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पारंपरिक बिदरीशिल्प: उत्पत्ति, विशेषताएं, निर्माण प्रक्रिया एवं वर्तमान चुनौतियां

पारंपरिक बिदरीशिल्प: उत्पत्ति, विशेषताएं, निर्माण प्रक्रिया एवं वर्तमान चुनौतियां

Delight News
📅 21 Sep2026

कर्नाटक के बीदर जिले का प्रसिद्ध 'बिदरीशिल्प' एक प्राचीन धातु हस्तकला है, जिसे भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्राप्त है। यह जस्ता-तांबा मिश्र धातु पर चांदी के महीन जड़ाऊ काम और बीदर किले की विशेष मिट्टी से मिलने वाली गहरी काली चमक के लिए विश्वविख्यात है।

शीर्षक (Title): पारंपरिक बिदरीशिल्प: उत्पत्ति, विशेषताएं, निर्माण प्रक्रिया एवं वर्तमान चुनौतियां
सारांश (Summary): कर्नाटक के बीदर जिले का प्रसिद्ध 'बिदरीशिल्प' एक प्राचीन धातु हस्तकला है, जिसे भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्राप्त है। यह जस्ता-तांबा मिश्र धातु पर चांदी के महीन जड़ाऊ काम और बीदर किले की विशेष मिट्टी से मिलने वाली गहरी काली चमक के लिए विश्वविख्यात है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं उत्पत्ति
बिदरीशिल्प की उत्पत्ति का श्रेय 14वीं और 15वीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र पर शासन करने वाले बहमनी सुल्तानों को दिया जाता है। इस अनूठी कला को सबसे पहले सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती द्वारा बर्तनों के रूप में भारत लाया गया था। इस कला के विकास में तुर्की, फारसी और अरबी संस्कृतियों का गहरा प्रभाव रहा है, जो स्थानीय भारतीय शैलियों के साथ मिलकर एक विशिष्ट रूप में परिणत हुईं।
निर्माण प्रक्रिया एवं प्रमुख विशेषताएं
यह हस्तशिल्प मुख्य रूप से जस्ता और तांबे की मिश्र धातु से तैयार किया जाता है, जबकि इस पर बारीक नक्काशी और जड़ाऊ कार्य के लिए शुद्ध चांदी का उपयोग किया जाता है। शिल्पकार मुक्तहस्त नक्काशी के बाद छोटे छेनी और हथौड़ों की सहायता से सतह पर सूक्ष्म फूलों और ज्यामितीय आकृतियों के पैटर्न उकेरते हैं। इन खांचों में चांदी के महीन तारों या पट्टियों को सावधानीपूर्वक हथौड़े से ठोका जाता है।
विशिष्ट काला रंग और रासायनिक प्रक्रिया
इस कला रूप की सबसे बड़ी पहचान इसका गहरा काला रंग और चमक है। इस प्रभाव को प्राप्त करने के लिए बीदर किले के ऐतिहासिक परिसर से विशेष मिट्टी लाई जाती है। इस मिट्टी को एक विशिष्ट रासायनिक घोल में मिलाकर अंतिम चरण में उत्पाद पर लगाया जाता है, जिससे मिश्र धातु का रंग गहरा काला हो जाता है और चांदी की नक्काशी उभरकर सामने आती है। इसके बाद उत्पाद की सतह को चिकना करने के लिए बफिंग प्रक्रिया अपनाई जाती है।
वर्तमान चुनौतियां
यह पारंपरिक धातु शिल्प वर्तमान में चांदी, तांबे और जस्ता जैसी कीमती धातुओं की बढ़ती कीमतों के कारण गंभीर वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। इसके अलावा, पारंपरिक कारीगरों की घटती संख्या और आधुनिक मशीनी उत्पादों से मिलने वाली प्रतिस्पर्धा के कारण इस अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण पर संकट मंडरा रहा है।
वैश्विक व्यापार जलवायु सर्वेक्षण 2026 में भारत का शीर्ष स्थान

