
प्राचीन विक्रमशिला विश्वविद्यालय: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पुनरुद्धार
नालंदा विश्वविद्यालय की तर्ज पर बिहार के एक अन्य ऐतिहासिक शिक्षा केंद्र—विक्रमशिला विश्वविद्यालय—के पुनरुद्धार की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा इस प्राचीन स्थल को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जबकि राज्य सरकार ने केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए भूमि चिह्नित की है।
सारांश
नालंदा विश्वविद्यालय की तर्ज पर बिहार के एक अन्य ऐतिहासिक शिक्षा केंद्र—विक्रमशिला विश्वविद्यालय—के पुनरुद्धार की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा इस प्राचीन स्थल को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जबकि राज्य सरकार ने केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए भूमि चिह्नित की है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं स्थापना
विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना आठवीं शताब्दी के अंत से नौवीं शताब्दी की शुरुआत के बीच पाल वंश के प्रतापी राजा धर्मपाल द्वारा की गई थी। यह वर्तमान बिहार के भागलपुर जिले के कहलगांव के पास एंटीचक गांव में गंगा नदी के तट पर स्थित था। इस संस्थान की स्थापना नालंदा के शैक्षिक मानकों में कथित गिरावट के विकल्प तथा बौद्ध शिक्षा के उच्च स्तर को बनाए रखने के लिए की गई थी। पाल राजाओं के संरक्षण में यह संस्थान बौद्ध शिक्षा, विशेषकर वज्रयान और तांत्रिक परंपराओं का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा।
शैक्षणिक संरचना एवं विशेषताएँ
इस प्राचीन महाविहार की वास्तुकला और शिक्षण पद्धति अद्वितीय थी। परिसर के केंद्र में एक विशाल स्तूप स्थित था, जो 208 बौद्ध भिक्षुओं के अध्ययन और ध्यान के लिए बनी कोठरियों से घिरा हुआ था। यहाँ के पाठ्यक्रम में दर्शनशास्त्र, न्याय, व्याकरण, तर्कशास्त्र, और तंत्र विद्या शामिल थे। इस संस्थान में प्रवेश के लिए अत्यंत कठिन परीक्षा प्रणाली थी, जिसके द्वार पर द्वारपाल पंडितों (द्वितीयाचार्य) द्वारा परीक्षार्थियों का चयन किया जाता था। यहाँ तिब्बत, नेपाल, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे। यहाँ के प्रसिद्ध विद्वान अतीश दीपंकर ने तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
पतन के कारण
तेरहवीं शताब्दी की शुरुआत में (लगभग 1203 ईस्वी) बख्तियार खिलजी के आक्रमणों के दौरान नालंदा के साथ-साथ इस महान शिक्षण संस्थान को भी नष्ट कर दिया गया। इस विध्वंस के साथ ही प्राचीन भारत की महान बौद्ध ज्ञान परंपरा का यह केंद्र काल के गाल में समा गया।
आधुनिक पुनरुद्धार पहल
केंद्र सरकार द्वारा इस ऐतिहासिक धरोहर के पुनरुद्धार के लिए वर्ष 2015 में परियोजना को स्वीकृति दी गई थी। इसके तहत बिहार सरकार ने भागलपुर के एंटीचक गांव में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दो सौ एकड़ से अधिक भूमि की पहचान की है। इसके साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा स्थल के सौंदर्यीकरण और पुरातात्विक अवशेषों के संरक्षण का कार्य किया जा रहा है, जिससे क्षेत्र में बौद्ध पर्यटन और शैक्षणिक विकास को नया प्रोत्साहन मिलेगा।

लंबवत प्रक्षेपण कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल *
रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) भारतीय युद्धपोतों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए स्वदेशी रूप से विकसित 'वर्टिकल लॉन्च शॉर्ट रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल' (VL-SRSAM) प्रणाली पर तेजी से कार्य कर रहा है। यह प्रणाली युद्धपोतों के समीप आने वाले हवाई खतरों को बेअसर करने में सक्षम है।
