
बाल कुष्ठ रोग के आंकड़े और राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम की चुनौतियाँ
वर्ष 2025-26 के दौरान भारत में बच्चों में कुष्ठ रोग के 3,832 नए मामले दर्ज किए गए हैं, जो राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम (NLEP) के लक्ष्य से 91.6% अधिक हैं। निदान के समय ग्रेड-2 विकलांगता (G2D) के 37 मामले यह दर्शाते हैं कि देश में इस बीमारी की पहचान में अभी भी देरी हो रही है।
बाल कुष्ठ रोग के आंकड़े और राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम की चुनौतियाँ
सारांश (Summary):
वर्ष 2025-26 के दौरान भारत में बच्चों में कुष्ठ रोग के 3,832 नए मामले दर्ज किए गए हैं, जो राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम (NLEP) के लक्ष्य से 91.6% अधिक हैं। निदान के समय ग्रेड-2 विकलांगता (G2D) के 37 मामले यह दर्शाते हैं कि देश में इस बीमारी की पहचान में अभी भी देरी हो रही है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
राष्ट्रीय लक्ष्य और जमीनी हकीकत
राष्ट्रीय कुष्ठ रणनीतिक योजना 2023-27 के तहत वर्ष 2027 तक जिला स्तर पर कुष्ठ संक्रमण को रोकने (interrup transmission) का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत किसी जिले को तभी संक्रमण-मुक्त माना जाता है जब वह लगातार पांच वर्षों तक शून्य नए स्वदेशी बाल मामले दर्ज करता है। हालांकि, वर्ष 2026-27 के लिए अनुमानित 1,000 बाल मामलों का लक्ष्य वर्तमान आंकड़ों के मुकाबले काफी पीछे छूट गया है, जिससे तय समयसीमा में लक्ष्यों को पाना कठिन नजर आ रहा है।
बाल मामलों और विकलांगता का महामारी विज्ञान महत्व
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों में नए मामले सामने आना यह दर्शाता है कि समुदाय के भीतर इस बीमारी का संचरण (transmission) अभी भी सक्रिय रूप से जारी है। बच्चों में मामलों की उच्च संख्या और निदान के समय ग्रेड-2 विकलांगता (G2D) का होना स्वास्थ्य तंत्र में शुरुआती स्तर पर बीमारी की पहचान में देरी और निगरानी तंत्र की कमियों को उजागर करता है।
भविष्य की चुनौतियाँ और रणनीति
भारत सरकार का लक्ष्य नए बाल मामलों में शून्य विकलांगता और प्रति 10 लाख जनसंख्या पर एक से कम G2D दर प्राप्त करना है। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में सक्रिय निगरानी (active surveillance), शुरुआती दौर में ही मामलों की पहचान, और जनता के बीच जागरूकता अभियानों को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

आर्थिक लचीलापन और वैश्विक अनिश्चितता: कौटिल्य आर्थिक कॉन्क्लेव के मुख्य बिंदु
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा ने 5वें कौटिल्य आर्थिक कॉन्क्लेव में कहा कि भू-राजनीतिक तनावों के कारण व्यापार प्रतिबंधों और आर्थिक नीतियों का रणनीतिक उपयोग या 'हथियारीकरण' बढ़ रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि भविष्य उसी देश का होगा जो बिना बंद हुए स्थिर, बिना डरे सतर्क और बिना अतिरेक के महत्वाकांक्षी बने रहने में सक्षम हो।
आर्थिक लचीलापन और वैश्विक अनिश्चितता: कौटिल्य आर्थिक कॉन्क्लेव के मुख्य बिंदु
सारांश (Summary):
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा ने 5वें कौटिल्य आर्थिक कॉन्क्लेव में कहा कि भू-राजनीतिक तनावों के कारण व्यापार प्रतिबंधों और आर्थिक नीतियों का रणनीतिक उपयोग या 'हथियारीकरण' बढ़ रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि भविष्य उसी देश का होगा जो बिना बंद हुए स्थिर, बिना डरे सतर्क और बिना अतिरेक के महत्वाकांक्षी बने रहने में सक्षम हो।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
जोखिम बनाम अनिश्चितता का नया वैश्विक परिवेश
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य केवल 'जोखिम' तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गहरी 'अनिश्चितता' का सामना कर रहा है। महामारी, क्षेत्रीय युद्धों, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, और शिपिंग मार्गों या भौगोलिक चोकपॉइंट्स ने आर्थिक संवेदनशीलता को बढ़ा दिया है। इसके अलावा, निर्यात प्रतिबंध, प्रतिबंध और टैरिफ जैसे आर्थिक नीतिगत उपकरण अब सीधे रणनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जा रहे हैं।
ऊर्जा सुरक्षा: कीमत से लेकर उपलब्धता तक की चिंता
