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राष्ट्रहित और वैश्विक कूटनीति का मर्म: आईसीडब्ल्यूए के 25 गौरवशाली वर्ष

राष्ट्रहित और वैश्विक कूटनीति का मर्म: आईसीडब्ल्यूए के 25 गौरवशाली वर्ष

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📅 18 Sep2026

देश की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के वैचारिक मंथन का प्रमुख केंद्र, भारतीय विश्व मामलों की परिषद (ICWA) ने अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। नई दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित सप्रू हाउस में आयोजित इस भव्य रजत जयंती समारोह में उपराष्ट्रपति ने शिरकत की। इस अवसर पर भारत के कूटनीतिक सफर और वैश्विक पटल पर देश की बढ़ती साख पर विस्तार से चर्चा की गई।

राष्ट्रहित और वैश्विक कूटनीति का मर्म: आईसीडब्ल्यूए के 25 गौरवशाली वर्ष
वैश्विक कूटनीति के केंद्र में भारत की मजबूत होती गूंज
देश की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के वैचारिक मंथन का प्रमुख केंद्र, भारतीय विश्व मामलों की परिषद (ICWA) ने अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। नई दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित सप्रू हाउस में आयोजित इस भव्य रजत जयंती समारोह में उपराष्ट्रपति ने शिरकत की। इस अवसर पर भारत के कूटनीतिक सफर और वैश्विक पटल पर देश की बढ़ती साख पर विस्तार से चर्चा की गई।
स्थापना का इतिहास और वैचारिक नींव
इस प्रतिष्ठित थिंक टैंक की जड़ें आजादी से पहले वर्ष 1943 में जुड़ी हैं। देश के कुछ दूरदर्शी विचारकों ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति पर एक स्वदेशी और स्वतंत्र भारतीय दृष्टिकोण तैयार करने का बीड़ा उठाया था। महान बुद्धिजीवी सर टी.बी. सप्रू और डॉ. एच.एन. कुंजरू के नेतृत्व में स्थापित यह संस्था शुरू से ही अकादमिक और रणनीतिक गहराई का प्रतीक रही है। शुरुआत में इसे वर्ष 1860 के सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम के तहत एक गैर-आधिकारिक, गैर-राजनीतिक और गैर-लाभकारी संगठन के रूप में पंजीकृत किया गया था।
राष्ट्रीय महत्व का संस्थान और उसकी स्वायत्तता
वक्त के साथ इस संस्था के बढ़ते प्रभाव और रणनीतिक योगदान को देखते हुए संसद ने वर्ष 2001 में एक विशेष अधिनियम पारित किया। इसके तहत इसे 'राष्ट्रीय महत्व के संस्थान' का दर्जा दिया गया। संस्था की संरचना की एक खास विशेषता यह है कि देश के उपराष्ट्रपति इसके पदेन (एक्स-ऑफिशियो) अध्यक्ष होते हैं। हालांकि इसे विदेश मंत्रालय द्वारा वित्तीय सहायता मिलती है, लेकिन कामकाज के स्तर पर यह पूरी तरह स्वतंत्र रहकर अपने अनुसंधान और विश्लेषण को अंजाम देती है।
विदेश मामलों का अनूठा अध्ययन केंद्र
सप्रू हाउस स्थित यह परिषद पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश मामलों के समर्पित अध्ययन के लिए जानी जाती है। आज जब दुनिया भू-राजनीतिक बदलावों के एक दौर से गुजर रही है, तब इस तरह के थिंक टैंक भारत को वैश्विक कूटनीति की हर चुनौती का सामना करने के लिए अकादमिक और सामरिक इनपुट प्रदान करते हैं। रजत जयंती का यह मुकाम इस बात का गवाह है कि भारत वैश्विक मंचों पर अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए एक जिम्मेदार और सशक्त शक्ति के रूप में लगातार आगे बढ़ रहा है।
डिफेंस टेक्नोलॉजी में भारत की छलांग: DRDO ने हासिल किया GaN MMIC महारत का मुकाम