सारांश
रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) भारतीय युद्धपोतों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए स्वदेशी रूप से विकसित 'वर्टिकल लॉन्च शॉर्ट रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल' (VL-SRSAM) प्रणाली पर तेजी से कार्य कर रहा है। यह प्रणाली युद्धपोतों के समीप आने वाले हवाई खतरों को बेअसर करने में सक्षम है।
प्रणाली का परिचय एवं उद्देश्य
यह एक स्वदेशी रूप से विकसित कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (SRSAM) है, जिसे विशेष रूप से भारतीय नौसेना के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है। यह मुख्य रूप से एक जहाज-आधारित हथियार प्रणाली है जो कम दूरी पर विभिन्न प्रकार के हवाई खतरों को निष्प्रभावी करती है। इसका प्रमुख उद्देश्य "सी-स्किमिंग" (Sea-skimming) लक्ष्यों—यानी रडार की शुरुआती पकड़ से बचने के लिए समुद्र की सतह के ठीक ऊपर उड़ने वाली मिसाइलों या ड्रोनों को रोकना है।
तकनीकी विशेषताएँ एवं क्षमताएँ
इस मिसाइल की लंबाई 3.93 मीटर, व्यास 178 मिमी और पंखों का विस्तार (Wingspan) 508 मिमी है। ठोस प्रणोदक (Solid-propellant) मोटर से संचालित यह मिसाइल Mach 4 तक की सर्वोच्च गति प्राप्त कर सकती है। यह 80 किलोमीटर की परिचालन सीमा और 16 किलोमीटर की ऊंचाई तक के खतरों से निपटने में सक्षम है। इसकी सबसे बड़ी सामरिक विशेषता इसकी लंबवत प्रक्षेपण (Vertical Launch) क्षमता है, जो कनस्तर-आधारित लांचर से सीधे ऊपर की ओर प्रहार करते हुए 360-डिग्री कवरेज प्रदान करती है। इसके उपयोग से युद्धपोत को किसी भी दिशा से आने वाले खतरे से निपटने के लिए पोत को मोड़ने की आवश्यकता नहीं होती है।
रडार और मार्गदर्शन प्रणाली
यह उन्नत हथियार प्रणाली अत्याधुनिक मल्टी-फंक्शन रडार (MFR) पर निर्भर करती है। एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैंड ऐरे (AESA) रडार आसमान में स्कैन कर खतरों की पहचान करता है और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर ऑनबोर्ड वेपन कंट्रोल कंप्यूटर (WCC) को डेटा प्रेषित करता है। उड़ान के अंतिम चरण में, अचूक सटीकता सुनिश्चित करने के लिए इसमें स्वदेशी रेडियो फ्रिक्वेंसी (RF) सीकर सक्रिय होता है।

पनडुब्बी रोधी युद्धक पोत 'मांगरोल': भारतीय नौसेना की नई ताकत *
कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) द्वारा निर्मित तीसरी एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट (ASW-SWC) 'मांगरोल' को मुंबई के नवल डॉकयार्ड में भारतीय नौसेना में शामिल किया जा रहा है। यह तटीय और उथले पानी में छुपे खतरों से निपटने में सक्षम है।
सारांश
कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) द्वारा निर्मित तीसरी एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट (ASW-SWC) 'मांगरोल' को मुंबई के नवल डॉकयार्ड में भारतीय नौसेना में शामिल किया जा रहा है। यह तटीय और उथले पानी में छुपे खतरों से निपटने में सक्षम है।
पोत का परिचय और नामकरण
'मांगरोल' कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड, कोच्चि द्वारा निर्मित माहे-श्रेणी का तीसरा स्वदेशी युद्धक पोत है। इसका नामकरण गुजरात के जूनागढ़ जिले के ऐतिहासिक तटीय शहर और प्रमुख मछली पकड़ने वाले बंदरगाह 'मांगरोल' के नाम पर किया गया है। यह पोत अप्रैल 2004 में सेवामुक्त किए गए माइनस्वीपर 'आईएनएस मांगरोल' की विरासत को आगे बढ़ाता है। इस पोत में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी घटकों का उपयोग किया गया है, जो 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान की सफलता को दर्शाता है।
प्रमुख तकनीकी विशेषताएँ एवं हथियार प्रणाली
