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लद्दाख में भारत की पहली उच्च-ऊंचाई स्नो लेपर्ड सफारी का शुभारंभ

लद्दाख में भारत की पहली उच्च-ऊंचाई स्नो लेपर्ड सफारी का शुभारंभ

Delight News
📅 09 Oct2026

भारत की पहली उच्च-ऊंचाई (High-altitude) स्नो लेपर्ड वाइल्डलाइफ सफारी हाल ही में लद्दाख के शीत मरुस्थल में शुरू की गई है। 'पहाड़ों का भूत' (Ghost of the Mountains) कहे जाने वाले इस रहस्यमयी और मायावी जीव के संरक्षण, नियंत्रित पारिस्थितिक पर्यटन और स्थानीय आजीविका को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह पहल शुरू की गई है।

लद्दाख में भारत की पहली उच्च-ऊंचाई स्नो लेपर्ड सफारी का शुभारंभ
सारांश
भारत की पहली उच्च-ऊंचाई (High-altitude) स्नो लेपर्ड वाइल्डलाइफ सफारी हाल ही में लद्दाख के शीत मरुस्थल में शुरू की गई है। 'पहाड़ों का भूत' (Ghost of the Mountains) कहे जाने वाले इस रहस्यमयी और मायावी जीव के संरक्षण, नियंत्रित पारिस्थितिक पर्यटन और स्थानीय आजीविका को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह पहल शुरू की गई है।
हालिया संदर्भ और सफारी की शुरुआत
लद्दाख प्रशासन ने केंद्र शासित प्रदेश में जिम्मेदार वन्यजीव पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय समुदायों को रोजगार के नए अवसर प्रदान करने के लिए भारत की पहली स्नो लेपर्ड सफारी की शुरुआत की है। यह पहल हेमिस नेशनल पार्क और आसपास के क्षेत्रों में हिम तेंदुओं की उपस्थिति को आधार बनाकर डिजाइन की गई है। इससे अवैध शिकार पर अंकुश लगाने और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
स्नो लेपर्ड का परिचय और प्रजाति वर्गीकरण
स्नो लेपर्ड (वैज्ञानिक नाम: Panthera uncia) मध्य और दक्षिण एशिया के उच्च पर्वतीय शिखरों में पाई जाने वाली बड़ी बिल्ली (Big Cat) प्रजाति का जीव है। इसे इसके छिपे रहने के स्वभाव और पथरीले इलाकों में छलावरण (Camouflage) की अद्भुत क्षमता के कारण 'पहाड़ों का भूत' भी कहा जाता है। पूर्व में इसे Leo uncia के रूप में वर्गीकृत किया गया था, परंतु वर्तमान में इसे शेर, बाघ और तेंदुए के साथ Panthera वंश (Genus) में रखा गया है।
भौगोलिक विस्तार, पर्यावास और भारत में स्थिति
हिम तेंदुए 500 से 5,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित चट्टानी, झाड़ियों वाले और घास के मैदानों में निवास करते हैं। इनका विस्तार हिमालय, हिंदूकुश और तिब्बत के पठार से लेकर रूस में बैकाल झील के पश्चिमी उच्च भागों तक है। भारत में लगभग 500 से 700 हिम तेंदुए पाए जाते हैं, जो मुख्य रूप से लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के ट्रांस-हिमालयी क्षेत्रों में विस्तृत हैं। यह हिमाचल प्रदेश का राज्य पशु (State Animal) भी है।
शारीरिक विशेषताएं और अनुकूलन योग्यता
एक वयस्क स्नो लेपर्ड की लंबाई पूंछ सहित लगभग 2.1 मीटर होती है, जिसमें केवल पूंछ 0.9 मीटर लंबी होती है। इनका वजन 23 से 41 किलोग्राम के बीच होता है। अत्यधिक ठंडे जलवायु में जीवित रहने के लिए इनके पास कई शारीरिक अनुकूलन (Adaptations) होते हैं:
सघन फर: हल्के धूसर रंग के कोट पर काले रंग के रोसेट (Rosettes) बने होते हैं और पेट के निचले हिस्से पर फर 10 सेमी तक लंबा होता है।
चौड़े पंजे: बर्फ पर चलने के लिए प्राकृतिक 'स्नो-शू' का कार्य करते हैं।
चौड़ी नासा गुहा: ठंडी हवा को फेफड़ों में पहुँचने से पहले गर्म करने में मदद करती है।
लंबी पूंछ: संतुलन बनाने और सोते समय शरीर को लपेटकर गर्मी बनाए रखने में काम आती है।
संरक्षण स्थिति और खतरे
अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में स्नो लेपर्ड को 'असुरक्षित' (Vulnerable - VU) श्रेणी में रखा गया है। भारत में इसे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I (Schedule-I) के तहत सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। अवैध शिकार, पशुपालकों के साथ संघर्ष (Retaliatory Killing), बुनियादी ढांचे के विकास के कारण आवास विखंडन, और जलवायु परिवर्तन इनके अस्तित्व के सामने मुख्य चुनौतियां हैं।
घाना का ब्रिक्स (BRICS) में शामिल होने का निर्णय: अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नया मोड़

