
ग्लोबल जंग के बीच पैट्रियट मिसाइल सिस्टम का उत्पादन तेज
पैट्रियट मिसाइल सिस्टम के उत्पादन को युद्ध की वर्तमान जरूरतों के मद्देनजर तेजी से बढ़ाया जा रहा है। जनरल मोटर्स द्वारा लॉकहीड मार्टिन को महत्वपूर्ण घटकों की आपूर्ति के बाद, इस एयर डिफेंस सिस्टम की ताकत और कूटनीतिक अहमियत दोनों में भारी इजाफा हुआ है।
पैट्रियट मिसाइल सिस्टम के उत्पादन को युद्ध की वर्तमान जरूरतों के मद्देनजर तेजी से बढ़ाया जा रहा है। जनरल मोटर्स द्वारा लॉकहीड मार्टिन को महत्वपूर्ण घटकों की आपूर्ति के बाद, इस एयर डिफेंस सिस्टम की ताकत और कूटनीतिक अहमियत दोनों में भारी इजाफा हुआ है।
वैश्विक संघर्षों के बीच पैट्रियट का बढ़ता दायरा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी संघर्षों के बीच रक्षा उत्पादन में तेजी लाने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है। इसी क्रम में अमेरिकी रक्षा कंपनी लॉकहीड मार्टिन को जनरल मोटर्स से पैट्रियट इंटरसेप्टर्स के लिए बेहद अहम कंपोनेंट्स की एक नई खेप मिली है। इस कदम से साफ है कि दुनिया भर में मिसाइल रक्षा प्रणालियों की मांग में अभूतपूर्व उछाल आया है और अमेरिका अपने रक्षा तंत्र को और अधिक मजबूत करने में जुट गया है।
क्या है पैट्रियट मिसाइल सिस्टम?
पैट्रियट (Phased Array Tracking Radar for Intercept on Target) अमेरिकी सेना का सबसे आधुनिक और अत्याधुनिक मोबाइल सरफेस-टू-एयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम है। मूल रूप से रेसियन टेक्नोलॉजीज द्वारा विकसित यह डिफेंस सिस्टम विमानों, सामरिक बैलिस्टिक मिसाइलों और क्रूज मिसाइलों को हवा में ही नेस्तनाबूद करने की अचूक क्षमता रखता है। पहली बार इसका मुकाबला 1991 के खाड़ी युद्ध में देखने को मिला था, जहां इसने सऊदी अरब, कुवैत और इजराइल की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद 2003 में इराक पर अमेरिकी आक्रमण के दौरान भी इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया था। वर्तमान में अमेरिका, जर्मनी, पोलैंड, यूक्रेन, जापान और सऊदी अरब समेत कुल 19 देश इस घातक रक्षा प्रणाली का संचालन कर रहे हैं।
तकनीकी ताकत और मारक क्षमता
एक पैट्रियट बैटरी में फेस्ड एरे रडार, एंगेजमेंट कंट्रोल स्टेशन, कंप्यूटर, बिजली जनरेटर और आठ तक लॉन्चर शामिल होते हैं, जिनमें हर एक पर चार मिसाइलें तैनात रहती हैं। हालांकि एक बैटरी में लगभग 90 सैनिक होते हैं, लेकिन युद्ध के मैदान में इसे संचालित करने के लिए कंट्रोल स्टेशन पर केवल तीन सैनिकों की आवश्यकता होती है। इसका रडार 150 किलोमीटर से अधिक के दायरे में एक साथ 100 तक लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है।
इसकी मिसाइलें इस्तेमाल होने वाले इंटरसेप्टर के आधार पर अलग-अलग क्षमताएं दिखाती हैं। जहां PAC-2 इंटरसेप्टर ब्लास्ट-फ्रैगमेंटेशन वॉरहेड का इस्तेमाल करता है, वहीं आधुनिक PAC-3 मिसाइलें अधिक घातक 'हिट-टू-किल' तकनीक पर काम करती हैं। यह सिस्टम 24 किलोमीटर से अधिक की ऊंचाई तक के लक्ष्यों को भेदने में पूरी तरह सक्षम है।

मुंबई की शान 'बिजली' के जाने से सूना हुआ संजय गांधी नेशनल पार्क, अब बचे हैं इतने बाघ
