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नीलगिरि पहाड़ियों में वसंतपुच्छ (स्प्रिंगटेल्स) की दो नई प्रजातियों की खोज

नीलगिरि पहाड़ियों में वसंतपुच्छ (स्प्रिंगटेल्स) की दो नई प्रजातियों की खोज

Delight News
📅 09 Oct2026

वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट की नीलगिरि पहाड़ियों में मिट्टी में निवास करने वाले सूक्ष्म जीवों 'स्प्रिंगटेल्स' (Springtails) की दो नई प्रजातियों—'फॉल्सोमिया सीगा' (Folsomia ciega) और 'फॉल्सोमिया यूनियोकुलेटा' (Folsomia unioculata) की खोज की है। इस नई खोज के साथ ही भारत में 'फॉल्सोमिया' वंश की कुल प्रजातियों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है। जैव विविधता और पर्यावरण अध्ययन की दृष्टि से यह खोज महत्वपूर्ण है।

नीलगिरि पहाड़ियों में वसंतपुच्छ (स्प्रिंगटेल्स) की दो नई प्रजातियों की खोज
सारांश
वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट की नीलगिरि पहाड़ियों में मिट्टी में निवास करने वाले सूक्ष्म जीवों 'स्प्रिंगटेल्स' (Springtails) की दो नई प्रजातियों—'फॉल्सोमिया सीगा' (Folsomia ciega) और 'फॉल्सोमिया यूनियोकुलेटा' (Folsomia unioculata) की खोज की है। इस नई खोज के साथ ही भारत में 'फॉल्सोमिया' वंश की कुल प्रजातियों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है। जैव विविधता और पर्यावरण अध्ययन की दृष्टि से यह खोज महत्वपूर्ण है।
हालिया संदर्भ और नई प्रजातियों की खोज
हाल ही में तमिलनाडु स्थित पश्चिमी घाट की नीलगिरि पहाड़ियों से मिट्टी और पत्तों के ढेर (Leaf Litter) के नमूनों के विश्लेषण के दौरान स्प्रिंगटेल्स की दो नई प्रजातियों की पहचान की गई। यह शोध ऊटी स्थित गवर्नमेंट आर्ट्स कॉलेज के मॉलिक्यूलर बायोडायवर्सिटी लैब द्वारा माइक्रोस्कोपिक जांच और डीएनए बारकोडिंग तकनीक के संयोजन से पूरा किया गया। इस खोज ने भारत में फॉल्सोमिया (Folsomia) जीनस के तहत ज्ञात प्रजातियों की कुल संख्या को 13 तक पहुंचा दिया है।
शारीरिक विशेषताएं और नामकरण
खोज की गई पहली प्रजाति 'फॉल्सोमिया सीगा' (Folsomia ciega) का नाम स्पैनिश शब्द 'सीगा' (जिसका अर्थ 'अंधा' होता है) के आधार पर रखा गया है, क्योंकि इसमें आंखों का पूर्णतः अभाव होता है। यह लगभग 1 मिमी आकार का पीला और लंबा सूक्ष्म जीव है। दूसरी प्रजाति 'फॉल्सोमिया यूनियोकुलेटा' (Folsomia unioculata) का नाम लैटिन शब्द 'यूनियोकुलेटा' ('एक आंख वाली') पर आधारित है, जिसके सिर के दोनों ओर केवल एक-एक आंख होती है और यह 1.3 मिमी तक बढ़ती है।
स्प्रिंगटेल्स का परिचय और शारीरिक संरचना
स्प्रिंगटेल्स (Collembola) पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे सूक्ष्म आर्थ्रोपोड्स (Arthropods) में से एक हैं। इनका आकार आमतौर पर 0.2 मिमी से लेकर अधिकतम 10 मिमी तक होता है। ये पंखहीन कीट-सदृश जीव होते हैं, जिनका शरीर तीन भागों (सिर, वक्ष और उदर) में विभाजित होता है। इनकी त्वचा पर षट्कोणीय या वर्गाकार दानेदार संरचनाएं होती हैं जो जल-विरोधी (Water-repellent) और स्व-सफाई (Self-cleaning) की क्षमता रखती हैं।
पारिस्थितिक महत्व और भूमिका
स्प्रिंगटेल्स मुख्य रूप से नम मिट्टी, सड़ने वाली वनस्पतियों और जैविक कचरे के भीतर निवास करते हैं। ये सूक्ष्मजीव मृदा पारिस्थितिकी तंत्र में अपघटक (Decomposers) के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं और पोषक तत्वों के चक्रण (Nutrient Cycling) को सुगम बनाते हैं। इसके अलावा, ये मृदा खाद्य जाल (Soil Food Web) का एक आवश्यक घटक हैं, जो सूक्ष्म कवक और बैक्टीरिया की आबादी को नियंत्रित रखते हैं।
असम के नामेरी टाइगर रिजर्व को मिला वैश्विक CA|TS मान्यता दर्जा

