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खान-पान से महरूम बस्तियों की बदलेगी तकदीर, जानिए क्या है पीएमकेकेएवाई

खान-पान से महरूम बस्तियों की बदलेगी तकदीर, जानिए क्या है पीएमकेकेएवाई

Delight News
📅 19 Sep2026

खदानों की धूल फांकने वाले इलाकों के विकास के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेएवाई) खनन प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीर बदलने का काम कर रही है। जिला खनिज फाउण्डेशन (डीएमएफ) के जरिए मिलने वाले फंड से स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं तेजी से पहुंचाई जा रही हैं।

खान-पान से महरूम बस्तियों की बदलेगी तकदीर, जानिए क्या है पीएमकेकेएवाई
खबर का निचोड़:
खदानों की धूल फांकने वाले इलाकों के विकास के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेएवाई) खनन प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीर बदलने का काम कर रही है। जिला खनिज फाउण्डेशन (डीएमएफ) के जरिए मिलने वाले फंड से स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं तेजी से पहुंचाई जा रही हैं।
खदानों के साये में विकास की नई किरण
भारत के खनिज समृद्ध इलाके बरसों से विकास की दौड़ में पिछड़े रहे हैं। जिस जमीन से देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलती है, वहां रहने वाले लोग अक्सर बुनियादी सुविधाओं के मोहताज नजर आते हैं। इसी विडंबना को दूर करने के लिए साल 2015 में प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना यानी पीएमकेकेएवाई की शुरुआत की गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य खनन गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों और वहां के बाशिंदों के जीवन स्तर में सुधार लाना है।
जिला खनिज फाउण्डेशन फंड का सटीक इस्तेमाल
इस योजना की सबसे बड़ी ताकत इसका वित्तीय मॉडल है। इसके लिए अलग से कोई बजट नहीं बनता, बल्कि जिला खनिज फाउण्डेशन (डीएमएफ) के पास जमा होने वाले फंड का ही इस्तेमाल किया जाता है। खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत सभी राज्यों के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे अपने डीएमएफ नियमों में इस योजना को शामिल करें। इससे खनन प्रभावित जिलों में पैसों की कमी आड़े नहीं आती।
प्राथमिकता के आधार पर खर्च होती है पाई-पाई
योजना के तहत फंड के इस्तेमाल को लेकर बेहद स्पष्ट और सख्त नियम बनाए गए हैं। कुल राशि का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा 'उच्च प्राथमिकता' वाले क्षेत्रों पर खर्च किया जाता है। इसमें शुद्ध पेयजल की आपूर्ति, पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण उपाय, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और महिला एवं बाल कल्याण जैसे बेहद जरूरी काम शामिल हैं।
बुनियादी ढांचे और पर्यावरण पर विशेष फोकस
बचा हुआ 40 प्रतिशत तक का फंड 'अन्य प्राथमिकता' वाले क्षेत्रों के लिए तय किया गया है। इसमें भौतिक बुनियादी ढांचे का विकास, सिंचाई, ऊर्जा, वाटरशेड विकास और पर्यावरण की गुणवत्ता को बेहतर बनाने वाले अन्य कार्य किए जाते हैं। इसका मकसद खनन के दौरान और उसके बाद पर्यावरण, स्वास्थ्य और लोगों की आजीविका पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को कम से कम करना है।
दीर्घकालिक और स्थायी आजीविका का संकल्प
इस योजना का दायरा सिर्फ तात्कालिक राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका लक्ष्य दूरगामी है। यह केंद्र और राज्यों की अन्य चल रही योजनाओं के साथ मिलकर काम करती है ताकि खनन क्षेत्रों के लोगों को लंबे समय तक टिकने वाली और स्थायी आजीविका मिल सके। खदानों के आसपास की आबोहवा और जिंदगी को संवारने की दिशा में यह एक मजबूत कदम साबित हो रहा है।
चार दशकों का इंतजार खत्म: इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पर्यटकों की होगी वापसी