घाना का ब्रिक्स (BRICS) में शामिल होने का निर्णय: अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नया मोड़

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📅 09 Oct2026

पश्चिम अफ़्रीकी देश घाना के मंत्रिमंडल ने ब्रिक्स (BRICS) संगठन की सदस्यता प्राप्त करने हेतु औपचारिक आवेदन करने के निर्णय को स्वीकृति दी है। घाना का यह कदम अपनी विदेश नीति के विविधीकरण, वैश्विक आर्थिक विकल्पों के विस्तार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के साथ जुड़ने की रणनीतिक आकांक्षा को दर्शाता है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर की घाना यात्रा के दौरान भारत ने इस आकांक्षा का समर्थन किया है।

घाना का ब्रिक्स (BRICS) में शामिल होने का निर्णय: अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नया मोड़
सारांश
पश्चिम अफ़्रीकी देश घाना के मंत्रिमंडल ने ब्रिक्स (BRICS) संगठन की सदस्यता प्राप्त करने हेतु औपचारिक आवेदन करने के निर्णय को स्वीकृति दी है। घाना का यह कदम अपनी विदेश नीति के विविधीकरण, वैश्विक आर्थिक विकल्पों के विस्तार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के साथ जुड़ने की रणनीतिक आकांक्षा को दर्शाता है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर की घाना यात्रा के दौरान भारत ने इस आकांक्षा का समर्थन किया है।
हालिया संदर्भ और रणनीतिक महत्व
घाना के विदेश मंत्री सैम ओकुदज़ेटो अब्लाक्वा के अनुसार, देश के मंत्रिमंडल ने ब्रिक्स सदस्यता के लिए आवेदन को मंजूरी प्रदान की है। इस निर्णय का उद्देश्य पारंपरिक पश्चिमी वित्तीय संस्थानों (जैसे आईएमएफ और विश्व बैंक) पर निर्भरता को कम करते हुए व्यापार, निवेश और संसाधन संप्रभुता के लिए नए साझेदारों की तलाश करना है। भारत ने इस पहल का स्वागत करते हुए घाना के ब्रिक्स में प्रवेश हेतु अपना समर्थन व्यक्त किया है।
घाना की अवस्थिति और सीमाएं
घाना पश्चिम अफ्रीका के उप-क्षेत्र में अटलांटिक महासागर और गिनी की खाड़ी के तट पर स्थित एक प्रमुख देश है। इसकी भू-सीमाएं तीन पड़ोसी देशों से मिलती हैं: पश्चिम में कोट डी आइवर (आइवरी कोस्ट), उत्तर में बुर्किना फासो, और पूर्व में टोगो। भूगोलीय दृष्टि से शून्य डिग्री देशांतर रेखा यानी प्रधान मध्याह्न रेखा (Prime Meridian) घाना से होकर गुजरती है, जो इसे वैश्विक मानचित्र पर एक विशेष भौगोलिक स्थान प्रदान करती है। देश की राजधानी अकरा है, जो इसका सबसे बड़ा आर्थिक और प्रशासनिक केंद्र है।
भौगोलिक विशेषताएं और जल प्रवाह प्रणाली
घाना की स्थलाकृति में 'ख्वाहू पठार' (Kwahu Plateau) और 'गाम्बागा स्कार्प' (Gambaga Scarp) मुख्य उच्चभूमि और ढलान क्षेत्र का निर्माण करते हैं। देश के सर्वोच्च पर्वत शिखर—माउंट अफाद्जातो (Mount Afadjato), माउंट जेबोबो और माउंट तोरोगबानी—वोल्टा नदी के पूर्व में टोगो सीमा के पास स्थित हैं। देश की जल निकासी प्रणाली पर वोल्टा नदी बेसिन का प्रभुत्व है, जिसमें ब्लैक वोल्टा, व्हाइट वोल्टा और ओटी नदियाँ शामिल हैं। आकोसोंबो बांध द्वारा निर्मित 'वोल्टा झील' (Lake Volta) सतह क्षेत्र के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित कृत्रिम झीलों में से एक है।
अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संसाधन
घाना की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है। सोना (Gold), काकाओ (Cocoa) और हाल के वर्षों में खोजा गया कच्चा तेल (Oil) घाना के आर्थिक विकास और निर्यात आय के मुख्य स्तंभ हैं। घाना अफ्रीका महाद्वीप में सोने के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है। ब्रिक्स में शामिल होने की पहल से देश को अपने इन प्राकृतिक संसाधनों के मूल्यवर्धन और औद्योगिक विकास हेतु नई तकनीकी व वित्तीय मदद मिलने की संभावना है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति हब (NSSH) योजना: समावेशी उद्यमिता का विकास