यह पोत आधुनिक हथियारों और सेंसरों से लैस है, जो इसे सामरिक रूप से बेहद मजबूत बनाते हैं। इसमें 'अभय'Hull-Mounted Sonar, हल्की टॉरपीडो, स्वदेशी पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर और 'मारीच' एडवांस्ड टॉरपीडो डिकॉय सिस्टम शामिल हैं। जलजेट प्रोपल्शन (Waterjet propulsion) से जुड़े तीन डीजल इंजन इसे उथले पानी में उच्च गति और बेहतर युद्धाभ्यास (maneuverability) की क्षमता प्रदान करते हैं।
रणनीतिक भूमिका और संचालन क्षेत्र
इस पोत का मुख्य कार्य तटीय और उथले क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें नष्ट करना है। पनडुब्बी रोधी अभियानों के अतिरिक्त, यह पानी के नीचे की निगरानी, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों (LIMO) और बारूदी सुरंग युद्ध (mine warfare) से जुड़े कार्यों को अंजाम दे सकता है। यह पोत समुद्री गश्ती विमानों, हेलीकॉप्टरों और अन्य युद्धपोतों के साथ समन्वय स्थापित कर संयुक्त अभियान चलाने में सक्षम है।
राष्ट्रीय सुरक्षा में महत्व
'मांगरोल' का भारतीय नौसेना में शामिल होना बंदरगाहों, तटीय इलाकों और समुद्री पहुंच मार्गों की सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ करता है। तटीय क्षेत्रों में बड़े युद्धपोतों की परिचालन सीमाओं को देखते हुए, यह उथले पानी में पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए नौसेना की प्रभावशीलता को व्यापक स्तर पर बढ़ाता है।

पौंग बांध सुरक्षा: प्रतिबंधित क्षेत्र में नौकाओं की घुसपैठ *
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित पौंग बांध (महाराणा प्रताप सागर) के प्रतिबंधित और आरक्षित क्षेत्रों में मछली पकड़ने वाली नौकाओं की आवाजाही और जाल बिछाए जाने की घटनाओं ने गंभीर सुरक्षा चिंताएं पैदा कर दी हैं। इस संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं।
सारांश
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित पौंग बांध (महाराणा प्रताप सागर) के प्रतिबंधित और आरक्षित क्षेत्रों में मछली पकड़ने वाली नौकाओं की आवाजाही और जाल बिछाए जाने की घटनाओं ने गंभीर सुरक्षा चिंताएं पैदा कर दी हैं। इस संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं।
पौंग बांध की भौगोलिक स्थिति एवं निर्माण
पौंग बांध, जिसे ब्यास बांध के नाम से भी जाना जाता है, हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में शिवालिक पहाड़ियों के आर्द्रभूमि क्षेत्र में ब्यास नदी पर निर्मित एक मिट्टी से भरा हुआ (earth-fill) तटबंध बांध है। इस बांध का निर्माण कार्य 1961 में शुरू हुआ और 1974 में पूरा हुआ था। उस समय इसे देश में अपने प्रकार का सबसे ऊंचा बांध माना गया था। इसकी ऊंचाई लगभग 133 मीटर और आधार पर चौड़ाई 610 मीटर है। इस बांध के निर्माण से 'महाराणा प्रताप सागर' नामक एक कृत्रिम झील का निर्माण हुआ है।
उद्देश्य और जल प्रबंधन
इस बांध का मुख्य उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन और कृषि के लिए सिंचाई की सुविधा प्रदान करना है। बांध के स्पिलवे को दक्षिण दिशा में बने छह रेडियल गेटों द्वारा नियंत्रित किया जाता है और इसके आधार पर एक पावर हाउस स्थित है। यह झील बारहमासी ब्यास नदी का विस्तार है जो रोहतांग दर्रे से निकलती है, जिसके कारण इसमें पूरे वर्ष पर्याप्त जल स्तर बना रहता है। धौलाधार पर्वत श्रृंखलाएं इस झील को चारों ओर से घेरे हुए हैं।
पारिस्थितिक महत्व और रामसर स्थल
विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में फैली यह झील अपनी समृद्ध जलपक्षी विविधता के कारण वर्ष 1983 में एक पक्षी अभयारण्य घोषित की गई थी। समय के साथ यह प्रवासी पक्षियों के लिए एक प्रमुख आश्रय स्थल के रूप में उभरी, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2002 में इसे 'रामसर आर्द्रभूमि स्थल' (Ramsar Wetland Site) के रूप में नामित किया गया। यहाँ बार-हेडेड गूज, रेड-नेक ग्रीब, कॉमन टील और ब्लैक स्टॉर्क जैसी कई पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए एक महत्वपूर्ण मछली प्रजनन केंद्र भी है।