असम के नामेरी टाइगर रिजर्व को मिला वैश्विक CA|TS मान्यता दर्जा

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📅 09 Oct2026

असम के नामेरी टाइगर रिजर्व को 'संरक्षण आश्वस्त | बाघ मानक' (CA|TS) का अनुमोदित दर्जा प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही असम के सभी चार टाइगर रिजर्व (काजीरंगा, मानस, ओरांग और नामेरी) अब CA|TS से मान्यता प्राप्त हो गए हैं। CA|TS एक वैश्विक तंत्र है जो बाघ संरक्षण क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन, आवास रखरखाव, सामुदायिक भागीदारी और वन्यजीव निगरानी के मानकों का आकलन करता है।

असम के नामेरी टाइगर रिजर्व को मिला वैश्विक CA|TS मान्यता दर्जा
सारांश
असम के नामेरी टाइगर रिजर्व को 'संरक्षण आश्वस्त | बाघ मानक' (CA|TS) का अनुमोदित दर्जा प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही असम के सभी चार टाइगर रिजर्व (काजीरंगा, मानस, ओरांग और नामेरी) अब CA|TS से मान्यता प्राप्त हो गए हैं। CA|TS एक वैश्विक तंत्र है जो बाघ संरक्षण क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन, आवास रखरखाव, सामुदायिक भागीदारी और वन्यजीव निगरानी के मानकों का आकलन करता है।
हालिया अद्यतन और नामेरी का उपलब्धि
हाल ही में असम के शोणितपुर जिले में स्थित नामेरी टाइगर रिजर्व को अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी समिति द्वारा CA|TS (Conservation Assured | Tiger Standards) स्वीकृत दर्जा प्रदान किया गया। इस मान्यता के साथ ही असम राज्य अपने सभी चारों घोषित टाइगर रिजर्व (काजीरंगा, मानस, ओरांग और नामेरी) को अंतर्राष्ट्रीय CA|TS प्रमाणन दिलाने वाला अग्रणी राज्य बन गया है। नामेरी का यह दर्जा वन्यजीव सुरक्षा, वैज्ञानिक निगरानी, और स्थानीय समुदायों के सहयोग से चलाए जा रहे संरक्षण प्रयासों का परिणाम है।
CA|TS की संरचना और कार्यान्वयन
संरक्षण आश्वस्त | बाघ मानक (CA|TS) की शुरुआत वर्ष 2013 में जापान में आयोजित प्रथम एशियाई पार्क कांग्रेस में की गई थी। यह बाघ सीमा वाले देशों में संरक्षण क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन का आकलन करने वाला एक वैश्विक प्रमाणन ढांचा है। भारत में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के अंतर्गत ग्लोबल टाइगर फोरम (GTF) और WWF-इंडिया इसके प्रमुख कार्यान्वयन भागीदार के रूप में कार्य करते हैं। यह ढांचा 7 स्तंभों (Pillars) और 17 तत्वों पर आधारित है, जिनमें महत्व, प्रबंधन, समुदाय, पर्यटन, सुरक्षा, आवास प्रबंधन और बाघ आबादी शामिल हैं।
भारत में मान्यता प्राप्त अन्य टाइगर रिजर्व
नामेरी के अतिरिक्त भारत के कई अन्य प्रमुख टाइगर रिजर्वों ने CA|TS मान्यता प्राप्त की है। इनमें असम के काजीरंगा, मानस और ओरांग के अलावा पश्चिम बंगाल का सुंदरबन; बिहार का वाल्मीकि; उत्तर प्रदेश का दुधवा; मध्य प्रदेश के कान्हा, पन्ना और सतपुड़ा; महाराष्ट्र का पेंच; तमिलनाडु के अनामलाई और मुदुमलाई; केरल का परम्बिकुलम; तथा कर्नाटक का बांदीपुर टाइगर रिजर्व शामिल हैं। ये सभी रिजर्व वैश्विक मानकों के अनुरूप बाघ संरक्षण का निष्पादन कर रहे हैं।
नामेरी का भौगोलिक एवं पारिस्थितिक महत्व
नामेरी टाइगर रिजर्व असम के शोणितपुर जिले में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर स्थित है। यह जिया भोरली नदी से जुड़ा हुआ है और अरुणाचल प्रदेश के पाके टाइगर रिजर्व के साथ सटा हुआ एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक गलियारा बनाता है। यह क्षेत्र न केवल बाघों के लिए, बल्कि एशियाई हाथियों, तेंदुए, क्लाउडेड लेपर्ड और दुर्लभ पक्षी प्रजातियों के लिए एक सुरक्षित प्राकृतिक आवास प्रदान करता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट: स्लेटी एग्रेट और पारिस्थितिकी परिवर्तन