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति हब (NSSH) योजना: समावेशी उद्यमिता का विकास

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📅 09 Oct2026

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) की प्रमुख योजना 'राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति हब' (NSSH) ने अपनी शुरुआत से लेकर 31 जुलाई 2026 तक 1,90,414 लाभार्थियों को सहायता प्रदान की है और 54,499 उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया है। सार्वजनिक खरीद नीति के तहत SC/ST स्वामित्व वाले उद्यमों की भागीदारी सुनिश्चित करने और इस वर्ग में उद्यमिता संस्कृति को बढ़ावा देने में यह योजना अत्यंत सफल सिद्ध हुई है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति हब (NSSH) योजना: समावेशी उद्यमिता का विकास
सारांश
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) की प्रमुख योजना 'राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति हब' (NSSH) ने अपनी शुरुआत से लेकर 31 जुलाई 2026 तक 1,90,414 लाभार्थियों को सहायता प्रदान की है और 54,499 उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया है। सार्वजनिक खरीद नीति के तहत SC/ST स्वामित्व वाले उद्यमों की भागीदारी सुनिश्चित करने और इस वर्ग में उद्यमिता संस्कृति को बढ़ावा देने में यह योजना अत्यंत सफल सिद्ध हुई है।
हालिया अद्यतन और योजना की प्रगति
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति हब (NSSH) योजना के कार्यान्वयन से SC/ST स्वामित्व वाले सूक्ष्म और लघु उद्यमों (MSEs) से सरकारी खरीद में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्रों द्वारा SC/ST उद्यमों से की जाने वाली खरीद वर्ष 2015-16 के 99.37 करोड़ रुपये से लगभग 39 गुना बढ़कर वर्ष 2025-26 में 4,013.42 करोड़ रुपये तक पहुँच गई है। इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और असम प्रदर्शन के मामले में शीर्ष पांच राज्यों के रूप में उभरे हैं।
योजना का परिचय एवं कार्यान्वयन
NSSH योजना को अक्टूबर 2016 में MSME मंत्रालय द्वारा लॉन्च किया गया था। इस योजना का मुख्य उद्देश्य SC/ST समुदाय के उद्यमियों का क्षमता निर्माण करना और उनमें उद्यमिता संस्कृति को बढ़ावा देना है। इस योजना का कार्यान्वयन 'राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड' (NSIC) द्वारा किया जाता है। योजना के अंतर्गत संयंत्र एवं मशीनरी क्रय सहायता, क्षमता निर्माण, बाजार लिंकेज, ई-कॉमर्स (GeM Portal) ऑनबोर्डिंग और क्रेडिट सुविधा प्रदान की जाती है।
विशेष क्रेडिट लिंक्ड कैपिटल सब्सिडी योजना (SCLCSS)
NSSH का एक सबसे महत्वपूर्ण घटक 'विशेष क्रेडिट लिंक्ड कैपिटल सब्सिडी योजना' (SCLCSS) है। इसके तहत नए और मौजूदा SC/ST स्वामित्व वाले सूक्ष्म और लघु उद्यमों को संस्थागत ऋण के माध्यम से संयंत्र, मशीनरी और उपकरणों में निवेश के लिए 25% तक की पूंजीगत सब्सिडी (अधिकतम ₹25 लाख की सीमा तक) प्रदान की जाती है। यह वित्तीय सहायता विनिर्माण और सेवा दोनों क्षेत्रों के उद्यमों को प्रौद्योगिकी उन्नयन और क्षमता विस्तार के लिए बिना किसी क्षेत्र-विशिष्ट प्रतिबंध के मिलती है।
सार्वजनिक खरीद नीति और रणनीतिक कार्य
सार्वजनिक खरीद नीति (Public Procurement Policy) 2012 के तहत केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों और केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSEs) द्वारा की जाने वाली कुल 25% वार्षिक खरीद में से 4% खरीद SC/ST स्वामित्व वाले उद्यमों से करना अनिवार्य है। NSSH इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उद्योग निकायों के साथ मिलकर संवेदीकरण और विक्रेता विकास कार्यक्रम (Vendor Development Programs) आयोजित करता है। इसके अलावा, 'एकल बिंदु पंजीकरण योजना' (SPRS) के तहत पात्र उद्यमों को टेंडर शुल्क और ईएमडी (EMD) भुगतान से छूट भी दी जाती है।
गोमती नदी में बढ़ते जलस्तर से लखनऊ में बाढ़ की स्थिति

