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संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट: स्लेटी एग्रेट और पारिस्थितिकी परिवर्तन

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट: स्लेटी एग्रेट और पारिस्थितिकी परिवर्तन

Delight News
📅 09 Oct2026

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बोत्सवाना के ओकावांगो डेल्टा में पाई जाने वाली दुर्लभ जलपक्षी प्रजाति 'स्लेटी एग्रेट' (Slaty Egret) के व्यवहार और प्रजनन स्थलों में महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किए गए हैं। यह बदलाव अफ्रीकी आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे व्यापक बदलावों का स्पष्ट संकेत प्रस्तुत करता है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट: स्लेटी एग्रेट और पारिस्थितिकी परिवर्तन
सारांश
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बोत्सवाना के ओकावांगो डेल्टा में पाई जाने वाली दुर्लभ जलपक्षी प्रजाति 'स्लेटी एग्रेट' (Slaty Egret) के व्यवहार और प्रजनन स्थलों में महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किए गए हैं। यह बदलाव अफ्रीकी आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे व्यापक बदलावों का स्पष्ट संकेत प्रस्तुत करता है।
हालिया संदर्भ और व्यवहारिक परिवर्तन
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) तथा अफ्रीकी-यूरेशियाई प्रवासी जलपक्षी समझौते (AEWA) के अधिकारियों ने स्लेटी एग्रेट (Egretta vinaceigula) के बदलते व्यवहार पर ध्यान आकर्षित किया है। वैश्विक स्तर पर केवल 3,000 से 5,000 की सीमित आबादी वाले इस जलपक्षी के स्थापित प्रजनन स्थल दावानल और हाथियों की गतिविधियों के कारण नष्ट हो रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप पक्षी नए और अप्रत्याशित क्षेत्रों में अपने घोंसले बना रहे हैं, जिसे वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन का प्रत्यक्ष संकेतक मान रहे हैं।
भौगोलिक वितरण और प्राकृतिक आवास
स्लेटी एग्रेट मुख्य रूप से दक्षिण-मध्य अफ्रीका के सीमित भौगोलिक क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी वैश्विक आबादी का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बोत्सवाना के ओकावांगो डेल्टा में केंद्रित है, जबकि कुछ छोटी आबादी ज़ाम्बिया और पड़ोसी देशों के प्लाडप्लेन्स (बाढ़ के मैदानों) में पाई जाती है। यह शर्मीली प्रकृति का पक्षी मौसमी आर्द्रभूमियों, दलदली भूभागों और घनी जलीय वनस्पतियों वाले द्वीपों में रहना और प्रजनन करना पसंद करता है।
शारीरिक विशेषताएं और शिकार तकनीक
स्लेटी एग्रेट एक छोटा और दुबला-पतला जलपक्षी है, जिसकी लंबी टांगें और लंबी गर्दन बगुला (Egret) प्रजाति की विशिष्ट पहचान दर्शाती हैं। इसके पंखों का रंग हल्का बैंगनी झांई वाला सलेटी-धूसर (Slaty Gray) होता है। शिकार के लिए यह पक्षी 'फुट-रफ्लिंग' (Foot-Ruffling) तकनीक का उपयोग करता है, जिसमें वह अपने पैरों से पानी में हलचल पैदा करके मछलियों, उभयचरों और जलीय अकशेरुक जीवों (Invertebrates) को बाहर निकालकर उनका शिकार करता है।
संकट के कारक और संरक्षण स्थिति
यह प्रजाति अपनी जीवन शैली के लिए आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र पर पूर्णतः निर्भर है, जिससे यह पर्यावास विनाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है। कृषि विस्तार, जल प्रबंधन नीतियों में बदलाव, और जलवायु परिवर्तन से ओकावांगो डेल्टा के वार्षिक जल प्रवाह में अनिश्चितता इसके मुख्य खतरे हैं। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में स्लेटी एग्रेट को 'असुरक्षित' (Vulnerable - VU) श्रेणी में रखा गया है।
भवानीसागर बांध से जल निकासी की मांग: कालिंगरायण किसानों का विरोध प्रदर्शन