वैश्विक व्यापार जलवायु सर्वेक्षण 2026 में भारत का शीर्ष स्थान

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📅 21 Sep2026

ग्लोबल बिजनेस क्लाइमेट सर्वे 2026 में भारत ने 41 से अधिक वैश्विक बाजारों में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। स्वीडिश चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा जारी यह सर्वेक्षण देश के मजबूत आर्थिक परिदृश्य, निवेशकों के बढ़ते विश्वास और दीर्घकालिक व्यावसायिक स्थिरता को रेखांकित करता है।

वैश्विक व्यापार जलवायु सर्वेक्षण 2026 में भारत का शीर्ष स्थान
सारांश
ग्लोबल बिजनेस क्लाइमेट सर्वे 2026 में भारत ने 41 से अधिक वैश्विक बाजारों में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। स्वीडिश चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा जारी यह सर्वेक्षण देश के मजबूत आर्थिक परिदृश्य, निवेशकों के बढ़ते विश्वास और दीर्घकालिक व्यावसायिक स्थिरता को रेखांकित करता है।
सर्वेक्षण की पृष्ठभूमि और मुख्य उद्देश्य
यह वार्षिक सर्वेक्षण बिज़नेस स्वीडन, स्वीडिश चैंबर ऑफ कॉमर्स और स्वीडन के दूतावासों द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया जाता है। पश्चिमी यूरोप, एशिया-प्रशांत, मध्य पूर्व और अफ्रीका तथा अमेरिका के 41 प्रमुख बाजारों को कवर करने वाला यह सूचकांक पहली बार वर्ष 2020 में शुरू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी बाजारों में कार्यरत स्वीडिश व्यावसायिक नेतृत्व के अनुभवों और दृष्टिकोण का आकलन करना है। यह रिपोर्ट वैश्विक बाजारों में आर्थिक प्रदर्शन, परिचालन स्थितियों और निवेश संभावनाओं की तुलना करने के लिए एक मानक ढांचा प्रदान करती है।
2026 के प्रमुख निष्कर्ष और भारत का प्रदर्शन
नवीनतम संस्करण में भारत ने प्रथम स्थान हासिल किया है, जिसके बाद वियतनाम का स्थान है। सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश स्वीडिश कंपनियों ने भारत में सकारात्मक व्यावसायिक स्थितियों की पुष्टि की है और आगामी वर्ष के दौरान पूंजी निवेश में वृद्धि करने की स्पष्ट इच्छा जताई है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र को इस सूचकांक में सबसे आशावादी क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया है, जिसमें फिलीपींस और भारत नियोजित निवेश के लिए अग्रणी गंतव्यों के रूप में उभरे हैं।
वैश्विक रुझान और चुनौतियाँ
वैश्विक स्तर पर मध्य पूर्व और अफ्रीका के बाजारों में कुछ हद तक सतर्क रुख देखा गया है, जबकि अमेरिका और यूरोप के आर्थिक संकेतकों में पिछले वर्ष की तुलना में सुधार दर्ज किया गया है। इसके बावजूद, भारत की विशाल घरेलू उपभोक्ता आबादी, तीव्र गति से विकसित होता बुनियादी ढांचा और डिजिटल परिवर्तन इसे विदेशी निवेशकों के लिए दीर्घकालिक रूप से अत्यधिक आकर्षक बनाते हैं। हालांकि, रिपोर्ट में प्रशासनिक जटिलताओं और नियामक अनिश्चितताओं को कुछ हद तक व्यावसायिक बाधाओं के रूप में भी रेखांकित किया गया है।
बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS): यूपीएससी परीक्षा के लिए संपूर्ण विश्लेषण

बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS): यूपीएससी परीक्षा के लिए संपूर्ण विश्लेषण

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📅 21 Sep2026

बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) एक ऐसी तकनीक है जो विद्युत ऊर्जा को रिचार्जेबल बैटरियों में संग्रहित कर आवश्यकतानुसार पुनः वितरित करती है। यह ग्रिड स्थिरता बनाए रखने, नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण और पीक लोड प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और हरित लक्ष्यों को बल मिलता है।