गोमती नदी में बढ़ते जलस्तर से लखनऊ में बाढ़ की स्थिति

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📅 09 Oct2026

उत्तर प्रदेश के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण राजधानी लखनऊ में गोमती नदी का जलस्तर खतरे के निशान के पास पहुँच गया है। इस कारण फैजुल्लागंज, दाऊदनगर और लोहारमऊ जैसे निचले इलाकों तथा तटीय बस्तियों में जलभराव एवं बाढ़ जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है। गंगा की इस प्रमुख सहायक नदी का पारिस्थितिकी तंत्र और शहरी अपवाह प्रबंधन वर्तमान में प्रशासनिक चिंता का मुख्य विषय बना हुआ है।

गोमती नदी में बढ़ते जलस्तर से लखनऊ में बाढ़ की स्थिति
सारांश
उत्तर प्रदेश के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण राजधानी लखनऊ में गोमती नदी का जलस्तर खतरे के निशान के पास पहुँच गया है। इस कारण फैजुल्लागंज, दाऊदनगर और लोहारमऊ जैसे निचले इलाकों तथा तटीय बस्तियों में जलभराव एवं बाढ़ जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है। गंगा की इस प्रमुख सहायक नदी का पारिस्थितिकी तंत्र और शहरी अपवाह प्रबंधन वर्तमान में प्रशासनिक चिंता का मुख्य विषय बना हुआ है।
हालिया संदर्भ और बाढ़ की स्थिति
सितंबर के अंतिम सप्ताह और अक्टूबर 2026 के प्रारंभ में गोमती नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों (कैचमेंट एरिया) में हुई मूसलाधार बारिश के चलते लखनऊ में गोमती नदी उफान पर आ गई है। नदी के बढ़ते जलस्तर से उत्तरी लखनऊ के कई रिहायशी इलाके, जैसे फैजुल्लागंज, दाऊदनगर और राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल परिसर जलमग्न हो गए हैं। जिला प्रशासन द्वारा राहत एवं बचाव कार्यों के लिए दर्जनों राष्ट्रीय व राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF/SDRF) की नावें और स्वास्थ्य टीमें तैनात की गई हैं।
गोमती नदी का उद्गम और मार्ग
गोमती नदी गंगा नदी की एक अत्यंत महत्वपूर्ण मैदानी (Plains-origin) सहायक नदी है। इसका उद्गम उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में स्थित पीलीभीत टाइगर रिजर्व के भीतर माधोटांडा के निकट 'गोमत ताल' (फुल्हर झील) से होता है। पीलीभीत से निकलकर यह नदी लगभग 940 किलोमीटर का सफर तय करते हुए उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से गुजरती है और अंत में गाजीपुर जिले के सैयदपुर/कैथी के पास गंगा नदी में मिल जाती है।
बेसिन की भूवैज्ञानिक संरचना और विशेषताएं
संपूर्ण गोमती बेसिन चतुर्थक कल्प (Quaternary Age) के मोटे जलोढ़ अवसादों (Alluvial Sediments) से आच्छादित है। इन अवसादों में कंकड़, बजरी, रेत, गाद और मिट्टी शामिल हैं। बेसिन को दो भागों में विभाजित किया गया है: 'नवीन जलोढ़' (Younger Alluvium), जो वर्तमान बाढ़ के मैदानों में स्थित है, और 'पुराना जलोढ़' (Older Alluvium), जो उच्च दोआब क्षेत्रों का निर्माण करता है। यह एक बारहमासी (Perennial) नदी है, हालांकि मानसून के अतिरिक्त अन्य मौसमों में इसका प्रवाह काफी धीमा (Sluggish) रहता है।
सहायक नदियाँ, प्रमुख शहर और पारिस्थितिक चुनौतियाँ
गोमती की प्रमुख सहायक नदियों में सई, चौका, कथिना और सरयू शामिल हैं। इसके तट पर लखनऊ के अलावा सुल्तानपुर, जौनपुर और लखीमपुर खीरी जैसे प्रमुख औद्योगिक एवं शहरी केंद्र बसे हुए हैं। अत्यधिक शहरीकरण, औद्योगिक कचरे के अनियोजित निस्तारण और जलीय प्रवाह में कमी के कारण गोमती उत्तर प्रदेश की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक बन गई है। वर्तमान बाढ़ की स्थिति अनियोजित शहरी विकास और नदी के बाढ़ के मैदानों (Floodplains) पर बढ़ते अतिक्रमण की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है।
'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल: समावेशी शिक्षा हेतु राष्ट्रव्यापी संवेदीकरण पहल