ऊर्जा आयात करने वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए पारंपरिक रूप से मुख्य प्रश्न केवल ऊर्जा की कीमत का होता था। हालांकि, वर्तमान समय में यह प्राथमिकता बदलकर इस बात पर केंद्रित हो गई है कि क्या ऊर्जा समय पर उपलब्ध होगी और क्या यह सुरक्षित रूप से पहुंच सकेगी। हजारों किलोमीटर दूर किसी प्रमुख नौवहन मार्ग पर व्यवधान भी दूरस्थ बाजारों को प्रभावित कर सकता है, जिससे भूगोल एक बार फिर प्रमुख आर्थिक कारक बन गया है।
वैश्वीकरण की मूल अवधारणा की पुनर्परिभाषा
पारंपरिक वैश्वीकरण की अवधारणा को अब नए सिरे से पूरक रूप दिया जा रहा है, जिसमें देशों द्वारा घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने के साथ-साथ विविध अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को विकसित किया जा रहा है। भारत के दृष्टिकोण से, रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े रहना और घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देना ही आर्थिक लचीलेपन की असली कुंजी है।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वित्तीय स्थिरता और सतत सतर्कता पर बल
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वित्तीय स्थिरता की रक्षा के लिए निरंतर सतर्कता बरतने का आह्वान किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक स्थिरता बने रहने से जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है और कमजोरियां पनप सकती हैं, जिसके लिए सतर्क रहना आवश्यक है।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वित्तीय स्थिरता और सतत सतर्कता पर बल
सारांश (Summary):
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वित्तीय स्थिरता की रक्षा के लिए निरंतर सतर्कता बरतने का आह्वान किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक स्थिरता बने रहने से जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है और कमजोरियां पनप सकती हैं, जिसके लिए सतर्क रहना आवश्यक है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
वित्तीय स्थिरता का अर्थ और वर्तमान स्थिति
वित्तीय स्थिरता से तात्पर्य बैंकिंग, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs), वित्तीय बाजारों, भुगतान प्रणालियों और सहायक बुनियादी ढांचे सहित संपूर्ण वित्तीय प्रणाली की उस क्षमता से है, जिसके तहत वह आर्थिक या वित्तीय झटकों के बावजूद प्रभावी ढंग से कार्य करना जारी रखती है। वर्तमान में भारत की वित्तीय प्रणाली में तनाव के कोई आसन्न संकेत नहीं दिखाई देते हैं, फिर भी गवर्नर ने अत्यधिक संतुष्टि या लापरवाही के प्रति आगाह किया है।
दीर्घकालिक स्थिरता के जोखिम और ऐतिहासिक सबक
मुख्य चिंता यह है कि लंबी अवधि की स्थिरता के दौर में वित्तीय कमजोरियां धीरे-धीरे जमा होने लगती हैं। पूर्व के संकटों की यादें धुंधली होने पर वित्तीय संस्थान, व्यवसाय और निवेशक अधिक जोखिम और उत्तोलन (leverage) को अपना सकते हैं। 2000 के दशक की शुरुआत से अत्यधिक ऋण देने और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) की विरासत का भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि एक बार जब कमजोरियां प्रणालीगत हो जाती हैं, तो वित्तीय तनाव को सुलझाने में वर्षों लग सकते हैं।
वित्तीय स्थिरता के लिए पांच प्राथमिकताएं
प्रणालीगत लचीलेपन (Systemic Resilience) को मजबूत करना पहली प्राथमिकता है, जिसके तहत एक ऐसी वित्तीय प्रणाली का निर्माण करना है जो आंतरिक या बाहरी झटकों को अवशोषित और समाहित करने में सक्षम हो। इसके साथ ही प्रणालीगत जोखिमों की समय पर पहचान और उनके प्रभावी समाधान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

जीएसटी 2.0: कर सुधारों के तहत गिरफ्तारी के प्रावधानों को हटाने पर विचार
जुलाई 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के नौ साल बाद, 'जीएसटी 2.0' के तहत कर कानूनों से गिरफ्तारी की शक्तियों को हटाने पर विचार किया जा रहा है। इस प्रस्ताव पर 7 अक्टूबर 2026 को होने वाली 57वीं जीएसटी परिषद की बैठक में चर्चा होने की संभावना है, जिसका उद्देश्य व्यापार करने में सुगमता को बढ़ावा देना है।
जीएसटी 2.0: कर सुधारों के तहत गिरफ्तारी के प्रावधानों को हटाने पर विचार
सारांश (Summary):
जुलाई 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के नौ साल बाद, 'जीएसटी 2.0' के तहत कर कानूनों से गिरफ्तारी की शक्तियों को हटाने पर विचार किया जा रहा है। इस प्रस्ताव पर 7 अक्टूबर 2026 को होने वाली 57वीं जीएसटी परिषद की बैठक में चर्चा होने की संभावना है, जिसका उद्देश्य व्यापार करने में सुगमता को बढ़ावा देना है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