डिफेंस टेक्नोलॉजी में भारत की छलांग: DRDO ने हासिल किया GaN MMIC महारत का मुकाम

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📅 18 Sep2026

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी DRDO ने भारत को रक्षा और अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में एक नया मुकाम दिला दिया है। भारत ने स्वदेशी गैलियम नाइट्राइड मोनोलिथिक माइक्रोवेव इंटीग्रेटेड सर्किट (GaN MMIC) टेक्नोलॉजी के सफल प्रदर्शन और कार्यान्वयन का ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया है। इस उपलब्धि के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा सात देशों के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है, जिनके पास यह अत्याधुनिक तकनीक है।

डिफेंस टेक्नोलॉजी में भारत की छलांग: DRDO ने हासिल किया GaN MMIC महारत का मुकाम
क्या है GaN MMIC टेक्नोलॉजी और क्यों है यह गेम-चेंजर?
रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी DRDO ने भारत को रक्षा और अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में एक नया मुकाम दिला दिया है। भारत ने स्वदेशी गैलियम नाइट्राइड मोनोलिथिक माइक्रोवेव इंटीग्रेटेड सर्किट (GaN MMIC) टेक्नोलॉजी के सफल प्रदर्शन और कार्यान्वयन का ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया है। इस उपलब्धि के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा सात देशों के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है, जिनके पास यह अत्याधुनिक तकनीक है। इस सूची में अब अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे दिग्गजों के साथ भारत का नाम भी शान से जुड़ गया है।
सुपर-पावरफुल चिप जो बदल देगी युद्ध की सूरत
यह तकनीक कोई आम तकनीक नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा बेहद छोटा और सुपर-पावरफुल कंप्यूटर चिप है, जो बिना पिघले अत्यंत उच्च-आवृत्ति वाले वायरलेस सिग्नलों को आसानी से संभाल सकता है। इसे एक विशेष रासायनिक सामग्री पर तैयार किया गया है। यह एक ऐसा ऑल-इन-वन चिप है, जिसमें ट्रांजिस्टर, रेसिस्टर और कैपेसिटर जैसे छोटे-छोटे हिस्सों को एक ही सामग्री पर समेटा गया है। इसका मुख्य काम अदृश्य वायरलेस यानी माइक्रोवेव तरंगों को नियंत्रित करना है। खास तौर पर इसे एक्स-बैंड (X-band) आवृत्ति रेंज तक के अनुप्रयोगों के लिए डिजाइन किया गया है।
सिलिकॉन से 300 गुना तेज और आकार में बेहद कॉम्पैक्ट
गैलियम नाइट्राइड (GaN) अपने असाधारण थर्मल और इलेक्ट्रिकल गुणों के लिए जाना जाता है। यही वजह है कि यह आधुनिक रक्षा प्रणालियों जैसे कि रडार, सेंसर, मिसाइल और उपग्रहों के लिए रीढ़ की हड्डी साबित हो रहा है। महज 3.5 गुणा 3 मिलीमीटर के आकार वाला यह स्वदेशी GaN चिप 30 वॉट तक की जबरदस्त पावर देने की क्षमता रखता है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह सिलिकॉन के मुकाबले 300 गुना तेज गति से काम करता है।
क्यों पड़ी इस क्रांतिकारी सेमीकंडक्टर की जरूरत?
आधुनिक युद्ध कौशल और अंतरिक्ष अभियानों में यह तकनीक गेम-चेंजर साबित होने जा रही है। GaN सेमीकंडक्टर अपनी उच्च ऊर्जा दक्षता, बेहतर थर्मल परफॉर्मेंस और शानदार पावर आउटपुट के लिए पूरी दुनिया में पहचाना जाता है। यह तकनीक रक्षा उपकरणों का आकार और वजन कम करने में मदद करती है, जिससे सैनिकों और हथियारों की गतिशीलता बढ़ती है। सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह अत्यधिक कठोर और प्रतिकूल वातावरण में भी बिना किसी रुकावट के पूरी विश्वसनीयता के साथ काम कर सकती है।
अरब सागर की गहराई में खोजी गई conger eel की नई प्रजाति