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट: स्लेटी एग्रेट और पारिस्थितिकी परिवर्तन

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📅 09 Oct2026

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बोत्सवाना के ओकावांगो डेल्टा में पाई जाने वाली दुर्लभ जलपक्षी प्रजाति 'स्लेटी एग्रेट' (Slaty Egret) के व्यवहार और प्रजनन स्थलों में महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किए गए हैं। यह बदलाव अफ्रीकी आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे व्यापक बदलावों का स्पष्ट संकेत प्रस्तुत करता है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट: स्लेटी एग्रेट और पारिस्थितिकी परिवर्तन
सारांश
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बोत्सवाना के ओकावांगो डेल्टा में पाई जाने वाली दुर्लभ जलपक्षी प्रजाति 'स्लेटी एग्रेट' (Slaty Egret) के व्यवहार और प्रजनन स्थलों में महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किए गए हैं। यह बदलाव अफ्रीकी आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे व्यापक बदलावों का स्पष्ट संकेत प्रस्तुत करता है।
हालिया संदर्भ और व्यवहारिक परिवर्तन
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) तथा अफ्रीकी-यूरेशियाई प्रवासी जलपक्षी समझौते (AEWA) के अधिकारियों ने स्लेटी एग्रेट (Egretta vinaceigula) के बदलते व्यवहार पर ध्यान आकर्षित किया है। वैश्विक स्तर पर केवल 3,000 से 5,000 की सीमित आबादी वाले इस जलपक्षी के स्थापित प्रजनन स्थल दावानल और हाथियों की गतिविधियों के कारण नष्ट हो रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप पक्षी नए और अप्रत्याशित क्षेत्रों में अपने घोंसले बना रहे हैं, जिसे वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन का प्रत्यक्ष संकेतक मान रहे हैं।
भौगोलिक वितरण और प्राकृतिक आवास
स्लेटी एग्रेट मुख्य रूप से दक्षिण-मध्य अफ्रीका के सीमित भौगोलिक क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी वैश्विक आबादी का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बोत्सवाना के ओकावांगो डेल्टा में केंद्रित है, जबकि कुछ छोटी आबादी ज़ाम्बिया और पड़ोसी देशों के प्लाडप्लेन्स (बाढ़ के मैदानों) में पाई जाती है। यह शर्मीली प्रकृति का पक्षी मौसमी आर्द्रभूमियों, दलदली भूभागों और घनी जलीय वनस्पतियों वाले द्वीपों में रहना और प्रजनन करना पसंद करता है।
शारीरिक विशेषताएं और शिकार तकनीक
स्लेटी एग्रेट एक छोटा और दुबला-पतला जलपक्षी है, जिसकी लंबी टांगें और लंबी गर्दन बगुला (Egret) प्रजाति की विशिष्ट पहचान दर्शाती हैं। इसके पंखों का रंग हल्का बैंगनी झांई वाला सलेटी-धूसर (Slaty Gray) होता है। शिकार के लिए यह पक्षी 'फुट-रफ्लिंग' (Foot-Ruffling) तकनीक का उपयोग करता है, जिसमें वह अपने पैरों से पानी में हलचल पैदा करके मछलियों, उभयचरों और जलीय अकशेरुक जीवों (Invertebrates) को बाहर निकालकर उनका शिकार करता है।
संकट के कारक और संरक्षण स्थिति
यह प्रजाति अपनी जीवन शैली के लिए आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र पर पूर्णतः निर्भर है, जिससे यह पर्यावास विनाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है। कृषि विस्तार, जल प्रबंधन नीतियों में बदलाव, और जलवायु परिवर्तन से ओकावांगो डेल्टा के वार्षिक जल प्रवाह में अनिश्चितता इसके मुख्य खतरे हैं। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में स्लेटी एग्रेट को 'असुरक्षित' (Vulnerable - VU) श्रेणी में रखा गया है।
भवानीसागर बांध से जल निकासी की मांग: कालिंगरायण किसानों का विरोध प्रदर्शन