'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल: समावेशी शिक्षा हेतु राष्ट्रव्यापी संवेदीकरण पहल

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📅 09 Oct2026

शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (DoSEL) ने 'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल के माध्यम से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के लिए 30 मिनट के संवेदीकरण और ओरिएंटेशन मॉड्यूल का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन आयोजित किया है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act) 2016 के तहत समावेशी और सुलभ शिक्षा वातावरण तैयार करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल: समावेशी शिक्षा हेतु राष्ट्रव्यापी संवेदीकरण पहल
सारांश
शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (DoSEL) ने 'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल के माध्यम से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के लिए 30 मिनट के संवेदीकरण और ओरिएंटेशन मॉड्यूल का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन आयोजित किया है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act) 2016 के तहत समावेशी और सुलभ शिक्षा वातावरण तैयार करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
हालिया संदर्भ और राष्ट्रव्यापी अभियान
अक्टूबर 2026 में, स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (DoSEL) द्वारा देश भर के विद्यालयों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने हेतु एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया गया। इसके तहत 'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल के माध्यम से 30 मिनट के ओरिएंटेशन मॉड्यूल का प्रसारण किया गया, जिसमें 60,000 से अधिक स्कूलों ने भाग लिया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों, प्राचार्यों तथा शिक्षणेत्तर कर्मचारियों (जैसे बस चालक, आया, और लिपिकीय कर्मचारी) को दिव्यांग बच्चों की विशिष्ट आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील बनाना है।
प्रशस्त (PRASHAST) पोर्टल का परिचय
'प्रशस्त' (Pre-Assessment Holistic Screening Tool) एक स्कूल-आधारित डिजिटल दिव्यांगता स्क्रीनिंग टूल है। इसे एनसीईआरटी (NCERT) और शिक्षा मंत्रालय द्वारा विकसित किया गया है। यह उपकरण दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act), 2016 के तहत मान्यता प्राप्त 21 प्रकार की संभावित दिव्यांगताओं की प्रारंभिक पहचान और संदर्भ (Referral) प्रणाली के रूप में कार्य करता है। यह नियमित शिक्षकों, विशेष शिक्षकों और विद्यालय प्रमुखों के लिए एक संरचित मंच प्रदान करता है।
कार्यप्रणाली एवं द्वि-स्तरीय स्क्रीनिंग प्रक्रिया
प्रशस्त पोर्टल की पहचान प्रणाली दो प्रमुख चरणों में विभाजित है। पहले चरण (Part-1) में, नियमित शिक्षक कक्षाओं, खेल के मैदानों और सह-पाठ्यचर्या गतिविधियों में 1 से 2 महीने तक छात्रों के व्यवहार का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं। इसके पश्चात् द्वितीय चरण (Part-2) में, दर्ज किए गए प्रेक्षणों का सत्यापन विशेष शिक्षकों (Special Educators) या परामर्शदाताओं द्वारा किया जाता है। यदि किसी छात्र में संभावित दिव्यांगता के लक्षण पाए जाते हैं, तो उसे विस्तृत चिकित्सा मूल्यांकन और सरकारी प्रमाणपत्र हेतु संदर्भित किया जाता है।
नीतिगत महत्व और संस्थागत प्रभाव
यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के मूलभूत स्तंभों—समता, पहुंच और समावेशिता (Equity, Accessibility, and Inclusivity)—को व्यावहारिक रूप से लागू करने में सहायक है। शुरुआती स्तर पर ही दिव्यांगता का पूर्वाकलन होने से बच्चों के लिए शुरुआती हस्तक्षेप (Early Intervention), सुलभ पठन सामग्री और सहायक उपकरण उपलब्ध कराना सुगम हो जाता है। डिजिटल तकनीक का यह प्रयोग भारतीय स्कूली शिक्षा प्रणाली को अधिक संवेदनशील और बाधारहित (Barrier-free) बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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