अरब सागर की गहराई में खोजी गई conger eel की नई प्रजाति

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📅 18 Sep2026

अरब सागर की अथाह गहराइयों में वैज्ञानिकों ने conger eel की एक बिल्कुल नई प्रजाति की खोज की है। केरल के तट पर लगभग 300 मीटर की गहराई से मिली इस अनोखी मछली का नाम 'Ariosoma cmfriense' रखा गया है, जो समुद्री रहस्यों से पर्दा उठाने की दिशा में एक बड़ी सफलता है।

अरब सागर की गहराई में खोजी गई conger eel की नई प्रजाति
अरब सागर की अथाह गहराइयों में वैज्ञानिकों ने conger eel की एक बिल्कुल नई प्रजाति की खोज की है। केरल के तट पर लगभग 300 मीटर की गहराई से मिली इस अनोखी मछली का नाम 'Ariosoma cmfriense' रखा गया है, जो समुद्री रहस्यों से पर्दा उठाने की दिशा में एक बड़ी सफलता है।
समुद्र की गहराई का अनोखा रहस्य
प्रकृति अपनी गोद में अनगिनत रहस्यों को समेटे हुए है और अरब सागर की गहराइयों ने एक बार फिर दुनिया को चौंका दिया है। वैज्ञानिकों के हाथ एक ऐसी सफलता लगी है जिसने मरीन बायोलॉजिकल रिसर्च में हलचल मचा दी है। केरल के कोल्लम तट के पास समुद्र के भीतर करीब 300 मीटर की गहराई में conger eel की एक नई प्रजाति को खोज निकाला गया है। इस दुर्लभ खोज ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि महासागरों के नीले आंचल में जीवन के कितने अनछुए और अद्भुत रूप छिपे हुए हैं।
वैज्ञानिक शोध और भारत का डीप ओशन मिशन
इस महत्वपूर्ण खोज के पीछे केंद्रीय समुद्री माछिकी अनुसंधान संस्थान यानी आईसीएआर-सीएमएफआरआई, कोच्चि के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत है। यह अभूतपूर्व सफलता पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत चलने वाले राष्ट्रीय कार्यक्रम, डीप ओशन मिशन के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में मिली है। वैज्ञानिक लगातार महासागरों की गहराइयों में जाकर उन अनसुने कोनों को खंगाल रहे हैं जो अब तक मानव दृष्टि से कोसों दूर थे। इस मिशन की बदौलत भारत समुद्री जैव विविधता के क्षेत्र में नए मील के पत्थर स्थापित कर रहा है।
इस नई मछली की अनूठी शारीरिक बनावट
अरिओसोमा सीएमफ्रिएन्स अपनी विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं के कारण अन्य प्रजातियों से काफी अलग नजर आती है। conger eels मूल रूप से एक शक्तिशाली मछली है जिसका शरीर सांप की तरह लंबा, एकदम चिकना और बिना स्केल का होता है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए विश्लेषण के मुताबिक, इस नई प्रजाति में कुल वर्टेब्रल यानी कशेरुकाओं की संख्या 135 है और इसमें 127 से 130 लेटरल-लाइन पोर्स पाए गए हैं। इसकी बनावट इतनी अनूठी है कि इसकी प्रीएनल लंबाई इसके कुल शरीर की लंबाई की लगभग आधी बैठती है।
पहचान के खास और दुर्लभ बिंदु
इस जीव को इसकी प्रजाति के अन्य जीवों से अलग करने वाले कई स्पष्ट लक्षण मौजूद हैं। इसके सिर पर दो सुप्राओर्बिटल पोर्स हैं और इसका पृष्ठीय पंख यानी डोर्सल फिन बिल्कुल पेक्टोरल फिन के आधार के आगे से ही शुरू होता है। इसके अलावा, इसकी सादी पेक्टोरल फिन, ऑपरकुलम के ऊपर एक गहरा धब्बा और लेटरल-लाइन के ठीक नीचे बारीक काले रंग के धब्बे इसे बेहद खास बनाते हैं। इन बारीक काले धब्बों की विशेषता इस प्रजाति से जुड़ी अन्य मछलियों में देखने को नहीं मिलती, जो इसे अपने आप में एक अलग पहचान देती है।
चीन का हरित चमत्कार: टिमटिमाते रेगिस्तान पर लगेगी हरी लगाम

