
अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) और विमानन क्षेत्र का नियमन
अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) ने मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल 1 के पुनर्विकास के दौरान मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) की अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी को सुरक्षित रखने के लिए एयरपोर्ट ऑपरेटर और एयरलाइंस के बीच परामर्श आधारित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया है।
सारांश
अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) ने मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल 1 के पुनर्विकास के दौरान मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) की अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी को सुरक्षित रखने के लिए एयरपोर्ट ऑपरेटर और एयरलाइंस के बीच परामर्श आधारित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया है।
अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) का परिचय
IATA दुनिया भर की एयरलाइंस का एक वैश्विक व्यापार संघ है, जो यात्री और मालवाहक दोनों प्रकार के विमानन परिचालनों को कवर करता है। इसकी स्थापना वर्ष 1945 में क्यूबा की राजधानी हवाना में की गई थी, जो 1919 में गठित 'अंतर्राष्ट्रीय वायु यातायात संघ' का उत्तराधिकारी संगठन है। इसका मुख्यालय कनाडा के मांट्रियल शहर में स्थित है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार लोगों और सामानों के सुरक्षित, सुरक्षित और कुशल परिवहन को सुनिश्चित करना तथा एयरलाइंस के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है।
प्रमुख कार्यक्षेत्र और गतिविधियाँ
IATA का मुख्य कामकाज तीन प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित होता है: पहला, अंतरराष्ट्रीय हवाई परिवहन में उपयोग होने वाली प्रक्रियाओं और दस्तावेजों का मानकीकरण करना; दूसरा, विशेष रूप से खतरनाक या नाशवान वस्तुओं के परिवहन के लिए तकनीकी नियमों का विकास करना; और तीसरा, वित्तीय सहयोग और निपटान प्रणालियों का संचालन करना जो एयरलाइंस को वैश्विक परिवहन नेटवर्क संचालित करने में सक्षम बनाती हैं। वर्तमान में इसमें 126 देशों और क्षेत्रों की 370 से अधिक सदस्य एयरलाइंस शामिल हैं, जो कुल वैश्विक हवाई यातायात का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा संभालती हैं।
IATA और ICAO में अंतर
भले ही IATA और ICAO दोनों विमानन उद्योग की सेवा करते हैं, लेकिन दोनों की प्रकृति और कार्यक्षेत्र में बुनियादी अंतर है। IATA अपने सदस्य एयरलाइंस के लिए व्यावसायिक और परिचालन मानक स्थापित करता है तथा उनके हितों की पैरवी करता है, जबकि 'अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन' (ICAO) सदस्य देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन के नियम, मानक और उड़ान प्रक्रिया से जुड़ी कार्यप्रणाली तय करता है।
वर्तमान विवाद और नवीनतम परिदृश्य
हाल ही में मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल 1 (T1) के पुनर्विकास कार्य और उड़ानों के समंजन को लेकर IATA ने चिंता व्यक्त की है। टर्मिनल के पुनर्विकास के दौरान उड़ानों के अस्थायी स्थगन और स्लॉट कटौती से वैश्विक कनेक्टिविटी पर पड़ने वाले असर को रोकने के लिए IATA ने एयरलाइंस और मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (MIAL) के बीच पारदर्शी समन्वय और वैकल्पिक उपायों की मांग की है।

कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV): वन्यजीव संरक्षण के लिए गंभीर खतरा
मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) के संक्रमण से उपचाराधीन एक बाघिन की मृत्यु हो गई है। यह घातक वायरल बीमारी घरेलू कुत्तों से जंगली मांसाहारी जानवरों में फैलती है, जो देश के लुप्तप्राय बाघों और अन्य वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए एक बड़ा संकट बनती जा रही है।
सारांश
मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) के संक्रमण से उपचाराधीन एक बाघिन की मृत्यु हो गई है। यह घातक वायरल बीमारी घरेलू कुत्तों से जंगली मांसाहारी जानवरों में फैलती है, जो देश के लुप्तप्राय बाघों और अन्य वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए एक बड़ा संकट बनती जा रही है।
परिचय एवं प्रभाव
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) एक अत्यधिक संक्रामक और गंभीर बीमारी है, जो पैरामिक्सोविरिडे परिवार के सिंगल-स्ट्रैंडेड आरएनए वायरस के कारण होती है। यह एक बहु-प्रणालीगत (multi-systemic) संक्रमण है जो मुख्य रूप से श्वेत रक्त कोशिकाओं और शरीर के श्वसन तंत्र, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (पाचन) और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) पर हमला करता है। इस घातक संक्रमण की मृत्यु दर बहुत अधिक होती है, जिससे यह वन्यजीवों के लिए विशेष रूप से खतरनाक माना जाता है। ऐतिहासिक रूप से इसने गुजरात के गिर जंगलों में एशियाई शेरों और दुनिया के अन्य हिस्सों में वन्यजीवों की आबादी को भारी नुकसान पहुंचाया है।
संक्रमण के स्रोत एवं संचरण
यह वायरस मुख्य रूप से घरेलू कुत्तों (जो इसके प्रमुख प्राकृतिक संवाहक हैं) से वन्यजीवों में फैलता है। स्वस्थ जानवर संक्रमित जीवों के श्वसन स्राव, जैसे लार, नाक से निकलने वाले तरल और छींक के संपर्क में आने से तेजी से संक्रमित होते हैं। इसके अलावा, दूषित सतहों, साझा किए गए पानी या भोजन के बर्तन तथा संक्रमित शवों को खाने से भी यह वायरस फैलता है। हालांकि यह पर्यावरण में लंबे समय तक जीवित नहीं रहता और सामान्य कीटानाशकों से नष्ट हो जाता है, लेकिन संक्रमित जानवर लक्षण दिखने से पहले ही हफ्तों तक वायरस छोड़ते रहते हैं।
प्रमुख लक्षण और स्वास्थ्य पर असर
संक्रमण के शुरुआती चरणों में आंखों में मवाद, नाक बहना, भूख न लगना, खांसी, निमोनिया और बुखार जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। रोग के गंभीर होने पर यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, जिससे उल्टी, दस्त, पंजे के तलुओं और नाक की त्वचा का सख्त होना (हार्ड पैड डिजीज), जबड़े के झटके, दौरे, मांसपेशियों में अकड़न और संतुलन बिगड़ने जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। कई बार संक्रमित बाघ अजीब व्यवहार करते हैं और बिना डर के बस्तियों की ओर आ जाते हैं।
उपचार और निवारक उपाय
वर्तमान में इस वायरल संक्रमण के लिए कोई विशिष्ट इलाज या एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है। इसका उपचार पूरी तरह से लक्षणों के प्रबंधन, सहायक देखभाल (जैसे अंतःशिरा तरल पदार्थ) और द्वितीयक जीवाणु संक्रमण को रोकने के लिए एंटीबायोटिक्स पर निर्भर करता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इस खतरे से निपटने का सबसे प्रभावी उपाय समय पर टीकाकरण करना और वन क्षेत्रों के पास रहने वाले घरेलू तथा आवारा कुत्तों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण कर 'हर्ड इम्युनिटी' विकसित करना है।

ऐतिहासिक हिडिंबा देवी मंदिर और राष्ट्रपति की यात्रा
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने हिमाचल प्रदेश दौरे के दूसरे दिन मनाली स्थित ऐतिहासिक हिडिंबा देवी मंदिर का दौरा कर पूजा-अर्चना की। यह प्राचीन मंदिर अपनी विशिष्ट कांगड़ा-पगोडा वास्तुकला और महाभारत कालीन पौराणिक महत्व के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।
सारांश
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने हिमाचल प्रदेश दौरे के दूसरे दिन मनाली स्थित ऐतिहासिक हिडिंबा देवी मंदिर का दौरा कर पूजा-अर्चना की। यह प्राचीन मंदिर अपनी विशिष्ट कांगड़ा-पगोडा वास्तुकला और महाभारत कालीन पौराणिक महत्व के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।
पौराणिक पृष्ठभूमि एवं महत्व
धुंगरी मंदिर के नाम से भी विख्यात यह प्रसिद्ध हिंदू मंदिर महाभारत के प्रमुख पात्र भीम की पत्नी हिडिम्बी देवी को समर्पित है। स्थानीय मान्यताओं और महाकाव्य के अनुसार, पांडवों के अज्ञातवास के दौरान भीम का यहां हिडिंबा से विवाह हुआ था, जिनसे घटोत्कच का जन्म हुआ। समय के साथ हिडिम्बी को इस क्षेत्र में एक शक्ति और ग्राम देवी के रूप में पूजा जाने लगा। यह मंदिर Kullu के प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में भी केंद्रीय भूमिका निभाता है, जहां उत्सव की आधिकारिक रथ यात्रा की शुरुआत देवी के आगमन के पश्चात ही होती है।