संजय गांधी नेशनल पार्क की शान और पर्यटकों की मुख्य आकर्षण रहीं 18 साल की बाघिन 'बिजली' का उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं के चलते निधन हो गया है। इस दुखद घटना के साथ ही पार्क में बाघों की कुल संख्या घटकर 11 रह गई है, जिसने वन्यजीव प्रेमियों को मायूस कर दिया है।
संजय गांधी नेशनल पार्क की शान और पर्यटकों की मुख्य आकर्षण रहीं 18 साल की बाघिन 'बिजली' का उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं के चलते निधन हो गया है। इस दुखद घटना के साथ ही पार्क में बाघों की कुल संख्या घटकर 11 रह गई है, जिसने वन्यजीव प्रेमियों को मायूस कर दिया है।
मुंबई की धड़कन: संजय गांधी नेशनल पार्क का परिचय
उत्तरी मुंबई के बोरिवली में स्थित संजय गांधी नेशनल पार्क (SGNP) दुनिया के उन चुनिंदा राष्ट्रीय उद्यानों में शामिल है जो किसी शहर की सीमा के भीतर स्थित हैं। लगभग 103 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह पार्क मुंबई शहर के भौगोलिक क्षेत्र का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा बनाता है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो शुरुआती दौर में इसे 'कृष्णगिरी नेशनल पार्क' के नाम से जाना जाता था। समय के साथ साल 1974 में इसका नाम बदलकर 'बोरिवली नेशनल पार्क' और फिर 1981 में वर्तमान नाम 'संजय गांधी नेशनल पार्क' कर दिया गया।
ऐतिहासिक धरोहर और प्राकृतिक खजाने
इस राष्ट्रीय उद्यान के केंद्र में स्थित कान्हेरी गुफाएं प्राचीन इतिहास और संस्कृति का अनूठा संगम हैं। ईसा पूर्व 9वीं से पहली शताब्दी के बीच बौद्ध भिक्षुओं द्वारा विशाल बेसाल्ट चट्टानों को तराशकर बनाई गई ये गुफाएं बौद्ध वास्तुकला, विहारों, स्तूपों और प्रार्थना हॉलों का बेहतरीन नमूना पेश करती हैं। गुफाओं के रास्ते में तीन विशाल नक्काशीदार मूर्तियों वाला एक भव्य जैन मंदिर भी मौजूद है। इसके अलावा, यह पार्क तुलसी और विहार जैसी दो खूबसूरत झीलों, एक भव्य डियर पार्क, रोमांचक लायन सफारी और महात्मा गांधी की समाधि के लिए भी देश-दुनिया में प्रसिद्ध है।
समृद्ध वनस्पति और जीव-जंतुओं का बसेरा
यह पार्क जैव विविधता का एक बेहद समृद्ध केंद्र है। यहाँ कदंब, सागवान, करण करंज, शीशम, पलाश (फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट), लाल सेमल और कई अन्य प्रजातियों के पेड़-पौधे पाए जाते हैं। यहाँ की सबसे खास विशेषता 'कार्वी' या 'कार्व्य' का पौधा है, जो हर सात साल में एक बार खिलकर पूरे जंगल को जादुई रंग में रंग देता है।
जीव-जंतुओं की दुनिया की बात करें तो यहाँ तेंदुए, सांभर, चीतल, बार्किंग डियर, रस्टी-स्पॉटेड कैट, लकड़बग्घा, सिवेट, भारतीय क्रेस्टेड साही, इंडियन फ्लाइंग फॉक्स, लंगूर और बॉनेट मकाक जैसे कई वन्यजीव स्वतंत्र रूप से निवास करते हैं। इसके अलावा, यह पार्क 251 से अधिक प्रजातियों के पक्षियों और तितलियों की विशाल विविधता का भी मुख्य आशियाना है।

मुंबई की जीवनदायिनी वैतरणा नदी: रील्स के चक्कर में थम गईं सांसें
महाराष्ट्र के पालघर में गणेशोत्सव के दौरान रील्स बनाते वक्त दो किशोरों की वैतरणा नदी में डूबने से मौत हो गई। पश्चिमी भारत की यह प्रमुख नदी, जो त्र्यंबक पहाड़ियों से निकलकर मुंबई को पानी देती है, अपनी खूबसूरती के साथ-साथ खतरनाक हादसों के लिए भी चर्चा में आ गई है।