चीन का हरित चमत्कार: टिमटिमाते रेगिस्तान पर लगेगी हरी लगाम

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📅 18 Sep2026

रेगिस्तान के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए चीन ने एक ऐतिहासिक मुहिम छेड़ दी है। दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सूखे रेगिस्तानों में शुमार टकला मकान के चारों ओर बड़े पैमाने पर पेड़ और वनस्पतियां लगाई जा रही हैं, ताकि रेत के टीलों के फैलाव को पूरी तरह थामा जा सके।

चीन का हरित चमत्कार: टिमटिमाते रेगिस्तान पर लगेगी हरी लगाम
रेगिस्तान के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए चीन ने एक ऐतिहासिक मुहिम छेड़ दी है। दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सूखे रेगिस्तानों में शुमार टकला मकान के चारों ओर बड़े पैमाने पर पेड़ और वनस्पतियां लगाई जा रही हैं, ताकि रेत के टीलों के फैलाव को पूरी तरह थामा जा सके।
रेगिस्तान का तांडव और भूगोल
उत्तर-पश्चिम चीन के शिनजियांग प्रांत में स्थित टकला मकान दुनिया के सबसे विशाल रेतीले रेगिस्तानों में से एक है। यह चीन के सबसे बड़े अंतर्देशीय बेसिन यानी तारिम बेसिन के ठीक बीचों-बीच स्थित है। पश्चिम से पूर्व तक यह करीब 960 किलोमीटर की लंबाई में फैला है, जबकि इसकी अधिकतम चौड़ाई लगभग 420 किलोमीटर और कुल क्षेत्रफल करीब 3,20,000 वर्ग किलोमीटर है।
यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शिफ्टिंग-सैंड रेगिस्तान है, जिसका 85 प्रतिशत हिस्सा केवल अर्धचंद्राकार रेत के टीलों से बना है। उत्तर में तिएन शान और दक्षिण में कुनलून जैसी विशाल पर्वत श्रृंखलाएं इस मरुस्थल की रखवाली करती नजर आती हैं। इसके पश्चिम में पामीर पर्वत और पूर्व में प्रसिद्ध गोबी रेगिस्तान स्थित है।
मौसम की मार और बदलती भौगोलिक चाल
इस इलाके की आबोहवा बेहद कठोर है, जो एक विशिष्ट महाद्वीपीय जलवायु का हिस्सा है। यहाँ चलने वाली तेज और खतरनाक हवाएं, नाममात्र की बारिश और दिन-रात के तापमान में भारी अंतर यहाँ के जनजीवन को कठिन बनाते हैं। पिछले एक हजार वर्षों में यहां की रेत की लगातार खिसकने वाली प्रवृत्ति के कारण यह रेगिस्तान दक्षिण की ओर करीब 100 किलोमीटर तक आगे बढ़ चुका है। इसके बावजूद, रेगिस्तान के भीतर छोटे-छोटे पर्वत समूह और इसके उत्तरी छोर से बहने वाली तारिम नदी इस इलाके के भूगोल को अनोखा बनाती हैं।
चीन की महात्वाकांक्षी हरी दीवार
टकला मकान की आक्रामक चाल को थामने के लिए पिछले कई दशकों से एक अनूठा अभियान चलाया जा रहा है। चीन सरकार और पर्यावरणविदों ने मिलकर इस रेगिस्तान के बंजर किनारों पर पेड़ों की एक मजबूत और हरी दीवार खड़ी करनी शुरू कर दी है। इस हरित आवरण का मुख्य उद्देश्य हवा के साथ उड़ने वाली रेत को रोकना और रेगिस्तानीकरण की रफ्तार पर ब्रेक लगाना है। रेतीले तूफानों के बीच उम्मीद की यह हरी किरण इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति के आक्रामक रूपों को भी मानवीय दृढ़ इच्छाशक्ति से संतुलित किया जा सकता है।
ओडिशा में शंख नदी में डूबीं तीन बच्चियां, मातम में बदला कर्मा पूजा का जश्न