ऐतिहासिक निर्माण और वास्तुकला
यह मंदिर भारत की उन चुनिंदा संरचनाओं में शामिल है जो पारंपरिक पगोडा शैली (Pagoda style) का अनुसरण करती हैं, जो सामान्यतः नेपाल और तिब्बत क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका निर्माण वर्ष 1553 में कुल्लू के तत्कालीन शासक राजा बहादुर सिंह के शासनकाल के दौरान करवाया गया था। यह पूरी तरह से देवदार की लकड़ी से निर्मित है, जो कीड़ों और क्षय के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी होती है।
संरचनात्मक विशेषताएँ
मंदिर की वास्तुकला में चार स्तरीय (four-tiered) छत है जिसे मजबूती प्रदान करने के लिए 24 मजबूत लकड़ी के खंभे बनाए गए हैं। छत के बाहरी हिस्से को धातु की घंटियों, पीतल के शंकु और सींगों से अलंकृत किया गया है। मंदिर की दीवारों, दरवाजों और खिड़कियों पर अत्यंत सूक्ष्म और जटिल नक्काशी की गई है, जिन पर विभिन्न पशु-पक्षियों, पौधों, नर्तकों, संगीतकारों और महाभारत के दृश्यों को उकेरा गया है। मंदिर के गर्भ गृह के भीतर कोई कृत्रिम मूर्ति स्थापित न होकर एक विशाल प्राकृतिक चट्टान मौजूद है, जिसके ऊपर स्थापित लगभग 7.5 सेंटीमीटर (3 इंच) की पीतल की प्रतिमा देवी हिडिम्बी का प्रतिनिधित्व करती है।

गारो जनजाति और स्वायत्त जिला परिषद: एक विश्लेषण
मेघालय मंत्रिमंडल द्वारा गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद (GHADC) के कार्यकाल को दूसरे छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया है, जिससे इसके चुनाव अगले वर्ष तक टल गए हैं। यह जनजाति अपनी अनूठी मातृसत्तात्मक सामाजिक संरचना और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती है।
सारांश
मेघालय मंत्रिमंडल द्वारा गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद (GHADC) के कार्यकाल को दूसरे छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया है, जिससे इसके चुनाव अगले वर्ष तक टल गए हैं। यह जनजाति अपनी अनूठी मातृसत्तात्मक सामाजिक संरचना और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती है।
भौगोलिक विस्तार एवं जनसांख्यिकी
गारो जनजाति मुख्य रूप से मेघालय की गारो पहाड़ियों में निवास करने वाला एक तिब्बती-बर्मी (Tibeto-Burman) जातीय समूह है। मेघालय में खासी जनजाति के बाद यह दूसरी सबसे बड़ी जनजातीय कम्युनिटी है। मेघालय के अतिरिक्त इनकी आंशिक आबादी असम, त्रिपुरा, नागालैंड और पश्चिम बंगाल राज्यों में भी पाई जाती है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, यह जनजाति लगभग चार सौ वर्ष पूर्व तिब्बत से प्रवास करके भारत आई थी। इनकी प्रमुख भाषा 'गारो' है, जिसे स्थानीय स्तर पर "मंडे" भी कहा जाता है, जो चीनी-तिब्बती भाषा परिवार की बोडो-नागा-कछिन शाखा के अंतर्गत आती है।
सामाजिक एवं आर्थिक संरचना
गारो समुदाय दुनिया के उन गिने-चुने समाजों में शामिल है जहां आज भी मातृसत्तात्मक (Matrilineal) व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी है। परिवार और आर्थिक जीवन में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका होती है, तथा वंश और पैतृक संपत्ति का अधिकार महिलाओं के माध्यम से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है। ग्रामीण अंचल में इनकी आजीविका मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है। ये पारंपरिक झूम (स्थानांतरित) कृषि के साथ-साथ सिंचित धान की खेती करते हैं तथा चावल, बाजरा और विभिन्न प्रकार की सब्जियों का उत्पादन करते हैं। पहाड़ी भूभाग के अनुकूल इनके पारंपरिक मकान बांस के मचानों (Stilts) पर बनाए जाते हैं।
धार्मिक मान्यताएं एवं सांस्कृतिक विरासत
ऐतिहासिक रूप से गारो जनजाति 'सोंगसरेक' (Songsarek) नामक स्वदेशी एनिमवादी धर्म का पालन करती थी, जिसमें प्रकृति की शक्तियों, देवताओं और पूर्वजों की आराधना की जाती थी। हालांकि, 19वीं सदी के उत्तरार्ध से ईसाई धर्म इस क्षेत्र का प्रमुख धर्म बन चुका है, फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक मान्यताओं और संस्कारों के अवशेष आज भी विद्यमान हैं। इनका प्रसिद्ध फसल उत्सव 'वांगाला' (Wangala) इनकी समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।