शीर्षक (Title): बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS): यूपीएससी परीक्षा के लिए संपूर्ण विश्लेषण
सारांश (Summary):
बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) एक ऐसी तकनीक है जो विद्युत ऊर्जा को रिचार्जेबल बैटरियों में संग्रहित कर आवश्यकतानुसार पुनः वितरित करती है। यह ग्रिड स्थिरता बनाए रखने, नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण और पीक लोड प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और हरित लक्ष्यों को बल मिलता है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
परिचय एवं कार्यप्रणाली
बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) विद्युत ऊर्जा को रासायनिक रूप में संग्रहित करने और आवश्यकता पड़ने पर उसे विद्युत ऊर्जा के रूप में वापस ग्रिड या उपभोक्ताओं को प्रेषित करने वाला एक उन्नत तंत्र है। यह प्रणाली सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे अनिरंतर (intermittent) नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से अतिरिक्त बिजली का भंडारण करती है। जब ऊर्जा की मांग उच्च होती है या उत्पादन कम होता है, तब यह संग्रहित ऊर्जा को डिस्चार्ज कर बिजली की आपूर्ति को संतुलित करती है।
प्रमुख घटक और तकनीकी संरचना
एक पूर्ण BESS में केवल बैटरी सेल या मॉड्यूल ही शामिल नहीं होते, बल्कि इसमें कई अन्य महत्वपूर्ण तकनीकें भी कार्य करती हैं। इसमें बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) शामिल है जो सेल के वोल्टेज, तापमान और चार्ज की स्थिति की निगरानी करता है। इसके अलावा, पावर कन्वर्जन सिस्टम (PCS) या इन्वर्टर डीसी पावर को एसी पावर में परिवर्तित करता है, और थर्मल मैनेजमेंट सिस्टम बैटरी को सुरक्षित तापमान सीमा में रखता है। क्लाउड-कनेक्टेड नियंत्रण प्रणाली नियमों और ग्रिड संकेतों के आधार पर चार्जिंग और डिस्चार्जिंग का प्रबंधन करती है।
ऊर्जा सुरक्षा और ग्रिड में महत्व
यह प्रणाली ऊर्जा अर्थव्यवस्था में सुधार और ग्रिड पर दबाव कम करने के लिए अपरिहार्य है। यह पीक शेविंग, लोड शिफ्टिंग, और आपातकालीन बैकअप पावर प्रदान करने में सहायक है। NTPC लिमिटेड द्वारा महाराष्ट्र के मौदा सुपर थर्मल पावर स्टेशन पर 400 MWh BESS परियोजना के संदर्भ में हालिया घटनाक्रम इस तकनीक के बढ़ते रणनीतिक महत्व को रेखांकित करता है। इसके माध्यम से ऊर्जा की उपलब्धता को अनुकूलित किया जाता है और भारत के राष्ट्रीय ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा किया जाता है।
चीनी मिलों और थोक उपभोक्ताओं के लिए राहत: एडवांस ऑथराइजेशन योजना में बड़े बदलाव

चीनी मिलों और थोक उपभोक्ताओं के लिए राहत: एडवांस ऑथराइजेशन योजना में बड़े बदलाव

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📅 20 Sep2026

सरकार ने थोक उपभोक्ताओं के लिए चीनी के स्टॉक की सीमा 15 दिनों से बढ़ाकर 30 दिन कर दी है। अतिरिक्त स्टॉक एडवांस ऑथराइजेशन योजना के तहत आयातित चीनी से ही होना चाहिए। डीजीएफटी द्वारा संचालित इस योजना का उद्देश्य निर्यातकों को बिना किसी शुल्क के कच्चे माल का आयात करने की सुविधा देना है।