सुरक्षा उल्लंघन और प्रशासनिक कार्रवाई
हाल ही में बांध के दाहिने बैरियर और रिजर्व जोन जैसे प्रतिबंधित क्षेत्रों में अनधिकृत नौकाओं की आवाजाही और जाल बिछाए जाने की खबरों ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। सुरक्षा एजेंसियों की चेतावनी के बाद मत्स्य विभाग और भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) ने प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, लाइसेंस रद्द करने तथा जाल व नावें जब्त करने के निर्देश जारी किए हैं।

माली गणराज्य: भौगोलिक विशेषताएँ और वैश्विक कपास दिवस *
भारत और माली के स्थायी मिशनों द्वारा संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में संयुक्त रूप से 'विश्व कपास दिवस' का आयोजन किया गया। पश्चिम अफ्रीका में स्थित माली एक भू-आवेष्ठित देश है, जिसका एक बड़ा भूभाग मरुस्थलीय और अर्द्ध-मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र के अंतर्गत आता है।
सारांश
भारत और माली के स्थायी मिशनों द्वारा संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में संयुक्त रूप से 'विश्व कपास दिवस' का आयोजन किया गया। पश्चिम अफ्रीका में स्थित माली एक भू-आवेष्ठित देश है, जिसका एक बड़ा भूभाग मरुस्थलीय और अर्द्ध-मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र के अंतर्गत आता है।
माली की भौगोलिक स्थिति एवं सीमाएँ
माली पश्चिम अफ्रीका में स्थित एक भू-आवेष्ठित (Landlocked) देश है जिसकी राजधानी बमाको है। यह चारों तरफ से अन्य अफ्रीकी देशों से घिरा हुआ है। इसके उत्तर में अल्जीरिया, पूर्व में नाइजर और बुर्किना फासो, दक्षिण में कोट डी आइवर और गिनी, तथा पश्चिम में सेनेगल और मॉरिटानिया देश स्थित हैं। यह क्षेत्र भू-राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।
स्थलाकृति और जलवायु परिवर्तन
माली की स्थलाकृति और जलवायु में उत्तर से दक्षिण की ओर स्पष्ट भिन्नता पाई जाती है। देश का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा मरुस्थल या अर्द्ध-मरुस्थल से आच्छादित है, जिसमें सहारा मरुस्थल का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। यहाँ की जलवायु उत्तर में मरुस्थलीय और दक्षिण में उष्णकटिबंधीय सवाना प्रकार की है। देश का परिदृश्य उत्तर में सहारा मरुस्थल से होते हुए साहेल क्षेत्र से गुजरते हुए दक्षिण में सूडानी सवाना क्षेत्र तक विस्तृत है।
नदी प्रणाली और प्राकृतिक संसाधन
नाइजर नदी माली के आंतरिक भाग से बहने वाली मुख्य जलधारा है, जो इस क्षेत्र की कृषि और बस्तियों के लिए जीवन रेखा का काम करती है। देश का सर्वोच्च बिंदु 'होम्बोरी टोंडो' (Hombori Tondo) है, जिसकी ऊंचाई 1,155 मीटर है। इसके अतिरिक्त, खनिज संसाधनों के मामले में यह देश अत्यंत समृद्ध है, जहाँ सोना, यूरेनियम, हीरे, तांबा, लौह अयस्क, जस्ता, मैंगनीज और बॉक्साइट जैसे बहुमूल्य खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
वैश्विक कपास दिवस और द्विपक्षीय संबंध
संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित विश्व कपास दिवस के अवसर पर भारत और माली ने कपास आधारित आजीविका, मूल्य संवर्धन और सतत विकास पर जोर दिया। वैश्विक स्तर पर कपास उत्पादक देशों के लिए माली की स्थिति महत्वपूर्ण है, और संयुक्त मंचों पर इस प्रकार के आयोजन विकासशील देशों के मध्य कृषि कूटनीति और आर्थिक साझेदारी को सुदृढ़ करते हैं।
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