चार दशकों का इंतजार खत्म: इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पर्यटकों की होगी वापसी

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📅 19 Sep2026

​छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का सुदूर और रहस्यमयी इंद्रावती टाइगर रिजर्व चार दशकों के लंबे अंतराल के बाद पर्यटकों के लिए फिर से खुलने जा रहा है। 1 नवंबर से शुरू हो रही इस वन्यजीव पर्यटन व्यवस्था से इस अछूते जंगल के द्वार सैलानियों के लिए हमेशा के लिए खुल जाएंगे।

चार दशकों का इंतजार खत्म: इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पर्यटकों की होगी वापसी
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का सुदूर और रहस्यमयी इंद्रावती टाइगर रिजर्व चार दशकों के लंबे अंतराल के बाद पर्यटकों के लिए फिर से खुलने जा रहा है। 1 नवंबर से शुरू हो रही इस वन्यजीव पर्यटन व्यवस्था से इस अछूते जंगल के द्वार सैलानियों के लिए हमेशा के लिए खुल जाएंगे।
बस्तर के जंगलों में गूंजेगी पर्यटकों की चहलकदमी
छत्तीसगढ़ के बीहड़ और सबसे कम खोजे गए जंगलों में शुमार इंद्रावती टाइगर रिजर्व आखिरकार गुलजार होने को तैयार है। आगामी 1 नवंबर से इस रिजर्व को पर्यटकों के लिए अधिकृत तौर पर खोल दिया जाएगा। करीब चालीस साल बाद यह पहला मौका होगा जब इस इलाके में व्यवस्थित वन्यजीव पर्यटन की शुरुआत होगी, जिससे प्रकृति प्रेमियों और रोमांच के शौकीनों को एक नया और रोमांचक ठिकाना मिल सकेगा।
भौगोलिक स्थिति और अंतरराज्यीय सीमा
छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित यह टाइगर रिजर्व बेहद सामरिक और प्राकृतिक महत्व रखता है। इंद्रावती टाइगर रिजर्व, भैरमगढ़ और पामेड वन्यजीव अभयारण्यों के साथ मिलकर संपूर्ण इंद्रावती लैंडस्केप का निर्माण करता है। इस रिजर्व की उत्तर और पश्चिमी सीमा पर बहने वाली इंद्रावती नदी इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती है। यही नदी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के बीच अंतरराज्यीय सीमा का काम भी करती है। इसके अलावा, इसकी भौगोलिक कनेक्टिविटी तेलंगाना के कवल, महाराष्ट्र के ताडोबा और मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व से जुड़ी हुई है।
समृद्ध वन संपदा और दुर्लभ जीव-जंतु
यह रिजर्व अपनी अनूठी जैव विविधता के लिए देश भर में जाना जाता है। यहाँ की वनस्पति मुख्य रूप से दक्षिणी नम मिश्रित पर्णपाती और शुष्क पर्णपाती वनों में बंटी हुई है। जंगलों की इस छांव में सागौन, आचार, कर्रा, कुल्लू, शीशम, सेमल, हलदु, अर्जुन, बेल और जामुन जैसे बहुमूल्य पेड़-पौधे पाए जाते हैं।
जीव-जंतुओं की बात करें तो यह संरक्षित क्षेत्र छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु और अत्यंत दुर्लभ 'वाइल्ड बफेलो' (जंगली भैंसे) की अंतिम बची हुई आबादी का घर है। इसके अलावा, इस सघन जंगल में बाघ, तेंदुए, नीलगाय, ब्लैक बक, सांभर, गौर, चीतल और सुस्त भालू (स्लोथ बियर) जैसे वन्यजीव खुलेआम विचरण करते हैं। चार दशकों के बाद सैलानियों के लिए इसके दरवाजे खुलने से इस क्षेत्र में पर्यटन को एक अभूतपूर्व बढ़ावा मिलने की पूरी उम्मीद है।
आसमान को छूने की तैयारी: जिबूती ने थामी नासा की डोर, बना अंतरिक्ष क्लब का नया साथी