चीनी मिलों और थोक उपभोक्ताओं के लिए राहत: एडवांस ऑथराइजेशन योजना में बड़े बदलाव
खबर का निचोड़:
सरकार ने थोक उपभोक्ताओं के लिए चीनी के स्टॉक की सीमा 15 दिनों से बढ़ाकर 30 दिन कर दी है। अतिरिक्त स्टॉक एडवांस ऑथराइजेशन योजना के तहत आयातित चीनी से ही होना चाहिए। डीजीएफटी द्वारा संचालित इस योजना का उद्देश्य निर्यातकों को बिना किसी शुल्क के कच्चे माल का आयात करने की सुविधा देना है।
अत्याधुनिक नियमों का नया दौर
देश के व्यापारिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सरकार ने निर्यातकों और थोक उपभोक्ताओं के लिए नियमों में लचीलापन दिखाया है। अब तक स्टॉक सीमा को लेकर जो सख्त पाबंदियां थीं, उनमें राहत दी गई है। इस बदलाव से विशेष रूप से उन उद्योगों को बल मिलेगा जो बड़े पैमाने पर उत्पादन और वैश्विक बाजारों में अपनी मजबूत पकड़ बनाने के लिए प्रयासरत हैं।
स्टॉक सीमा में हुआ बड़ा बदलाव
सरकार ने थोक उपभोक्ताओं के लिए मौजूदा 15 दिन की स्टॉकहोल्डिंग सीमा को बढ़ाकर सीधे 30 दिन कर दिया है। हालांकि, इसके साथ एक स्पष्ट शर्त जोड़ी गई है कि 15 दिनों से अधिक का स्टॉक केवल एडवांस ऑथराइजेशन योजना (एएएस) के तहत आयातित चीनी से ही पूरा किया जाएगा। यह कदम घरेलू बाजार में संतुलन बनाए रखने और आयातकों को बेहतर अवसर प्रदान करने की दिशा में उठाया गया है।
क्या है एडवांस ऑथराइजेशन योजना
यह योजना अंतरराष्ट्रीय बाजार में देश की साख और निर्यात को बढ़ावा देने का एक प्रभावी माध्यम है। इसके अंतर्गत निर्यात उत्पादों में भौतिक रूप से उपयोग होने वाले इनपुट को बिना किसी शुल्क के आयात करने की अनुमति मिलती है। इसमें केवल कच्चा माल ही नहीं, बल्कि पैकेजिंग सामग्री, ईंधन, तेल और कैटलिस्ट भी शामिल हैं जो उत्पादन प्रक्रिया में खपत होते हैं। इसका मुख्य संचालन विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) द्वारा किया जाता है।
करों से मिलती है पूर्ण छूट
इस योजना के तहत आयातित इनपुट कई तरह के शुल्कों से मुक्त होते हैं। इसमें बेसिक कस्टम ड्यूटी, एडिशनल कस्टम ड्यूटी, एजुकेशन सेस, एंटी-डंपिंग ड्यूटी और सेफगार्ड ड्यूटी के साथ-साथ इंटीग्रेटेड टैक्स और कंपनसेशन सेस भी शामिल हैं। हालांकि, इन सभी छूटों का लाभ उठाने के लिए कुछ निश्चित शर्तों का पालन करना अनिवार्य होता है और इसके एवज में एक निर्यात दायित्व भी तय किया जाता है।
किसे मिलता है इसका सीधा लाभ
यह योजना मुख्य रूप से दो श्रेणियों के निर्यातकों के लिए वरदान साबित होती है। इसमें निर्माता निर्यातक (जो निर्यात के लिए खुद वस्तुओं का निर्माण करते हैं) और मर्चेंट निर्यातक (जो सहायक निर्माताओं से सामान प्राप्त कर निर्यात करते हैं) शामिल हैं। इस ऑथराइजेशन का दायरा काफी व्यापक है, जिसके तहत भौतिक निर्यात, इंटरमीडिएट सप्लाई, डीम्ड एक्सपोर्ट और विदेशी जाने वाले जहाजों व विमानों पर 'स्टोर' की आपूर्ति को कवर किया जाता है।
वैधता और समयसीमा
व्यापारिक गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए इस ऑथराइजेशन की वैधता जारी होने की तिथि से 12 महीने तक तय की गई है। इस निश्चित समय सीमा के भीतर निर्यातकों को अपने सभी लक्ष्यों को पूरा करना होता है, जिससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक व्यापारिक संबंधों को मजबूती मिलती है।
समंदर का नया सिकंदर: भारतीय नौसेना की ताकत

समंदर का नया सिकंदर: भारतीय नौसेना की ताकत

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📅 20 Sep2026

कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड भारतीय नौसेना के लिए छह नेक्स्ट-जेनरेशन मिसाइल जहाजों का निर्माण कर रहा है। करीब 9,805 करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत पहले जहाज की कील रख दी गई है। ब्रह्मोस मिसाइल से लैस ये हाई-स्पीड युद्धपोत रणनीतिक चोक पॉइंट्स पर दुश्मन के छक्के छुड़ाने और समंदर में दबदबा कायम करने के लिए तैयार हो रहे हैं।