जीएसटी अपराधों को अपराधमुक्त करने की आवश्यकता
उद्योग प्रतिनिधियों द्वारा यह चिंता जताई गई है कि गिरफ्तारी की शक्तियों का उपयोग सौदेबाजी के साधन के रूप में किया जा सकता है, विशेषकर बैंकिंग और बीमा जैसे क्षेत्रों में। इस प्रस्तावित सुधार का उद्देश्य करदाता के भरोसे को मजबूत करना, कर अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न की आशंकाओं को कम करना, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (EoDB) को सुदृढ़ करना और वास्तविक कर प्रशासन को आपराधिक प्रवर्तन से अलग करना है। हालांकि, जानबूझकर किए गए धोखाधड़ी के मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कार्रवाई जारी रहेगी।
मौजूदा जीएसटी गिरफ्तारी ढांचा और प्रवर्तन का दायरा
केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (CGST) अधिनियम की धारा 69 के तहत, आयुक्त को विशिष्ट मामलों में गिरफ्तारी प्राधिकृत करने की शक्ति प्राप्त है। इनमें फर्जी चालान, इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का धोखाधड़ी से लाभ उठाना, बिना वास्तविक आपूर्ति के चालान जारी करना और कर संग्रह के बाद जमा न करना शामिल है। वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच केंद्रीय जीएसटी संरचनाओं द्वारा 72,393 मामलों में 887 गिरफ्तारियां की गई हैं, जबकि राज्य प्राधिकरणों द्वारा की गई गिरफ्तारियां इसके अतिरिक्त हैं।
वैट व्यवस्था की पृष्ठभूमि
प्रस्तावित बदलाव के तहत गिरफ्तारी की शक्तियों को हटाना जीएसटी लागू होने से पहले की मूल्य वर्धित कर (VAT) व्यवस्था के अनुकूल होगा, जिसमें आमतौर पर कर अधिकारियों को सीधे गिरफ्तारी की शक्तियां प्राप्त नहीं थीं। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो इसके लिए संसद के आगामी सत्र में विधाई संशोधनों की आवश्यकता होगी।

केरल में रापुंज़ेल सिंड्रोम: दुर्लभ शल्यचिकित्सा और चिकित्सीय पहलू
केरल के डॉक्टरों ने एक दुर्लभ रापुंज़ेल सिंड्रोम सर्जरी के तहत नौ साल की बच्ची के पेट और छोटी आंत से एक किलोग्राम बालों का गुच्छा निकाला है। यह स्थिति मुख्य रूप से बाल नोचने और उन्हें खाने की आदतों से जुड़ी होती है।
केरल में रापुंज़ेल सिंड्रोम: दुर्लभ शल्यचिकित्सा और चिकित्सीय पहलू
सारांश (Summary):
केरल के डॉक्टरों ने एक दुर्लभ रापुंज़ेल सिंड्रोम सर्जरी के तहत नौ साल की बच्ची के पेट और छोटी आंत से एक किलोग्राम बालों का गुच्छा निकाला है। यह स्थिति मुख्य रूप से बाल नोचने और उन्हें खाने की आदतों से जुड़ी होती है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
रापुंज़ेल सिंड्रोम क्या है
रापुंज़ेल सिंड्रोम एक अत्यंत दुर्लभ चिकित्सीय स्थिति है, जिसमें बालों का एक बड़ा गोला (ट्राइकोबेजोड़) पेट में फंसकर छोटी आंत तक फैल जाता है। इस स्थिति का नामकरण प्रसिद्ध परी-कथा के पात्र 'रापुंज़ेल' के नाम पर किया गया है, जो अपने लंबे बालों के लिए जानी जाती थी। यह स्थिति पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक पाई जाती है और इसके लगभग 80 प्रतिशत मामले बच्चों, किशोरियों और 30 वर्ष से कम उम्र की युवतियों में देखे जाते हैं।
कारण और मनोवैज्ञानिक कारक
यह स्थिति मुख्य रूप से 'ट्राइकोटिलोमेनिया' (Trichotillomania) और 'ट्राइकोफैगिया' (Trichophagia) से जुड़ी है। ट्राइकोटिलोमेनिया एक ऐसा विकार है जिसमें व्यक्ति को बार-बार अपने बाल खींचने की इच्छा होती है, जबकि ट्राइकोफैगिया वह स्थिति है जिसमें खींचे गए या टूटे हुए बालों को निगल लिया जाता है। समय के साथ, निगले गए बाल पेट में जमा होते जाते हैं क्योंकि मानव शरीर उन्हें पचा नहीं पाता है और अंततः यह बड़े गुच्छे का रूप ले लेता है।
लक्षण और स्वास्थ्य प्रभाव
इस बीमारी के लक्षण मुख्य रूप से आंतों में रुकावट या पेट से जुड़ी अन्य समस्याओं के कारण उत्पन्न होते हैं। इनमें पेट दर्द, सूजन, पेट भरा हुआ महसूस होना, वजन घटना, मितली, उल्टी, सीने के नीचे दर्द, सिर पर बालों का पैच के रूप में झड़ना (एलोपेसिया) और मुंह से दुर्गंध आना शामिल हैं।
उपचार और शल्यचिकित्सा
छोटे बालों के गुच्छों को हटाने के लिए अक्सर एंडोस्कोपी का उपयोग किया जाता है, लेकिन बहुत बड़े आकार के बालों के द्रव्यमान या आंतों में रुकावट पैदा करने वाली स्थिति में सर्जरी की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में पेट और आवश्यकतानुसार आंत से बालों के इस बड़े द्रव्यमान को सफलतापूर्वक बाहर निकाला जाता है।
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