भवानीसागर बांध से जल निकासी की मांग: कालिंगरायण किसानों का विरोध प्रदर्शन

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📅 09 Oct2026

तमिलनाडु के ईरोड जिले में स्थित भवानीसागर बांध (लोअर भवानी बांध) से कालिंगरायण नहर में सिंचाई के पानी की निकासी को लेकर अयकत किसानों द्वारा व्यापक विरोध प्रदर्शन किया गया है। कावेरी की सहायक भवानी नदी पर बना यह बहुउद्देशीय मिट्टियों का बांध (Earthen Dam) कृषि, पेयजल, बाढ़ नियंत्रण और जलविद्युत उत्पादन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भवानीसागर बांध से जल निकासी की मांग: कालिंगरायण किसानों का विरोध प्रदर्शन
सारांश
तमिलनाडु के ईरोड जिले में स्थित भवानीसागर बांध (लोअर भवानी बांध) से कालिंगरायण नहर में सिंचाई के पानी की निकासी को लेकर अयकत किसानों द्वारा व्यापक विरोध प्रदर्शन किया गया है। कावेरी की सहायक भवानी नदी पर बना यह बहुउद्देशीय मिट्टियों का बांध (Earthen Dam) कृषि, पेयजल, बाढ़ नियंत्रण और जलविद्युत उत्पादन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हालिया संदर्भ और किसान आंदोलन
हाल ही में तमिलनाडु के ईरोड जिला कलेक्ट्रेट परिसर में कालिंगरायण अयकत किसानों द्वारा एक दिवसीय धरना और विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया। किसानों की मुख्य मांग भवानीसागर बांध से कालिंगरायण नहर में फसल सीजन हेतु पर्याप्त जल छोड़ने की है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की अनियमितता और जल संसाधनों के असमान वितरण के कारण खड़ी फसलों में नमी के तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। जल संसाधन विभाग (WRD) द्वारा समय पर कार्रवाई न किए जाने के विरोध में किसानों ने जिला प्रशासन से हस्तक्षेप का अनुरोध किया है।
भवानीसागर बांध की अवस्थिति और भौगोलिक विशेषता
भवानीसागर बांध, जिसे 'लोअर भवानी बांध' के नाम से भी जाना जाता है, तमिलनाडु के ईरोड जिले में स्थित है। यह बांध कावेरी नदी की एक प्रमुख दाहिनी तट की सहायक नदी 'भवानी नदी' पर निर्मित है। भौगोलिक दृष्टि से यह नीलगिरी पहाड़ियों के पूर्वी ढलानों पर पश्चिमी घाट की लंबी नदी शृंखला के निचले छोर (Tail End) पर स्थित है। यह तमिलनाडु का दूसरा सबसे बड़ा बांध है और राज्य के कृषि अवसंरचनात्मक ढांचे का प्रमुख आधार माना जाता है।
निर्माण, संरचना एवं बहुउद्देशीय उपयोगिता
स्वतंत्रता के पश्चात् इस बहुउद्देशीय परियोजना का निर्माण वर्ष 1948 से 1955 के मध्य पूरा किया गया था। भवानीसागर बांध विश्व के सबसे बड़े मृदा/मिट्टी से बने बांधों (Earthen Dams) में से एक है। एक बहुउद्देशीय संरचना होने के नाते यह मुख्यतः सिंचाई जल भंडारण, जलविद्युत उत्पादन, आसपास के क्षेत्रों के लिए पेयजल आपूर्ति, निचले इलाकों में बाढ़ नियंत्रण और निचले प्रवाह में गाद (Silt) के जमाव को नियंत्रित करने का कार्य करता है।
नहर प्रणाली और जल विवाद का पारिस्थितिक पहलू
यह बांध मुख्य रूप से लोअर भवानी प्रोजेक्ट (LBP) नहर और कालिंगरायण नहर प्रणाली को जल की आपूर्ति करता है। यह नहर प्रणाली ईरोड और आसपास के जिलों में लाखों एकड़ कृषि भूमि को सिंचित करती है। हालांकि, मानसून की विफलता और अपवाह में कमी के कारण ऊपरी और निचले कमान क्षेत्रों के किसानों के बीच जल आवंटन को लेकर अक्सर विवाद पैदा होता है। जल संसाधनों का यह संकट नदी बेसिन प्रबंधन (River Basin Management) और जलवायु अनुकूल कृषि नीतियों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
बिलीगिरी रंगा बेट्टा क्षेत्र में देखा गया दुर्लभ ग्रीन कीलबैक सांप