खबर का निचोड़:
महाराष्ट्र के पालघर में गणेशोत्सव के दौरान रील्स बनाते वक्त दो किशोरों की वैतरणा नदी में डूबने से मौत हो गई। पश्चिमी भारत की यह प्रमुख नदी, जो त्र्यंबक पहाड़ियों से निकलकर मुंबई को पानी देती है, अपनी खूबसूरती के साथ-साथ खतरनाक हादसों के लिए भी चर्चा में आ गई है।
मौत का खतरनाक शौक: रील्स के चक्कर में गई किशोरों की जान
सोशल मीडिया पर छा जाने की दीवानगी अब जानलेवा साबित हो रही है। गणेशोत्सव की छुट्टियों के बीच महाराष्ट्र के पालघर जिले से एक बेहद दर्दनाक खबर सामने आई है। यहां वैतरणा नदी के पास सोशल मीडिया के लिए रील्स बनाते समय दो किशोर गहरे पानी में उतर गए और डूबकर अपनी जान गंवा बैठे। यह हादसा इस बात की गंभीर चेतावनी है कि कैसे डिजिटल लाइक्स और व्यूज के चक्कर में युवा अपनी अनमोल जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं। सुरक्षा मानकों को दरकिनार कर पानी के तेज बहाव और गहराई का अंदाजा न लगाना अक्सर ऐसे खौफनाक अंजाम तक पहुंचा देता है।
त्र्यंबक की पहाड़ियों से अरब सागर तक का सफर
वैतरणा नदी सिर्फ हादसों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने भौगोलिक और रणनीतिक महत्व के लिए भी जानी जाती है। यह नदी महाराष्ट्र के नासिक जिले में त्र्यंबेकश्वर के पास त्र्यंबक-अंजनरी पहाड़ियों के दक्षिणी ढलानों से निकलती है। दिलचस्प बात यह है कि यही पहाड़ियां गोदावरी नदी का भी उद्गम स्थल हैं। पश्चिमी घाट यानी सह्याद्री श्रृंखलाओं से शुरू होकर यह नदी पश्चिम दिशा में लगभग 154 किलोमीटर की दूरी तय करती है और अंततः अरब सागर में मिल जाती है। अपने इस सफर के दौरान यह नासिक, पालघर और ठाणे जिलों से गुजरती है, जिससे यह पश्चिमी महाराष्ट्र के एक बड़े भूभाग के लिए बेहद अहम बन जाती है। इसके मुहाने के पास अर्नाला द्वीप स्थित है, जबकि इसकी एस्ट्यूरी में झोव और वधि्व द्वीप मौजूद हैं।
मानसून पर निर्भर जलराशि और प्रमुख सहायक नदियां
इस नदी का जलप्रवाह पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर है। जून से अक्टूबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून से इसे अपनी जलराशि का अधिकांश हिस्सा मिलता है। बेसिन की लगभग 98 प्रतिशत वार्षिक वर्षा इसी अवधि में दर्ज होती है, जिससे यह साल के एक बड़े हिस्से में अत्यधिक मौसमी प्रकृति की नदी बन जाती है। इस पूरे बेसिन को सींचने में कई प्रमुख नदियां इसका साथ देती हैं। अल्वांड, तानसा, पिंजल, सूर्य, दहानू और गंजई जैसी नदियां इसकी मुख्य सहायक नदियां हैं, जो इसके जलतंत्र को और मजबूत करती हैं।
मुंबई की प्यास बुझाने वाली अहम जलधारा
शहरी जीवन के लिहाज से वैतरणा नदी का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले मुंबई शहर की जल आपूर्ति का बहुत बड़ा आधार यही नदी है। अकेले मुंबई की 60 प्रतिशत से अधिक पानी की जरूरत वैतरणा नदी और उससे जुड़े बांधों के जरिए पूरी की जाती है। एक तरफ जहां यह नदी करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती है, वहीं दूसरी तरफ इसके बदलते मिजाज और मौसमी स्वभाव को लेकर लगातार सतर्कता बरतने की जरूरत भी महसूस होती है।

खान-पान से महरूम बस्तियों की बदलेगी तकदीर, जानिए क्या है पीएमकेकेएवाई
