीन प्रकार के वन और 230 वृक्ष प्रजातियों के साथ समृद्ध है। हाल ही में यहाँ फ़ेयर के पत्ती बंदरों का दुर्लभ दृश्य कैद हुआ, जिन्हें स्पेक्टेकल मंकी कहा जाता है। यह प्रजाति IUCN के अनुसार संकटग्रस्त है, और आवास विनाश तथा वन क्षरण से खतरे में है।

ट्रिशना वन्यजीव अभयारण्य

ट्रिशना वन्यजीव अभयारण्य, जो दक्षिण त्रिपुरा में स्थित है, 1988 में स्थापित हुआ था। यहाँ तीन प्रकार के वन पाए जाते हैं – उष्णकटिबंधीय अर्ध-स्थायी वन, नम मिश्रित पर्णपाती वन और सवाना वन। 230 वृक्ष प्रजातियाँ, 400 जड़ी-बूटियाँ, 110 झाड़ियाँ और 150 चढ़ने वाले पौधे यहाँ के समृद्ध जैव विविधता के प्रतीक हैं। औषधीय पौधों में कर्चा, तुलसी, वासक, सरपगंदा, रुद्राक्ष, बेल आदि प्रमुख हैं। यहाँ का बांस, ओक्सिटेनान्थेरा नाइग्रोसिलेटा, जिसे स्थानीय लोग काइलै कहते हैं, भी प्रचुर मात्रा में उगता है। अभयारण्य में गौ, होलॉक गिबन, कैप्ड लैंगूर और गोल्डन लैंगूर जैसे प्राणी भी निवास करते हैं।

स्पेक्टेकल मंकी की दुर्लभ झलक

हाल ही में, ट्रिशना में फैयरे के पत्ती बंदर, जिन्हें स्पेक्टेकल मंकी भी कहा जाता है, की दुर्लभ झलक कैमरे में कैद हुई। यह प्राइमेट अपनी आँखों के चारों ओर हल्की सफ़ेद निशानों के कारण चश्मे जैसा दिखता है। यह मुख्यतः पेड़ों में रहता है और पत्तियों तथा पौधों के अन्य भागों पर भोजन करता है। IUCN के अनुसार यह प्रजाति संकटग्रस्त है, और आवास विनाश तथा वन क्षरण इसके अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा हैं।

संरक्षण चुनौतियाँ

स्पेक्टेकल मंकी के लिए मुख्य खतरे हैं आवास का विनाश, वन क्षरण, टुकड़ों में बंटना और अन्य मानवीय दबाव। इन चुनौतियों से निपटने के लिए संरक्षण कार्यक्रमों को सुदृढ़ करना आवश्यक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: ट्रिशना वन्यजीव अभयारण्य कहाँ स्थित है?
उत्तर: त्रिपुरा।

प्रश्न 2: यहाँ किस प्रकार के वन पाए जाते हैं?
उत्तर: उष्णकटिबंधीय अर्ध-स्थायी वन, नम मिश्रित पर्णपाती वन और सवाना वन।
कोझिकोडे में खसरे के 161 मामले, एक मृत्यु: रोग की गंभीरता और रोकथाम

कोझिकोडे में खसरे के 161 मामले, एक मृत्यु: रोग की गंभीरता और रोकथाम

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📅 15 Oct2026

कोझिकोड जिले में अब तक 161 पुष्टि मामलों और 1 मृत्यु के साथ खसरा की रिपोर्ट। यह अत्यधिक संक्रामक वायरस नाक-गले के स्राव से फैलता है, 10-14 दिन के बाद उच्च बुखार, नाक बहना, खांसी, लाल आँखे और चेहरे पर दाने दिखाई देते हैं। उपचार नहीं, पर एमआर वैक्सीन से दीर्घकालिक प्रतिरक्षा मिलती है।

कज़िकोड में खसरा: एक मौत, 161 मामले
कज़िकोड जिले में इस वर्ष अब तक 161 पुष्ट खसरा मामलों की रिपोर्ट के साथ एक मृत्यु दर्ज की गई है। यह आँकड़ा क्षेत्र में रोग के बढ़ते खतरे को दर्शाता है और सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को सतर्क करता है।

खसरा क्या है?
खसरा एक अत्यधिक संक्रामक श्वसन रोग है, जो पैरामाइक्सोवायरस परिवार के वायरस से होता है। यह वायरस हवा में या दूषित सतहों पर दो घंटे तक सक्रिय रह सकता है, जिससे संपर्क में आने वाले लोगों में संक्रमण फैलता है।

संक्रमण के तरीके
संक्रमित व्यक्ति के नाक या गले के स्राव (खाँसी, छींक) के संपर्क में आने या उसी हवा को साँस लेने से रोग फैलता है।

लक्षण
पहला लक्षण उच्च बुखार है, जो वायरस के संपर्क के 10‑14 दिन बाद शुरू होकर 4‑7 दिन तक रहता है। इसके बाद नाक बहना, खाँसी, लाल और पानीदार आँखे, और गालों में छोटे सफेद धब्बे दिखाई देते हैं। कुछ दिनों बाद चेहरे और गर्दन पर दाने प्रकट होते हैं।

उपचार और रोकथाम
खसरे के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है। सुरक्षित और प्रभावी MR वैक्सीन से दीर्घकालिक प्रतिरक्षा मिलती है, जिससे रोग को रोका जा सकता है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संदेश
समय पर टीकाकरण और स्वच्छता उपायों का पालन कर ही इस संक्रामक रोग से बचा जा सकता है।

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