आसमान को छूने की तैयारी: जिबूती ने थामी नासा की डोर, बना अंतरिक्ष क्लब का नया साथी

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📅 19 Sep2026

जिबूती ने अंतरिक्ष की दुनिया में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 'आर्टेमिस अकॉर्ड्स' पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ ही वह इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला 72वां देश और आठवां अफ्रीकी राष्ट्र बन गया है। यह वाशिंगटन स्थित नासा मुख्यालय में आयोजित एक भव्य समारोह में संपन्न हुआ, जो इस छोटे से अफ्रीकी देश के लिए वैश्विक मंच पर एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।

आसमान को छूने की तैयारी: जिबूती ने थामी नासा की डोर, बना अंतरिक्ष क्लब का नया साथी
जिबूती ने अंतरिक्ष की दुनिया में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 'आर्टेमिस अकॉर्ड्स' पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ ही वह इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला 72वां देश और आठवां अफ्रीकी राष्ट्र बन गया है। यह वाशिंगटन स्थित नासा मुख्यालय में आयोजित एक भव्य समारोह में संपन्न हुआ, जो इस छोटे से अफ्रीकी देश के लिए वैश्विक मंच पर एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।
अंतरिक्ष की दौड़ में जिबूती की ऐतिहासिक छलांग
पूर्वी अफ्रीका के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश जिबूती ने अब अंतरिक्ष विज्ञान और अनुसंधान की ओर अपने कदम मजबूती से बढ़ा दिए हैं। नासा मुख्यालय में हुए इस समझौते ने जिबूती को वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर एक नई पहचान दिला दी है। दुनिया भर की महाशक्तियों के साथ अंतरिक्ष सहयोग के इस समझौते पर हस्ताक्षर करना यह दर्शाता है कि छोटे देश भी भविष्य की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अपनी अहम भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
जिबूती: रणनीतिक भूगोल और अनूठा भू-भाग
हॉर्न ऑफ अफ्रीका में स्थित जिबूती अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यह देश लाल सागर, अदन की खाड़ी और पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट सिस्टम के त्रिसंगम पर बसा है। उत्तर में इरिट्रिया, दक्षिण में सोमालिया तथा दक्षिण और पश्चिम में इथियोपिया से घिरे इस देश की पूर्वी सीमाएं लाल सागर और अदन की खाड़ी से मिलती हैं। इसकी राजधानी 'जिबूती' ही है, जो इस पूरे क्षेत्र का प्रमुख सामरिक केंद्र है।
कठोर जलवायु और प्राकृतिक खनिजों का भंडार
जिबूती की जलवायु मुख्य रूप से शुष्क और उष्णकटिबंधीय है, जहाँ साल भर उच्च तापमान और वाष्पीकरण की स्थिति बनी रहती है। देश का सबसे ऊंचा बिंदु माउंट मौसा अली है, जो लगभग 2,028 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहाँ का Danakil Depression अपने बंजर और कठोर परिदृश्य के लिए प्रसिद्ध है। इस देश में कोई बड़ी बारहमासी नदी नहीं है, लेकिन वर्षा ऋतु के दौरान मौसमी जलधाराएं या वाडी सक्रिय हो जाते हैं। इसके बावजूद, प्राकृतिक संसाधनों के मामले में यह क्षेत्र काफी समृद्ध है।
प्रचुर प्राकृतिक संपदा और भविष्य की संभावनाएं
जिबूती की भूमि कई महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों से भरी हुई है। यहाँ नमक, पेट्रोलियम, सोना, क्ले, संगमरमर, प्युमिक, जिप्सम और डायाटोमाइट जैसे मूल्यवान संसाधन प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं। अंतरिक्ष कूटनीति में अपनी नई पारी की शुरुआत करने के बाद, यह देश अब इन संसाधनों और अपनी सामरिक स्थिति के दम पर वैश्विक पटल पर एक नई इबारत लिखने की ओर अग्रसर है।
वसई किले के जेटी पर गणेश मूर्तियों के अपमान से आक्रोश

