
बुध ग्रह का सिकुड़ता स्वरूप और अंतरिक्ष मिशन: यूपीएससी विश्लेषण
हालिया वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार बुध ग्रह का व्यास 23 किलोमीटर तक कम हो गया है। सौर मंडल का सबसे छोटा और सूर्य के निकटतम यह ग्रह अपने विशाल लोहे के कोर, अत्यधिक तापमान अंतर और विवर्तनिक गतिविधियों के कारण अंतरिक्ष अनुसंधान का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
बुध ग्रह का सिकुड़ता स्वरूप और अंतरिक्ष मिशन: यूपीएससी विश्लेषण
सारांश (Summary):
हालिया वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार बुध ग्रह का व्यास 23 किलोमीटर तक कम हो गया है। सौर मंडल का सबसे छोटा और सूर्य के निकटतम यह ग्रह अपने विशाल लोहे के कोर, अत्यधिक तापमान अंतर और विवर्तनिक गतिविधियों के कारण अंतरिक्ष अनुसंधान का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
बुध ग्रह के भौतिक लक्षण और विशेषताएं
बुध हमारे सौर मंडल का सबसे छोटा और सूर्य के सबसे नजदीक स्थित स्थलीय (रॉकी) ग्रह है। इसका व्यास 4879 किलोमीटर है और यह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का 38 प्रतिशत अनुभव करता है। सूर्य के अत्यधिक निकट होने के कारण इसके धरातल का तापमान दिन में 450 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जबकि रात्रि में यह गिरकर माइनस 180 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है। इसके बावजूद यह सबसे गर्म ग्रह नहीं है, क्योंकि शुक्र ग्रह अपने घने वायुमंडल के कारण सर्वाधिक औसत तापमान रखता है। बुध का विशाल लोहे-युक्त कोर इसके आंतरिक हिस्से का एक बड़ा हिस्सा घेरता है, और इसका घनत्व पृथ्वी के बाद सौर मंडल में दूसरा सबसे अधिक है।
विवर्तनिक गतिविधियां और सिकुड़ता आकार
नवीनतम वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह तथ्य सामने आया है कि बुध ग्रह वैज्ञानिकों के पूर्व अनुमान से अधिक सिकुड़ चुका है। ग्रह के भीतर शीतलन प्रक्रिया के चलते इसके व्यास में लगभग 23 किलोमीटर तक की कमी आ गई है। इसके प्राचीन, गड्ढों से भरे हुए धरातल पर पूर्व समय की ज्वालामुखी और विवर्तनिक गतिविधियों के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, इसके ध्रुवों पर ऐसे स्थायी रूप से छायांकित क्षेत्र हैं जहां सूर्य का प्रकाश कभी नहीं पहुंचता, जिससे वहां बर्फ के अस्तित्व की पुष्टि होती है।
अंतरिक्ष अन्वेषण और प्रमुख अभियान
बुध ग्रह की भूवैज्ञानिक बनावट और अंतरिक्ष के कठोर वातावरण का अध्ययन करने के लिए कई महत्वपूर्ण मिशन संचालित किए गए हैं। नासा का मैसेंजर अंतरिक्षयान वर्ष 2011 में इसकी कक्षा में प्रवेश करने वाला पहला अंतरिक्षयान बना था, जिसने 2015 तक इसका विस्तृत अध्ययन किया। इसके पश्चात, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और जापानी अंतरिक्ष एजेंसी का संयुक्त अभियान बेपि कोलम्बो इस ग्रह के अध्ययन के लिए कार्यरत है, जिसके इस वर्ष बुध की कक्षा में स्थापित होने की संभावना है।

मीनाक्षी सुंदरेश्वरर मंदिर महाकुंभभिषेकम और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण
मदुरै के ऐतिहासिक मीनाक्षी सुंदरेश्वरर मंदिर में महाकुंभभिषेकम के आयोजन से पहले यातायात और सुरक्षा प्रबंधन के तहत आसपास के सड़क विक्रेताओं को हटाए जाने से आजीविका का संकट उत्पन्न हो गया है। द्रविड़ वास्तुकला के इस उत्कृष्ट केंद्र का धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सारांश
मदुरै के ऐतिहासिक मीनाक्षी सुंदरेश्वरर मंदिर में महाकुंभभिषेकम के आयोजन से पहले यातायात और सुरक्षा प्रबंधन के तहत आसपास के सड़क विक्रेताओं को हटाए जाने से आजीविका का संकट उत्पन्न हो गया है। द्रविड़ वास्तुकला के इस उत्कृष्ट केंद्र का धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व
