
बेसिक कस्टम ड्यूटी में कटौती और खाद्य तेल मूल्य नियंत्रण
सरकार ने घरेलू खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने और त्योहारी सीजन से पहले उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए प्रमुख आयातित कच्चे खाद्य तेलों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) में कमी की है। इस नीतिगत निर्णय का उद्देश्य आयातित खाद्य तेलों की लैंडेड लागत को घटाकर आपूर्ति श्रृंखला को सुगम बनाना है।
सारांश (Summary):
सरकार ने घरेलू खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने और त्योहारी सीजन से पहले उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए प्रमुख आयातित कच्चे खाद्य तेलों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) में कमी की है। इस नीतिगत निर्णय का उद्देश्य आयातित खाद्य तेलों की लैंडेड लागत को घटाकर आपूर्ति श्रृंखला को सुगम बनाना है।
परिचय एवं संवैधानिक प्रावधान
बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) भारत में आयातित वस्तुओं पर लगाया जाने वाला एक प्रमुख प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कर है जो सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 12 के अंतर्गत लगाया जाता है। यह शुल्क सीमा शुल्क टैरिफ अधिनियम, 1975 के प्रावधानों के अनुरूप वस्तुओं केन मूल्य (अद-वैलोरम) पर एक निश्चित प्रतिशत के रूप में निर्धारित किया जाता है। इसका मुख्य कार्य घरेलू विनिर्माण उद्योगों को वैश्विक स्तर पर सस्ती विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण प्रदान करना और केंद्र सरकार के लिए राजस्व का संकलन करना है।
हालिया नीतिगत संशोधन
वैश्विक बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में हुई वृद्धि और घरेलू स्तर पर बढ़ती महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने आयात शुल्क ढांचे में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। इसके तहत कच्चे सूरजमुखी तेल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दिया गया है, जबकि कच्चे सोयाबीन और पाम तेल पर इसे 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही, घरेलू रिफाइनिंग उद्योगों और स्थानीय निर्माताओं की क्षमता का संरक्षण करने के लिए कच्चे और रिफाइंड तेलों के बीच 19.25 प्रतिशत का आयात शुल्क अंतर बरकरार रखा गया है।
आर्थिक निहितार्थ एवं प्रभाव
खाद्य तेलों की घरेलू मांग का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा होता है, जिसके कारण वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव भारतीय बाजारों पर पड़ता है। इस शुल्क कटौती से आयातित खाद्य तेलों की लैंडेड लागत में कमी आएगी, जिससे खुदरा बाजारों में कीमतें नियंत्रित होंगी। सरकार ने उद्योग संघों और हितधारकों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया है कि इस कर कटौती का पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक त्वरित रूप से पहुँचाया जाए ताकि मुद्रास्फीति के दबाव को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सके।

एट्रस्किन सभ्यता: प्राचीन इटली की प्रबुद्ध एवं विकसित संस्कृति
आठवीं से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व फली-फूली एट्रस्किन सभ्यता प्राचीन इटली की एक प्रमुख प्री-रोमन संस्कृति थी। हाल ही में वुलसी में मिले 2,700 वर्ष पुराने प्राचीन मकबरे ने इस सभ्यता के ऐतिहासिक महत्व को पुनः रेखांकित किया है, जिसका रोम के विकास और वास्तुकला पर गहरा प्रभाव रहा है।
सारांश (Summary):