वसई किले के जेटी पर गणेश मूर्तियों के अपमान से आक्रोश

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📅 19 Sep2026

मुंबई के ऐतिहासिक वसई किले के पास एक कृत्रिम तालाब में विसर्जित गणेश मूर्तियों को जेटी के समीप फेंके जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस घटना से स्थानीय निवासियों में गहरा आक्रोश है। पंद्रहवीं सदी के इस प्राचीन किले का इतिहास पुर्तगाली और मराठा शासनकाल की गौरवशाली गाथाओं से जुड़ा है।

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वसई किले के जेटी पर गणेश मूर्तियों के अपमान से आक्रोश
खबर का निचोड़:
मुंबई के ऐतिहासिक वसई किले के पास एक कृत्रिम तालाब में विसर्जित गणेश मूर्तियों को जेटी के समीप फेंके जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस घटना से स्थानीय निवासियों में गहरा आक्रोश है। पंद्रहवीं सदी के इस प्राचीन किले का इतिहास पुर्तगाली और मराठा शासनकाल की गौरवशाली गाथाओं से जुड़ा है।
प्राचीन इतिहास और रणनीतिक महत्व
उत्तरी मुंबई के उपनगर वसई में स्थित वसई किला, जिसे बैसेइन फोर्ट के नाम से भी जाना जाता है, उल्हास नदी के संगम पर स्थित है। पंद्रहवीं शताब्दी में यह क्षेत्र जहाज निर्माण का प्रमुख केंद्र था। सोलहवीं सदी के तीसरे दशक में इस ऐतिहासिक दुर्ग का निर्माण हुआ था, जिसपर शुरुआती दौर में पुर्तगालियों ने कब्जा कर लिया था।
पुर्तगाली प्रभाव और मराठा विजय
पुर्तगालियों ने इस किले को एक समृद्ध शहर के रूप में तब्दील किया और इसके भीतर एक विशाल गढ़ का निर्माण कराया। 1739 ईस्वी तक यह किला पुर्तगालियों के नियंत्रण में रहा। इसके बाद मराठा सेनापति चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में मराठा सेना ने इस पर आक्रमण कर इसे अपने अधिकार में ले लिया। लंबे संघर्ष के बाद पहले आंग्ल-म मराठा युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने इस पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था।
भव्य वास्तुकला के अवशेष
लगभग 110 एकड़ में फैला यह किला अपनी बेहतरीन सामरिक बनावट के लिए जाना जाता है। इसके तीन तरफ समुद्र का पहरा है और जमीन की तरफ एक रणनीतिक खंदक बनाई गई है, जो इसे लगभग अभेद्य बनाती है। किले की दीवारें साढ़े चार किलोमीटर से अधिक लंबी हैं और इसमें ग्यारह ऊंचे बुर्ज बने हैं। इसके अंदर आज भी प्राचीन चर्चों के अवशेष, नक्काशीदार मेहराब और पुर्तगाली शैली के मुखौटे खड़े हैं, जो समय की मार झेलते हुए अपने सुनहरे अतीत की कहानी बयां करते हैं।
वर्तमान विवाद और नाराजगी
ऐतिहासिक धरोहर के रूप में प्रसिद्ध इस किले के पास हाल ही में कृत्रिम तालाब में विसर्जित की गई गणेश मूर्तियों को फेंके जाने से स्थानीय लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। इस घटना ने प्रशासन और स्थानीय व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे नागरिकों में भारी रोष व्याप्त है।
बोर्नियो से लेकर बोलीविया तक: सौ साल में पहली बार मिली बिल्ली की नई प्रजाति 'लियोपार्डस टिल्केयो'