ओडिशा में शंख नदी में डूबीं तीन बच्चियां, मातम में बदला कर्मा पूजा का जश्न

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📅 18 Sep2026

ओडिशा के एक गांव में कर्मा पूजा की खुशियां उस वक्त मातम में बदल गईं, जब शंख नदी में नहाने गईं तीन मासूम बच्चियों की डूबने से मौत हो गई। इस दर्दनाक हादसे ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा से गुजरने वाली यह ऐतिहासिक नदी अपनी खूबसूरती के साथ-साथ अपने भीतर कई भौगोलिक रहस्यों को समेटे हुए है।

ओडिशा में शंख नदी में डूबीं तीन बच्चियां, मातम में बदला कर्मा पूजा का जश्न
ओडिशा के एक गांव में कर्मा पूजा की खुशियां उस वक्त मातम में बदल गईं, जब शंख नदी में नहाने गईं तीन मासूम बच्चियों की डूबने से मौत हो गई। इस दर्दनाक हादसे ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा से गुजरने वाली यह ऐतिहासिक नदी अपनी खूबसूरती के साथ-साथ अपने भीतर कई भौगोलिक रहस्यों को समेटे हुए है।
शंख नदी का भूगोल और इसका सफर
झारखंड के गुमला जिले के लुपंगपत गांव से समुद्र तल से एक हजार मीटर की ऊंचाई से निकलने वाली शंख नदी का सफर बेहद दिलचस्प है। यह नदी अपनी लंबी यात्रा के दौरान कई राज्यों की सीमाओं को पार करती है। झारखंड से निकलकर यह छत्तीसगढ़ में प्रवेश करती है और फिर वापस झारखंड का रुख करती है। अंत में यह ओडिशा में दाखिल होती है और अपनी मंजिल की ओर बढ़ती है। करीब 240 किलोमीटर के कुल सफर में यह नदी कई इलाकों की जीवनरेखा बनती है। स्थानीय स्तर पर इसे 'शंकह नदी' के नाम से भी जाना जाता है।
ब्राह्मणी नदी प्रणाली का अहम हिस्सा
यह नदी देश की प्रमुख नदी प्रणालियों में एक अहम भूमिका निभाती है। ओडिशा में प्रवेश करने के बाद यह दक्षिण कोएल नदी से मिलती है। राउरकेला के पास वेदव्यास में दक्षिण कोएल और शंख नदी का यह ऐतिहासिक मिलन होता है। इन दोनों नदियों के संगम के बाद ही इसे आगे 'ब्राह्मणी नदी' के रूप में जाना जाता है। अपने इस सफर के दौरान यह नदी पूर्वी भारत के जल तंत्र को मजबूती प्रदान करती है।
सदनी फॉल्स की प्राकृतिक सुंदरता
शंख नदी के मार्ग में प्रकृति का एक बेहद अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। रांची पठार के किनारे पर करीब 60 मीटर की ऊंचाई से गिरने वाला 'सदनी फॉल्स' इस नदी का एक प्रमुख आकर्षण है। यह एक शानदार स्कार्प या निक-लाइन वॉटरफॉल है, जो पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। अपनी भौगोलिक विशेषताओं और झरनों के लिए यह नदी भूगोल प्रेमियों के बीच हमेशा से चर्चा का केंद्र रही है।

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