आठवीं से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व फली-फूली एट्रस्किन सभ्यता प्राचीन इटली की एक प्रमुख प्री-रोमन संस्कृति थी। हाल ही में वुलसी में मिले 2,700 वर्ष पुराने प्राचीन मकबरे ने इस सभ्यता के ऐतिहासिक महत्व को पुनः रेखांकित किया है, जिसका रोम के विकास और वास्तुकला पर गहरा प्रभाव रहा है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
भौगोलिक स्थिति और विस्तार
एट्रस्किन सभ्यता मध्य इटली के उस क्षेत्र में विकसित हुई थी जिसे 'एट्रुरिया' या 'तुस्सिया' कहा जाता था। इसका भौगोलिक विस्तार पश्चिम में टायरथ्रियन सागर, उत्तर में आर्नो नदी तथा पूर्व व दक्षिण में टाइबर नदी तक सीमित था। यह क्षेत्र अपनी उपजाऊ कृषि भूमि और समृद्ध खनिज भंडारों के लिए प्रसिद्ध था।
शासन प्रणाली और राजनीतिक संरचना
इस सभ्यता की राजनीतिक व्यवस्था अत्यधिक विकेंद्रीकृत थी। एट्रस्किन लोगों ने बारह नगर-राज्यों (सिटी-स्टेट्स) का एक शक्तिशाली परिसंघ स्थापित किया था। प्रत्येक नगर-राज्य पर कुलीन परिवारों द्वारा निर्वाचित राजाओं का शासन होता था, जिनकी अपनी स्वतंत्र प्रशासनिक और विधिक प्रणालियाँ थीं।
अर्थव्यवस्था, व्यापार और तकनीकी प्रगति
एट्रस्किन पश्चिमी भूमध्य सागर के सबसे बड़े लौह भंडारों के स्वामी थे। वे कुशल व्यापारी और निर्माता थे, जिन्होंने अपनी नौसेना के माध्यम से इतालवी पश्चिमी तटों के समुद्री व्यापार पर वर्चस्व स्थापित किया था। वास्तुकला के क्षेत्र में उन्होंने आर्च और वॉल्ट जैसी उन्नत तकनीकों का विकास किया तथा भूमध्य क्षेत्र में सर्वप्रथम ग्रिड योजना के आधार पर नगरों का निर्माण किया।
रोमन संस्कृति पर प्रभाव
पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से इस सभ्यता का पतन आरंभ हो गया और वे धीरे-धीरे रोमन गणराज्य में विलीन हो गए। तथापि, रोमन सभ्यता ने एट्रस्किन संस्कृति से प्रचुर प्रेरणा ली। रोमनों ने उनके धार्मिक विश्वासों, शासन प्रणालियों, शहरी नियोजन और दफ़नाने की भव्य परंपराओं को अपनी संस्कृति में आत्मसात किया।

दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना 2.0 और ग्रामीण विकास
ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा शुरू की गई दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) 2.0 ग्रामीण युवाओं को रोजगारोन्मुख कौशल प्रशिक्षण प्रदान करती है। यह योजना देश के वंचित वर्गों को सशक्त बनाते हुए समावेशी विकास और आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना 2.0 और ग्रामीण विकास
सारांश (Summary):
ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा शुरू की गई दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) 2.0 ग्रामीण युवाओं को रोजगारोन्मुख कौशल प्रशिक्षण प्रदान करती है। यह योजना देश के वंचित वर्गों को सशक्त बनाते हुए समावेशी विकास और आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
योजना की पृष्ठभूमि एवं परिचय
दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत सितंबर 2014 में शुरू की गई एक केंद्र प्रायोजित योजना है। इसका मुख्य उद्देश्य गरीब ग्रामीण परिवारों के युवाओं को उनकी रोजगार क्षमता बढ़ाने के लिए प्लेसमेंट-लिंक्ड कौशल प्रशिक्षण प्रदान करना है, जिससे देश में कौशल विकास को गति मिल सके।
मुख्य विशेषताएँ और सामाजिक समावेश
इस योजना के तहत पंद्रह से पैंतीस वर्ष की आयु वर्ग के ग्रामीण युवाओं को लक्षित किया जाता है। सामाजिक समावेश को सुनिश्चित करने के लिए इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पचास प्रतिशत, महिलाओं के लिए तैंतीस प्रतिशत और दिव्यांगजनों के लिए पांच प्रतिशत का अनिवार्य आरक्षण निर्धारित किया गया है।
DDU-GKY 2.0 और नवीन सुधार