बोर्नियो से लेकर बोलीविया तक: सौ साल में पहली बार मिली बिल्ली की नई प्रजाति 'लियोपार्डस टिल्केयो'

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📅 19 Sep2026

दक्षिण अमेरिका के घने और रहस्यमयी जंगलों से एक रोमांचक खबर सामने आई है। वैज्ञानिकों ने बोलीविया में बिल्ली की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसे 'लियोपार्डस टिल्केयो' (Leopardus Tilcayo) नाम दिया गया है। एक सदी से भी अधिक समय में इस क्षेत्र में मिली यह बिल्ली वन्यजीव प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी सौगात है।

बोर्नियो से लेकर बोलीविया तक: सौ साल में पहली बार मिली बिल्ली की नई प्रजाति 'लियोपार्डस टिल्केयो'
दक्षिण अमेरिका के घने और रहस्यमयी जंगलों से एक रोमांचक खबर सामने आई है। वैज्ञानिकों ने बोलीविया में बिल्ली की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसे 'लियोपार्डस टिल्केयो' (Leopardus Tilcayo) नाम दिया गया है। एक सदी से भी अधिक समय में इस क्षेत्र में मिली यह बिल्ली वन्यजीव प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी सौगात है।
नई खोज और टिल्केयो का रहस्य
दक्षिण अमेरिका के मूल निवासी 'लियोपार्डस' जीनस से ताल्लुक रखने वाली यह छोटी बिल्लियों की एक प्रजाति (टाइगर कैट) है। बोलीविया के हरे-भरे युंगास (Yungas) जंगलों में खोजी गई इस बिल्ली को स्थानीय समुदाय 'टिल्केयो' के नाम से पुकारते हैं। यह इलाका पहाड़ी और बादलों से घिरे होने के कारण अपनी उच्च आर्द्रता के लिए जाना जाता है, जो इस दुर्लभ जीव का प्राकृतिक घर है।
अनोखा आकार और खूबसूरत रूप-रंग
इस नई प्रजाति की शारीरिक बनावट बेहद अनोखी है। एक औसत घरेलू बिल्ली से भी आकार में छोटी यह बिल्ली करीब 18 इंच (46 सेंटीमीटर) लंबी होती है और इसका वजन महज 3 पाउंड (1.4 किलोग्राम) के आसपास होता है। इसके शरीर पर हल्के भूरे रंग की मुलायम फर होती है, जिस पर अनियमित आकार के खूबसूरत रोसेटे (धब्बे) बने हुए हैं, जो इसे एक अलग ही आकर्षण देते हैं।
जैव विविधता का खजाना: युंगास जंगल
जिस युंगास जंगल में इस नई प्रजाति को खोजा गया है, वह अपने आप में एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र है। इसे 'नुबोसेल्वा' या 'सेल्वा टुकुमानो-ओरानेंस' के नाम से भी जाना जाता है। एंडीज पर्वतमाला के पूर्वी छोर पर स्थित यह पहाड़ी जंगल वेनेजुएला से लेकर अर्जेंटीना तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र दुनिया भर के वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है।
समृद्ध जीव-जंतु और वनस्पतियां
युंगास जंगल की जैव विविधता अद्भुत है। इस अनोखे वन क्षेत्र में 200 से अधिक प्रकार के पेड़, 80 प्रजाति के फर्न और 100 से ज्यादा स्तनधारी जीव पाए जाते हैं। इसके अलावा, यहाँ 500 प्रकार के पक्षी और लगभग 30 प्रजातियों के मेंढक व टोड निवास करते हैं, जिनमें से कई जीव केवल इसी जंगल में पाए जाते हैं (स्थानिक हैं)। 'लियोपार्डस टिल्केयो' की खोज ने इस इलाके के पारिस्थितिकी महत्व को एक बार फिर दुनिया के सामने ला दिया है।

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