खदानों की धूल फांकने वाले इलाकों के विकास के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेएवाई) खनन प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीर बदलने का काम कर रही है। जिला खनिज फाउण्डेशन (डीएमएफ) के जरिए मिलने वाले फंड से स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं तेजी से पहुंचाई जा रही हैं।
खबर का निचोड़:
खदानों की धूल फांकने वाले इलाकों के विकास के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेएवाई) खनन प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीर बदलने का काम कर रही है। जिला खनिज फाउण्डेशन (डीएमएफ) के जरिए मिलने वाले फंड से स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं तेजी से पहुंचाई जा रही हैं।
खदानों के साये में विकास की नई किरण
भारत के खनिज समृद्ध इलाके बरसों से विकास की दौड़ में पिछड़े रहे हैं। जिस जमीन से देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलती है, वहां रहने वाले लोग अक्सर बुनियादी सुविधाओं के मोहताज नजर आते हैं। इसी विडंबना को दूर करने के लिए साल 2015 में प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना यानी पीएमकेकेएवाई की शुरुआत की गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य खनन गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों और वहां के बाशिंदों के जीवन स्तर में सुधार लाना है।
जिला खनिज फाउण्डेशन फंड का सटीक इस्तेमाल
इस योजना की सबसे बड़ी ताकत इसका वित्तीय मॉडल है। इसके लिए अलग से कोई बजट नहीं बनता, बल्कि जिला खनिज फाउण्डेशन (डीएमएफ) के पास जमा होने वाले फंड का ही इस्तेमाल किया जाता है। खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत सभी राज्यों के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे अपने डीएमएफ नियमों में इस योजना को शामिल करें। इससे खनन प्रभावित जिलों में पैसों की कमी आड़े नहीं आती।
प्राथमिकता के आधार पर खर्च होती है पाई-पाई
योजना के तहत फंड के इस्तेमाल को लेकर बेहद स्पष्ट और सख्त नियम बनाए गए हैं। कुल राशि का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा 'उच्च प्राथमिकता' वाले क्षेत्रों पर खर्च किया जाता है। इसमें शुद्ध पेयजल की आपूर्ति, पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण उपाय, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और महिला एवं बाल कल्याण जैसे बेहद जरूरी काम शामिल हैं।
बुनियादी ढांचे और पर्यावरण पर विशेष फोकस
बचा हुआ 40 प्रतिशत तक का फंड 'अन्य प्राथमिकता' वाले क्षेत्रों के लिए तय किया गया है। इसमें भौतिक बुनियादी ढांचे का विकास, सिंचाई, ऊर्जा, वाटरशेड विकास और पर्यावरण की गुणवत्ता को बेहतर बनाने वाले अन्य कार्य किए जाते हैं। इसका मकसद खनन के दौरान और उसके बाद पर्यावरण, स्वास्थ्य और लोगों की आजीविका पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को कम से कम करना है।
दीर्घकालिक और स्थायी आजीविका का संकल्प
इस योजना का दायरा सिर्फ तात्कालिक राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका लक्ष्य दूरगामी है। यह केंद्र और राज्यों की अन्य चल रही योजनाओं के साथ मिलकर काम करती है ताकि खनन क्षेत्रों के लोगों को लंबे समय तक टिकने वाली और स्थायी आजीविका मिल सके। खदानों के आसपास की आबोहवा और जिंदगी को संवारने की दिशा में यह एक मजबूत कदम साबित हो रहा है।