सरकार द्वारा जारी उन्नत दिशा-निर्देशों के तहत इस योजना को आधुनिक औद्योगिक आवश्यकताओं के अनुकूल बनाया गया है। इसके अंतर्गत एयरोस्पेस, हरित ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि और वस्त्र उद्योग जैसे उभरते क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, जिससे युवाओं को समकालीन रोजगार बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने योग्य बनाया जा सके।
विशेष क्षेत्र और उप-पहलें
योजना के दायरे में वामपंथ उग्रवाद से प्रभावित जिलों के लिए 'रोशनी' और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के युवाओं के लिए 'हिमायत' जैसी विशेष उप-पहलें शामिल हैं। इसके अतिरिक्त पूर्वोत्तर राज्यों और दूर-दराज के दुर्गम क्षेत्रों के लिए विशेष वित्तीय प्रावधान किए गए हैं, ताकि क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करते हुए संतुलित विकास सुनिश्चित किया जा सके।

एमब्रिज डिजिटल करेंसी परियोजना: वैश्विक भुगतान और भू-राजनीतिक निहितार्थ
एमब्रिज (mBridge) सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी आधारित एक क्रॉस-बॉर्डर भुगतान मंच है, जिसे बीआईएस और विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा विकसित किया गया है। यह परियोजना पारंपरिक मध्यस्थ बैंकों की भूमिका को कम कर तेज़ और सस्ते अंतरराष्ट्रीय लेनदेन को सक्षम बनाती है, साथ ही इसके भू-राजनीतिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण हैं।
एमब्रिज डिजिटल करेंसी परियोजना: वैश्विक भुगतान और भू-राजनीतिक निहितार्थ
सारांश (Summary):
एमब्रिज (mBridge) सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी आधारित एक क्रॉस-बॉर्डर भुगतान मंच है, जिसे बीआईएस और विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा विकसित किया गया है। यह परियोजना पारंपरिक मध्यस्थ बैंकों की भूमिका को कम कर तेज़ और सस्ते अंतरराष्ट्रीय लेनदेन को सक्षम बनाती है, साथ ही इसके भू-राजनीतिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण हैं।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
परियोजना की पृष्ठभूमि और विकास
एमब्रिज (mBridge) परियोजना की शुरुआत वर्ष 2021 में बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) के इनोवेशन हब, थाईलैंड के केंद्रीय बैंक, संयुक्त अरब अमीरात के केंद्रीय बैंक, पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के डिजिटल करेंसी इंस्टीट्यूट और हांगकांग मौद्रिक प्राधिकरण के संयुक्त सहयोग से हुई थी। इसका उद्देश्य एक साझा मल्टी-सीबीडीसी मंच तैयार करना था, जो ब्लॉकचेन और डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर तकनीक पर आधारित हो।
कार्यप्रणाली और तकनीकी संरचना
यह मंच साझा डिजिटल रिकॉर्ड और ब्लॉकचेन तकनीक का उपयोग करता है। इसमें भाग लेने वाले केंद्रीय बैंक और मौद्रिक संगठन नेटवर्क पर अपने स्वयं के कंप्यूटरों का उपयोग करते हैं, जिन्हें वैलिडेटिंग नोड्स कहा जाता है। ये नोड्स लेनदेन के रखरखाव और साझा रिकॉर्ड की पारदर्शिता सुनिश्चित करने में मदद करते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय भुगतान बिना कई मध्यस्थ बैंकों के सीधे एक साझा मंच के माध्यम से हो जाते हैं।
आवश्यकता और मुख्य उद्देश्य
यह परियोजना पारंपरिक क्रॉस-बॉर्डर भुगतानों की मुख्य अकुशलताओं जैसे कि उच्च लागत, कम गति और परिचालन जटिलताओं को दूर करने के लिए डिज़ाइन की गई है। इसके अलावा, यह वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देती है और उन क्षेत्रों में सहायता प्रदान करती है जहाँ कॉरेस्पोंडेंट बैंकिंग में कमी के कारण लागत और देरी बढ़ जाती है। साथ ही, यह अमेरिकी डॉलर को मध्यस्थ मुद्रा के रूप में उपयोग करने की आवश्यकता को भी कम कर सकती है।