बिलीगिरी रंगा बेट्टा क्षेत्र में देखा गया दुर्लभ ग्रीन कीलबैक सांप

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📅 09 Oct2026

कर्नाटक के चामराजनगर जिले स्थित बिलीगिरी रंगा बेट्टा (BR Hills) के पास हाल ही में 'ग्रीन कीलबैक' नामक एक विषहीन अर्ध-जलीय सांप पाया गया है। यह प्रजाति मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के आर्द्रभूमियों में निवास करती है। जैव विविधता, वितरण और पारिस्थितिकी के लिहाज से यह खोज सिविल सेवा परीक्षा के पर्यावरण खंड के लिए महत्वपूर्ण है।

बिलीगिरी रंगा बेट्टा क्षेत्र में देखा गया दुर्लभ ग्रीन कीलबैक सांप
सारांश
कर्नाटक के चामराजनगर जिले स्थित बिलीगिरी रंगा बेट्टा (BR Hills) के पास हाल ही में 'ग्रीन कीलबैक' नामक एक विषहीन अर्ध-जलीय सांप पाया गया है। यह प्रजाति मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के आर्द्रभूमियों में निवास करती है। जैव विविधता, वितरण और पारिस्थितिकी के लिहाज से यह खोज सिविल सेवा परीक्षा के पर्यावरण खंड के लिए महत्वपूर्ण है।
परिचय और अद्यतन संदर्भ
ग्रीन कीलबैक (वैज्ञानिक नाम: Macropisthodon plumbicolor या Rhabdophis plumbicolor) एक गैर-विषैला, अर्ध-जलीय सर्प है जो दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल निवासी है। हाल ही में कर्नाटक के चामराजनगर जिले के येलंदूर तालुक में बिलीगिरी रंगा बेट्टा (BR Hills) वन्यजीव अभयारण्य की सीमा से सटे गंगावाड़ी गांव के पास इसे देखा गया है। आमतौर पर यह प्रजाति भारत के पूर्वी क्षेत्रों, मध्य एशिया और श्रीलंका के पहाड़ी और वनीय इलाकों में पाई जाती है। पश्चिमी घाट के इस संक्रमणकालीन गलियारे में इसकी उपस्थिति क्षेत्र की समृद्ध सरिसृप जैव विविधता को रेखांकित करती है।
भौगोलिक वितरण और प्राकृतिक आवास
ग्रीन कीलबैक का भौगोलिक प्रसार भारत, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया के विभिन्न भागों में फैला हुआ है। पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से यह प्रजाति आर्द्रभूमि पर अत्यधिक निर्भर है। यह मुख्य रूप से तालाबों, नदियों, जलधाराओं, धान के खेतों और दलदली इलाकों में पाई जाती है। प्रचुर वनस्पति वाले नमीयुक्त क्षेत्र इसका पसंदीदा आवास हैं, जहाँ यह जल और थलीय वनस्पतियों के बीच आसानी से शिकार कर सकती है।
शारीरिक विशेषताएं और अनुकूलन
यह मध्यम आकार का सर्प है जिसकी सामान्य लंबाई 60 सेंटीमीटर से 1 मीटर तक होती है, हालांकि कुछ वयस्क 1.2 मीटर तक बढ़ सकते हैं। इसका शरीर हरे रंग की विभिन्न शेड्स का होता है जिसके नीचे का हिस्सा हल्का पीला या सफेद होता है। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता इसकी त्वचा पर मौजूद 'कील्स' (Pronounced Ridges) हैं। यह उभरी हुई संरचनाएं सांप को जलीय सतह पर तैरने और घनी वनस्पतियों में चढ़ने के लिए आवश्यक पकड़ प्रदान करती हैं। इसका सिर त्रिकोणीय, आंखें बड़ी व गोल तथा पूंछ पतली होती है, जो तैरते समय पतवार (Rudder) की तरह काम करती है।
संरक्षण स्थिति एवं पारिस्थितिक महत्व
अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में ग्रीन कीलबैक को 'संकटमुक्त' (Least Concern - LC) श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। गैर-विषैला होने के कारण यह पारिस्थितिकी तंत्र में खाद्य जाल को संतुलित रखने में सहायक है, विशेष रूप से उभयचरों और कीटों की आबादी को नियंत्रित करने में। जलीय और थलीय दोनों पारिस्थितिक तंत्रों के बीच इसका संतुलन बनाए रखना क्षेत्रीय पर्यावरण की अनुकूलता का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।

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