भवानीसागर बांध से जल निकासी की मांग: कालिंगरायण किसानों का विरोध प्रदर्शन

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📅 09 Oct2026

तमिलनाडु के ईरोड जिले में स्थित भवानीसागर बांध (लोअर भवानी बांध) से कालिंगरायण नहर में सिंचाई के पानी की निकासी को लेकर अयकत किसानों द्वारा व्यापक विरोध प्रदर्शन किया गया है। कावेरी की सहायक भवानी नदी पर बना यह बहुउद्देशीय मिट्टियों का बांध (Earthen Dam) कृषि, पेयजल, बाढ़ नियंत्रण और जलविद्युत उत्पादन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भवानीसागर बांध से जल निकासी की मांग: कालिंगरायण किसानों का विरोध प्रदर्शन
सारांश
तमिलनाडु के ईरोड जिले में स्थित भवानीसागर बांध (लोअर भवानी बांध) से कालिंगरायण नहर में सिंचाई के पानी की निकासी को लेकर अयकत किसानों द्वारा व्यापक विरोध प्रदर्शन किया गया है। कावेरी की सहायक भवानी नदी पर बना यह बहुउद्देशीय मिट्टियों का बांध (Earthen Dam) कृषि, पेयजल, बाढ़ नियंत्रण और जलविद्युत उत्पादन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हालिया संदर्भ और किसान आंदोलन
हाल ही में तमिलनाडु के ईरोड जिला कलेक्ट्रेट परिसर में कालिंगरायण अयकत किसानों द्वारा एक दिवसीय धरना और विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया। किसानों की मुख्य मांग भवानीसागर बांध से कालिंगरायण नहर में फसल सीजन हेतु पर्याप्त जल छोड़ने की है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की अनियमितता और जल संसाधनों के असमान वितरण के कारण खड़ी फसलों में नमी के तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। जल संसाधन विभाग (WRD) द्वारा समय पर कार्रवाई न किए जाने के विरोध में किसानों ने जिला प्रशासन से हस्तक्षेप का अनुरोध किया है।
भवानीसागर बांध की अवस्थिति और भौगोलिक विशेषता
भवानीसागर बांध, जिसे 'लोअर भवानी बांध' के नाम से भी जाना जाता है, तमिलनाडु के ईरोड जिले में स्थित है। यह बांध कावेरी नदी की एक प्रमुख दाहिनी तट की सहायक नदी 'भवानी नदी' पर निर्मित है। भौगोलिक दृष्टि से यह नीलगिरी पहाड़ियों के पूर्वी ढलानों पर पश्चिमी घाट की लंबी नदी शृंखला के निचले छोर (Tail End) पर स्थित है। यह तमिलनाडु का दूसरा सबसे बड़ा बांध है और राज्य के कृषि अवसंरचनात्मक ढांचे का प्रमुख आधार माना जाता है।
निर्माण, संरचना एवं बहुउद्देशीय उपयोगिता
स्वतंत्रता के पश्चात् इस बहुउद्देशीय परियोजना का निर्माण वर्ष 1948 से 1955 के मध्य पूरा किया गया था। भवानीसागर बांध विश्व के सबसे बड़े मृदा/मिट्टी से बने बांधों (Earthen Dams) में से एक है। एक बहुउद्देशीय संरचना होने के नाते यह मुख्यतः सिंचाई जल भंडारण, जलविद्युत उत्पादन, आसपास के क्षेत्रों के लिए पेयजल आपूर्ति, निचले इलाकों में बाढ़ नियंत्रण और निचले प्रवाह में गाद (Silt) के जमाव को नियंत्रित करने का कार्य करता है।
नहर प्रणाली और जल विवाद का पारिस्थितिक पहलू
यह बांध मुख्य रूप से लोअर भवानी प्रोजेक्ट (LBP) नहर और कालिंगरायण नहर प्रणाली को जल की आपूर्ति करता है। यह नहर प्रणाली ईरोड और आसपास के जिलों में लाखों एकड़ कृषि भूमि को सिंचित करती है। हालांकि, मानसून की विफलता और अपवाह में कमी के कारण ऊपरी और निचले कमान क्षेत्रों के किसानों के बीच जल आवंटन को लेकर अक्सर विवाद पैदा होता है। जल संसाधनों का यह संकट नदी बेसिन प्रबंधन (River Basin Management) और जलवायु अनुकूल कृषि नीतियों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
बिलीगिरी रंगा बेट्टा क्षेत्र में देखा गया दुर्लभ ग्रीन कीलबैक सांप