राजनीतिक एवं प्रशासनिक संदर्भ
भारतीय संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के अंतर्गत आने वाली गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद (GHADC) इस क्षेत्र के स्थानीय स्वशासन को नियंत्रित करती है। हाल ही में परिसीमन, मतदाता सूची के पुनरीक्षण तथा अनुसूचित जनजाति (ST) के मतदाताओं के लिए अलग मतदाता सूची के प्रावधानों के चलते इस परिषद के चुनावों को स्थगित करते हुए सरकार ने इसका कार्यकाल बढ़ाया है।

भारत में त्पेयक्ष्मा उन्मूलन हेतु जॉश (JOSH) अभियान
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 55 जिलों में 'जॉश' (Joint Squad for Health) टीमों का शुभारंभ किया गया है। यह पहल युवा ऊर्जा का उपयोग कर त्पेयक्ष्मा (TB) उन्मूलन के प्रति सामुदायिक जागरूकता बढ़ाने, सामाजिक कलंक को दूर करने और वर्ष 2025 तक देश को रोग मुक्त बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को गति प्रदान करेगी।
सारांश
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 55 जिलों में 'जॉश' (Joint Squad for Health) टीमों का शुभारंभ किया गया है। यह पहल युवा ऊर्जा का उपयोग कर त्पेयक्ष्मा (TB) उन्मूलन के प्रति सामुदायिक जागरूकता बढ़ाने, सामाजिक कलंक को दूर करने और वर्ष 2025 तक देश को रोग मुक्त बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को गति प्रदान करेगी।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
'जॉश' (Joint Squad for Health) टीमों का गठन भारत से त्पेयक्ष्मा (TB) की समाप्ति की दिशा में एक अभूतपूर्व रणनीतिक कदम है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य देश के युवाओं की असीम ऊर्जा और पहुंच को संगठित करके सामुदायिक स्तर पर त्पेयक्ष्मा उन्मूलन के प्रति जन-आंदोलन का रूप देना है। यह पहल स्वास्थ्य प्रणाली को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के साथ-साथ त्पेयक्ष्मा के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को भी संबोधित करती है।
अंतर-मंत्रालयी सहयोग और भागीदारी
यह महत्वाकांक्षी पहल केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा युवा मामले और खेल मंत्रालय तथा रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर संचालित की जा रही है। इस त्रिपक्षीय सहयोग के माध्यम से प्रथम श्रेणी के अधिकारियों (Class-I officers), 'माय भारत' (MY Bharat) के स्वयंसेवकों और राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) के कैडेटों को एक मंच पर लाया गया है। यह सम्मिलित प्रयास प्रशासनिक नेतृत्व और युवा शक्ति के अनूठे समन्वय को दर्शाता है।
कार्यक्षेत्र और प्रथम चरण की रूपरेखा
अभियान के पहले चरण के तहत इसे देश के 11 राज्यों के कुल 55 चुनिंदा जिलों में लागू किया जा रहा है। इस चरण के दौरान कार्यक्रम का पूरा फोकस ब्लॉक, वार्ड और जमीनी समुदाय स्तर पर सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करने पर है। इसके अंतर्गत त्पेयक्ष्मा मुक्त भारत के संदेश को पारंपरिक स्वास्थ्य संस्थानों की चारदीवारी से बाहर निकालकर सीधे आम नागरिकों के द्वार तक पहुंचाया जा रहा है।
मुख्य कार्य और गतिविधियां
जॉश टीमें त्पेयक्ष्मा के लक्षणों, इसकी रोकथाम के उपायों, समय पर निदान के महत्व और पूर्ण उपचार की अवधि के बारे में व्यापक जानकारी प्रसारित करती हैं। इसके अतिरिक्त, ये टीमें इस बीमारी से जुड़े मिथकों और भ्रांतियों को दूर करने, सामाजिक कलंक को कम करने तथा व्यक्तियों, परिवारों और समुदायों को राष्ट्रीय त्पेयक्ष्मा उन्मूलन आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित करती हैं।
Delight News
निष्पक्ष पत्रकारिता, सटीक विश्लेषण
Delight News परिवार से जुड़ें
ताजा खबरों के सबसे तेज नोटिफिकेशन और शानदार यूज़र इंटरफेस के साथ देश-दुनिया के लाइव अपडेट्स सीधे अपने mobile पर पाने के लिए हमारा Delight News Android App डाउनलोड करें।
📥 Download Android App