समंदर का नया सिकंदर: भारतीय नौसेना की ताकत
खबर का निचोड़
कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड भारतीय नौसेना के लिए छह नेक्स्ट-जेनरेशन मिसाइल जहाजों का निर्माण कर रहा है। करीब 9,805 करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत पहले जहाज की कील रख दी गई है। ब्रह्मोस मिसाइल से लैस ये हाई-स्पीड युद्धपोत रणनीतिक चोक पॉइंट्स पर दुश्मन के छक्के छुड़ाने और समंदर में दबदबा कायम करने के लिए तैयार हो रहे हैं।
समंदर में भारत की नई आक्रामक ताकत
भारतीय नौसेना की मारक क्षमता को एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व मजबूती मिलने जा रही है। देश की सुरक्षा को धार देते हुए, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने छह नेक्स्ट-जेनरेशन मिसाइल जहाजों (NGMV) में से पहले पोत की कील रख दी है। यह मील का पत्थर न केवल शिपबिल्डर के लिए एक बड़ी छलांग है, बल्कि यह एडवांस्ड वेपन-इंटेंसिव प्लेटफॉर्म्स के निर्माण में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता का भी स्पष्ट प्रमाण है।
रणनीतिक चोक पॉइंट्स पर अचूक प्रहार
लगभग 9,805 करोड़ रुपये की इस विशाल लागत वाली परियोजना के तहत तैयार होने वाले ये अत्याधुनिक युद्धपोत मार्च 2027 से भारतीय बेड़े में शामिल होने शुरू हो जाएंगे। इन जहाजों की प्राथमिक भूमिका दुश्मन के युद्धपोतों, मर्चेंट जहाजों और जमीनी ठिकानों पर आक्रामक प्रहार करना है। इन्हें विशेष रूप से मैरीटाइम स्ट्राइक और एंटी-सरफेस वॉरफेयर ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया है, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री चोक पॉइंट्स पर नौसेना को शक्तिशाली 'सी-डैनियल' यानी समुद्री अवरोधक क्षमता प्रदान करेंगे।
रफ्तार, स्टील्थ और घातक हथियारों का संगम
इन जहाजों की तकनीकी खूबियां इन्हें दुनिया के चुनिंदा आधुनिक युद्धपोतों की कतार में खड़ा करती हैं। जनरल इलेक्ट्रिक द्वारा निर्मित शक्तिशाली एलएम2500 मरीन गैस टरबाइन इनकी propulsion प्रणाली का दिल है, जो स्टील्थ (छिपे रहने की) जरूरतों को पूरा करते हुए जबरदस्त रफ्तार पैदा करती है। लगभग 80 कर्मियों के दल वाले ये पोत 33 समुद्री मील (61 किमी/घंटा) की अधिकतम गति हासिल करने में सक्षम हैं। रीफ्यूलिंग के जरिए अपनी क्षमता का विस्तार करते हुए ये लगातार 10 दिनों तक खुले समुद्र में तैनात रह सकते हैं।
ब्रह्मोस की ताकत और आधुनिक सुरक्षा कवच
इन युद्धपोतों की सबसे बड़ी मारक क्षमता इसमें शामिल ब्रह्मोस सुपरसोमिस क्रूज़ मिसाइल है, जो लंबी दूरी के लक्ष्यों को पलक झपकते नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखती है। इसके अलावा, ये पोत अत्याधुनिक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों, एंटी-मिसाइल डिफेंस सिस्टम, एयर-सर्विलांस और फायर-कंट्रोल रडार से लैस होंगे। उन्नत इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम और डैमेज-कंट्रोल मशीनरी के साथ, यह नया बेड़ा न केवल आक्रामक अभियानों को अंजाम देगा, बल्कि स्थानीय नौसैनिक रक्षा और अपतटीय विकास क्षेत्रों की सुरक्षा का भी एक मजबूत मोर्चा संभालेगा।

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