चार दशकों का इंतजार खत्म: इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पर्यटकों की होगी वापसी
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का सुदूर और रहस्यमयी इंद्रावती टाइगर रिजर्व चार दशकों के लंबे अंतराल के बाद पर्यटकों के लिए फिर से खुलने जा रहा है। 1 नवंबर से शुरू हो रही इस वन्यजीव पर्यटन व्यवस्था से इस अछूते जंगल के द्वार सैलानियों के लिए हमेशा के लिए खुल जाएंगे।
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का सुदूर और रहस्यमयी इंद्रावती टाइगर रिजर्व चार दशकों के लंबे अंतराल के बाद पर्यटकों के लिए फिर से खुलने जा रहा है। 1 नवंबर से शुरू हो रही इस वन्यजीव पर्यटन व्यवस्था से इस अछूते जंगल के द्वार सैलानियों के लिए हमेशा के लिए खुल जाएंगे।
बस्तर के जंगलों में गूंजेगी पर्यटकों की चहलकदमी
छत्तीसगढ़ के बीहड़ और सबसे कम खोजे गए जंगलों में शुमार इंद्रावती टाइगर रिजर्व आखिरकार गुलजार होने को तैयार है। आगामी 1 नवंबर से इस रिजर्व को पर्यटकों के लिए अधिकृत तौर पर खोल दिया जाएगा। करीब चालीस साल बाद यह पहला मौका होगा जब इस इलाके में व्यवस्थित वन्यजीव पर्यटन की शुरुआत होगी, जिससे प्रकृति प्रेमियों और रोमांच के शौकीनों को एक नया और रोमांचक ठिकाना मिल सकेगा।
भौगोलिक स्थिति और अंतरराज्यीय सीमा
छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित यह टाइगर रिजर्व बेहद सामरिक और प्राकृतिक महत्व रखता है। इंद्रावती टाइगर रिजर्व, भैरमगढ़ और पामेड वन्यजीव अभयारण्यों के साथ मिलकर संपूर्ण इंद्रावती लैंडस्केप का निर्माण करता है। इस रिजर्व की उत्तर और पश्चिमी सीमा पर बहने वाली इंद्रावती नदी इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती है। यही नदी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के बीच अंतरराज्यीय सीमा का काम भी करती है। इसके अलावा, इसकी भौगोलिक कनेक्टिविटी तेलंगाना के कवल, महाराष्ट्र के ताडोबा और मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व से जुड़ी हुई है।
समृद्ध वन संपदा और दुर्लभ जीव-जंतु
यह रिजर्व अपनी अनूठी जैव विविधता के लिए देश भर में जाना जाता है। यहाँ की वनस्पति मुख्य रूप से दक्षिणी नम मिश्रित पर्णपाती और शुष्क पर्णपाती वनों में बंटी हुई है। जंगलों की इस छांव में सागौन, आचार, कर्रा, कुल्लू, शीशम, सेमल, हलदु, अर्जुन, बेल और जामुन जैसे बहुमूल्य पेड़-पौधे पाए जाते हैं।
जीव-जंतुओं की बात करें तो यह संरक्षित क्षेत्र छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु और अत्यंत दुर्लभ 'वाइल्ड बफेलो' (जंगली भैंसे) की अंतिम बची हुई आबादी का घर है। इसके अलावा, इस सघन जंगल में बाघ, तेंदुए, नीलगाय, ब्लैक बक, सांभर, गौर, चीतल और सुस्त भालू (स्लोथ बियर) जैसे वन्यजीव खुलेआम विचरण करते हैं। चार दशकों के बाद सैलानियों के लिए इसके दरवाजे खुलने से इस क्षेत्र में पर्यटन को एक अभूतपूर्व बढ़ावा मिलने की पूरी उम्मीद है।
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