बिलीगिरी रंगा बेट्टा क्षेत्र में देखा गया दुर्लभ ग्रीन कीलबैक सांप

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📅 09 Oct2026

कर्नाटक के चामराजनगर जिले स्थित बिलीगिरी रंगा बेट्टा (BR Hills) के पास हाल ही में 'ग्रीन कीलबैक' नामक एक विषहीन अर्ध-जलीय सांप पाया गया है। यह प्रजाति मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के आर्द्रभूमियों में निवास करती है। जैव विविधता, वितरण और पारिस्थितिकी के लिहाज से यह खोज सिविल सेवा परीक्षा के पर्यावरण खंड के लिए महत्वपूर्ण है।

बिलीगिरी रंगा बेट्टा क्षेत्र में देखा गया दुर्लभ ग्रीन कीलबैक सांप
सारांश
कर्नाटक के चामराजनगर जिले स्थित बिलीगिरी रंगा बेट्टा (BR Hills) के पास हाल ही में 'ग्रीन कीलबैक' नामक एक विषहीन अर्ध-जलीय सांप पाया गया है। यह प्रजाति मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के आर्द्रभूमियों में निवास करती है। जैव विविधता, वितरण और पारिस्थितिकी के लिहाज से यह खोज सिविल सेवा परीक्षा के पर्यावरण खंड के लिए महत्वपूर्ण है।
परिचय और अद्यतन संदर्भ
ग्रीन कीलबैक (वैज्ञानिक नाम: Macropisthodon plumbicolor या Rhabdophis plumbicolor) एक गैर-विषैला, अर्ध-जलीय सर्प है जो दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल निवासी है। हाल ही में कर्नाटक के चामराजनगर जिले के येलंदूर तालुक में बिलीगिरी रंगा बेट्टा (BR Hills) वन्यजीव अभयारण्य की सीमा से सटे गंगावाड़ी गांव के पास इसे देखा गया है। आमतौर पर यह प्रजाति भारत के पूर्वी क्षेत्रों, मध्य एशिया और श्रीलंका के पहाड़ी और वनीय इलाकों में पाई जाती है। पश्चिमी घाट के इस संक्रमणकालीन गलियारे में इसकी उपस्थिति क्षेत्र की समृद्ध सरिसृप जैव विविधता को रेखांकित करती है।
भौगोलिक वितरण और प्राकृतिक आवास
ग्रीन कीलबैक का भौगोलिक प्रसार भारत, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया के विभिन्न भागों में फैला हुआ है। पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से यह प्रजाति आर्द्रभूमि पर अत्यधिक निर्भर है। यह मुख्य रूप से तालाबों, नदियों, जलधाराओं, धान के खेतों और दलदली इलाकों में पाई जाती है। प्रचुर वनस्पति वाले नमीयुक्त क्षेत्र इसका पसंदीदा आवास हैं, जहाँ यह जल और थलीय वनस्पतियों के बीच आसानी से शिकार कर सकती है।
शारीरिक विशेषताएं और अनुकूलन
यह मध्यम आकार का सर्प है जिसकी सामान्य लंबाई 60 सेंटीमीटर से 1 मीटर तक होती है, हालांकि कुछ वयस्क 1.2 मीटर तक बढ़ सकते हैं। इसका शरीर हरे रंग की विभिन्न शेड्स का होता है जिसके नीचे का हिस्सा हल्का पीला या सफेद होता है। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता इसकी त्वचा पर मौजूद 'कील्स' (Pronounced Ridges) हैं। यह उभरी हुई संरचनाएं सांप को जलीय सतह पर तैरने और घनी वनस्पतियों में चढ़ने के लिए आवश्यक पकड़ प्रदान करती हैं। इसका सिर त्रिकोणीय, आंखें बड़ी व गोल तथा पूंछ पतली होती है, जो तैरते समय पतवार (Rudder) की तरह काम करती है।
संरक्षण स्थिति एवं पारिस्थितिक महत्व
अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में ग्रीन कीलबैक को 'संकटमुक्त' (Least Concern - LC) श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। गैर-विषैला होने के कारण यह पारिस्थितिकी तंत्र में खाद्य जाल को संतुलित रखने में सहायक है, विशेष रूप से उभयचरों और कीटों की आबादी को नियंत्रित करने में। जलीय और थलीय दोनों पारिस्थितिक तंत्रों के बीच इसका संतुलन बनाए रखना क्षेत्रीय पर्यावरण की अनुकूलता का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) और विमानन क्षेत्र का नियमन

अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) और विमानन क्षेत्र का नियमन

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📅 08 Oct2026

अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) ने मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल 1 के पुनर्विकास के दौरान मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) की अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी को सुरक्षित रखने के लिए एयरपोर्ट ऑपरेटर और एयरलाइंस के बीच परामर्श आधारित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया है।

अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) और विमानन क्षेत्र का नियमन
सारांश
अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) ने मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल 1 के पुनर्विकास के दौरान मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) की अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी को सुरक्षित रखने के लिए एयरपोर्ट ऑपरेटर और एयरलाइंस के बीच परामर्श आधारित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया है।
अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) का परिचय
IATA दुनिया भर की एयरलाइंस का एक वैश्विक व्यापार संघ है, जो यात्री और मालवाहक दोनों प्रकार के विमानन परिचालनों को कवर करता है। इसकी स्थापना वर्ष 1945 में क्यूबा की राजधानी हवाना में की गई थी, जो 1919 में गठित 'अंतर्राष्ट्रीय वायु यातायात संघ' का उत्तराधिकारी संगठन है। इसका मुख्यालय कनाडा के मांट्रियल शहर में स्थित है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार लोगों और सामानों के सुरक्षित, सुरक्षित और कुशल परिवहन को सुनिश्चित करना तथा एयरलाइंस के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है।
प्रमुख कार्यक्षेत्र और गतिविधियाँ
IATA का मुख्य कामकाज तीन प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित होता है: पहला, अंतरराष्ट्रीय हवाई परिवहन में उपयोग होने वाली प्रक्रियाओं और दस्तावेजों का मानकीकरण करना; दूसरा, विशेष रूप से खतरनाक या नाशवान वस्तुओं के परिवहन के लिए तकनीकी नियमों का विकास करना; और तीसरा, वित्तीय सहयोग और निपटान प्रणालियों का संचालन करना जो एयरलाइंस को वैश्विक परिवहन नेटवर्क संचालित करने में सक्षम बनाती हैं। वर्तमान में इसमें 126 देशों और क्षेत्रों की 370 से अधिक सदस्य एयरलाइंस शामिल हैं, जो कुल वैश्विक हवाई यातायात का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा संभालती हैं।
IATA और ICAO में अंतर
भले ही IATA और ICAO दोनों विमानन उद्योग की सेवा करते हैं, लेकिन दोनों की प्रकृति और कार्यक्षेत्र में बुनियादी अंतर है। IATA अपने सदस्य एयरलाइंस के लिए व्यावसायिक और परिचालन मानक स्थापित करता है तथा उनके हितों की पैरवी करता है, जबकि 'अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन' (ICAO) सदस्य देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन के नियम, मानक और उड़ान प्रक्रिया से जुड़ी कार्यप्रणाली तय करता है।
वर्तमान विवाद और नवीनतम परिदृश्य
हाल ही में मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल 1 (T1) के पुनर्विकास कार्य और उड़ानों के समंजन को लेकर IATA ने चिंता व्यक्त की है। टर्मिनल के पुनर्विकास के दौरान उड़ानों के अस्थायी स्थगन और स्लॉट कटौती से वैश्विक कनेक्टिविटी पर पड़ने वाले असर को रोकने के लिए IATA ने एयरलाइंस और मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (MIAL) के बीच पारदर्शी समन्वय और वैकल्पिक उपायों की मांग की है।
​कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV): वन्यजीव संरक्षण के लिए गंभीर खतरा

​कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV): वन्यजीव संरक्षण के लिए गंभीर खतरा

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📅 08 Oct2026

मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) के संक्रमण से उपचाराधीन एक बाघिन की मृत्यु हो गई है। यह घातक वायरल बीमारी घरेलू कुत्तों से जंगली मांसाहारी जानवरों में फैलती है, जो देश के लुप्तप्राय बाघों और अन्य वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए एक बड़ा संकट बनती जा रही है।

कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV): वन्यजीव संरक्षण के लिए गंभीर खतरा
सारांश
मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) के संक्रमण से उपचाराधीन एक बाघिन की मृत्यु हो गई है। यह घातक वायरल बीमारी घरेलू कुत्तों से जंगली मांसाहारी जानवरों में फैलती है, जो देश के लुप्तप्राय बाघों और अन्य वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए एक बड़ा संकट बनती जा रही है।
परिचय एवं प्रभाव
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) एक अत्यधिक संक्रामक और गंभीर बीमारी है, जो पैरामिक्सोविरिडे परिवार के सिंगल-स्ट्रैंडेड आरएनए वायरस के कारण होती है। यह एक बहु-प्रणालीगत (multi-systemic) संक्रमण है जो मुख्य रूप से श्वेत रक्त कोशिकाओं और शरीर के श्वसन तंत्र, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (पाचन) और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) पर हमला करता है। इस घातक संक्रमण की मृत्यु दर बहुत अधिक होती है, जिससे यह वन्यजीवों के लिए विशेष रूप से खतरनाक माना जाता है। ऐतिहासिक रूप से इसने गुजरात के गिर जंगलों में एशियाई शेरों और दुनिया के अन्य हिस्सों में वन्यजीवों की आबादी को भारी नुकसान पहुंचाया है।
संक्रमण के स्रोत एवं संचरण
यह वायरस मुख्य रूप से घरेलू कुत्तों (जो इसके प्रमुख प्राकृतिक संवाहक हैं) से वन्यजीवों में फैलता है। स्वस्थ जानवर संक्रमित जीवों के श्वसन स्राव, जैसे लार, नाक से निकलने वाले तरल और छींक के संपर्क में आने से तेजी से संक्रमित होते हैं। इसके अलावा, दूषित सतहों, साझा किए गए पानी या भोजन के बर्तन तथा संक्रमित शवों को खाने से भी यह वायरस फैलता है। हालांकि यह पर्यावरण में लंबे समय तक जीवित नहीं रहता और सामान्य कीटानाशकों से नष्ट हो जाता है, लेकिन संक्रमित जानवर लक्षण दिखने से पहले ही हफ्तों तक वायरस छोड़ते रहते हैं।
प्रमुख लक्षण और स्वास्थ्य पर असर
संक्रमण के शुरुआती चरणों में आंखों में मवाद, नाक बहना, भूख न लगना, खांसी, निमोनिया और बुखार जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। रोग के गंभीर होने पर यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, जिससे उल्टी, दस्त, पंजे के तलुओं और नाक की त्वचा का सख्त होना (हार्ड पैड डिजीज), जबड़े के झटके, दौरे, मांसपेशियों में अकड़न और संतुलन बिगड़ने जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। कई बार संक्रमित बाघ अजीब व्यवहार करते हैं और बिना डर के बस्तियों की ओर आ जाते हैं।
उपचार और निवारक उपाय
वर्तमान में इस वायरल संक्रमण के लिए कोई विशिष्ट इलाज या एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है। इसका उपचार पूरी तरह से लक्षणों के प्रबंधन, सहायक देखभाल (जैसे अंतःशिरा तरल पदार्थ) और द्वितीयक जीवाणु संक्रमण को रोकने के लिए एंटीबायोटिक्स पर निर्भर करता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इस खतरे से निपटने का सबसे प्रभावी उपाय समय पर टीकाकरण करना और वन क्षेत्रों के पास रहने वाले घरेलू तथा आवारा कुत्तों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण कर 'हर्ड इम्युनिटी' विकसित करना है।

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