चीन की भूमिका और भू-राजनीतिक आयाम
इस परियोजना को अक्सर चीन के नेतृत्व वाला माना जाता है क्योंकि पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना का डिजिटल करेंसी इंस्टीट्यूट इसके संस्थापक साझेदारों में से एक है। हाल के घटनाक्रमों में, सऊदी अरब द्वारा इस परियोजना से अलग होने की खबरें सामने आई हैं। यह वैश्विक वित्तीय वास्तुकला और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा विनिमय के बदलते परिदृश्य में रणनीतिक प्राथमिकताओं को रेखांकित करता है।

रंगेत नदी संरक्षण, पर्यटन और मत्स्य पालन का नया केंद्र
सिक्किम में रंगेत नदी के तट पर आयोजित होने वाला तीन दिवसीय नदी महोत्सव कैच-एंड-रिलीज फिशिंग, नदी संरक्षण और साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देता है। तीस्ता नदी की प्रमुख सहायक यह नदी अपनी जैव विविधता, जलविद्युत क्षमता और सांस्कृतिक महत्व के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
रंगेत नदी संरक्षण, पर्यटन और मत्स्य पालन का नया केंद्र
सारांश (Summary):
सिक्किम में रंगेत नदी के तट पर आयोजित होने वाला तीन दिवसीय नदी महोत्सव कैच-एंड-रिलीज फिशिंग, नदी संरक्षण और साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देता है। तीस्ता नदी की प्रमुख सहायक यह नदी अपनी जैव विविधता, जलविद्युत क्षमता और सांस्कृतिक महत्व के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
भौगोलिक स्थिति एवं उद्गम
रंगेत या रंगित नदी सिक्किम की सबसे बड़ी नदी तीस्ता की एक प्रमुख सहायक नदी है। यह पश्चिम सिक्किम जिले में स्थित कम कंचनजंगा क्षेत्र के माउंट काब्रू के एक ग्लेशियर से निकलती है। यह एक बारहमासी नदी है, जिसे शुरुआती गर्मियों में हिमालय की बर्फ पिघलने और जून से सितंबर के दौरान मानसून की बारिश से जल प्राप्त होता है। यह नदी पेल्लिंग, जोरैथांग और लेगशिप जैसे महत्वपूर्ण कस्बों से होकर गुजरती है। अपनी अंतिम यात्रा के दौरान यह सिक्किम और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के बीच प्राकृतिक सीमा का निर्माण करती है और पश्चिम बंगाल व सिक्किम की सीमा पर तीस्ता बाजार के पास तीस्ता नदी में मिल जाती है।
पारिस्थितिक एवं आर्थिक महत्व
यह नदी पारिस्थितिक रूप से एक महत्वपूर्ण पर्वतीय नदी प्रणाली है जो ठंडे पानी की मत्स्य पालन व्यवस्था (विशेष रूप से ट्राउट) का समर्थन करती है। इसके तटों पर घने वनों का आवरण है और कुछ क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेती की जाती है। यह स्थानीय समुदायों को सिंचाई और पेयजल उपलब्ध कराने के साथ-साथ लघु जलविद्युत परियोजनाओं के लिए भी जल आपूर्ति करती है। इसके तेज और उथल-पुथल भरे पानी के कारण यह क्षेत्र व्हाइट वाटर राफ्टिंग के शौकीनों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है।
जलविद्युत परियोजना
रंगेत नदी पर निर्मित 'रंगेत बांध' ने वर्ष 2000 में अपना परिचालन शुरू किया था। यह 45 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी ढांचा है जिसकी लंबाई 100 मीटर है। इस बांध की स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता 60 मेगावाट है, जो क्षेत्रीय ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
नदी महोत्सव और संरक्षण
सिक्किम में रंगेत नदी के तट पर आयोजित होने वाला नदी महोत्सव कैच-एंड-रिलीज फिशिंग (पकड़ो और छोड़ो मत्स्य पालन) पद्धति के माध्यम से नदी संरक्षण, साहसिक पर्यटन और स्थानीय संस्कृति के अनूठे समन्वय को प्रदर्शित करता है। यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सतत पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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