वैगई नदी के दक्षिणी तट पर स्थित मीनाक्षी सुंदरेश्वरर मंदिर की स्थापना प्रारंभिक ईसवी सन में पांड्य शासक कुलासेकर पांड्य द्वारा की गई थी। सातवीं शताब्दी के महान हिंदू संत तिरुज्ञानसंबांदर के भजनों में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। बारहवीं से तेरहवीं शताब्दी के दौरान इस्लामी आक्रमणों में इसे क्षति पहुँची थी, किंतु बाद में इसका जीर्णोद्धार किया गया। तिरुमलाई नायक (1623-55 ईस्वी) के शासनकाल में इस मंदिर का व्यापक विस्तार हुआ, जिससे इसका वर्तमान स्वरूप सामने आया। यह मंदिर शेव, शाक्त और वैष्णव संप्रदायों के अनूठे संगम का प्रतिनिधित्व करता है, जो भारतीय सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक है।
वास्तुकला और स्थापत्य विशेषताएँ
यह मंदिर परिसर द्रविड़ वास्तुकला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, जो 45 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है [किलेनुमा संरचना 254 गुणा 237 मीटर]। इस विशाल परिसर में 14 भव्य गोपुरम (ट्विन टावर) स्थित हैं। इसमें 1216-1238 के दौरान निर्मित पूर्वी गोपुरम सबसे प्राचीन है, जबकि 1559 में निर्मित दक्षिणी टावर 170 फीट से अधिक ऊँचाई वाला सबसे ऊँचा टावर है। मंदिर का पश्चिमी गोपुरम तमिलनाडु के राजकीय प्रतीक (स्टेट एम्ब्लेम) का आधार है। परिसर के भीतर स्थित हजार स्तंभों वाला मंडप (वास्तव में 985 नक्काशीदार स्तंभ) और संगीत के स्वर उत्पन्न करने वाले प्रसिद्ध संगीत स्तंभ इसकी तकनीकी और कलात्मक उत्कृष्टता को दर्शाते हैं।
प्रशासनिक चुनौतियाँ और आजीविका का संकट
महाकुंभभिषेकम समारोह के दौरान सुगम यातायात नियंत्रण और भारी भीड़ प्रबंधन के नाम पर मदुरै निगम द्वारा चिथirai गलियों से सैकड़ों स्ट्रीट वेंडर्स को हटाए जाने से गंभीर प्रशासनिक एवं सामाजिक बहस छिड़ गई है। त्योहारों के मुख्य सीजन में अचानक हुई इस कार्रवाई से विशेषकर महिला विक्रेताओं और दिहाड़ी कामगारों के समक्ष गंभीर आर्थिक संकट पैदा हो गया है। हालांकि स्थानीय प्रशासन इसे एक अस्थायी सुरक्षा उपाय बता रहा है, किंतु उचित पुनर्वास नीति के अभाव में शहरी आजीविका और सांस्कृतिक उत्सवों के पारंपरिक स्वरूप के बीच संतुलन बनाने की प्रशासनिक चुनौती पर पुनर्विचार की आवश्यकता स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई है।

लद्दाख में संकटग्रस्त त्सो कर झील के पुनरुद्धार हेतु महत्वाकांक्षी परियोजना आरंभ
लद्दाख प्रशासन द्वारा त्सो कर झील को संरक्षित करने के लिए रूपशो खरनक हिमनद धारा से प्रतिदिन 320 मिलियन लीटर हिमनद जल मोड़ने की परियोजना शुरू की गई है। पंद्रह हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित यह झील अपनी अनूठी जैव विविधता और रामसर आर्द्रभूमि स्थल के रूप में वैश्विक पारिस्थितिक महत्व रखती है।
सारांश
लद्दाख प्रशासन द्वारा त्सो कर झील को संरक्षित करने के लिए रूपशो खरनक हिमनद धारा से प्रतिदिन 320 मिलियन लीटर हिमनद जल मोड़ने की परियोजना शुरू की गई है। पंद्रह हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित यह झील अपनी अनूठी जैव विविधता और रामसर आर्द्रभूमि स्थल के रूप में वैश्विक पारिस्थितिक महत्व रखती है।
भौगोलिक एवं पारिस्थितिक अवस्थिति
त्सो कर झील लद्दाख की रूपशो घाटी में लगभग 15,280 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक उच्च तुंगता वाली खारी झील है। यह पैंगोंग त्सो और त्सो मोरिरी के साथ क्षेत्र की तीन प्रमुख झीलों में सबसे छोटी है। इसके किनारों पर जमे सफेद नमक के निक्षेपों के कारण इसे 'श्वेत झील' कहा जाता है। इस बेसिन में मुख्य त्सो कर के अलावा स्टार्टसापुक त्सो नामक एक ताजे पानी की झील भी शामिल है, जो मिलकर एक दुर्लभ आर्द्रभूमि तंत्र का निर्माण करती है। इस क्षेत्र में तापमान सर्दियों में शून्य से चालीस डिग्री सेल्सियस नीचे तक गिर जाता है, जबकि गर्मियों में तापमान तीस डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है।
जैव विविधता एवं वन्यजीव संरक्षण
यह क्षेत्र विभिन्न प्रकार के प्रवासी पक्षियों और दुर्लभ वन्यजीवों का प्रमुख प्राकृतिक आवास है। यहाँ मुख्य रूप से काले गर्दन वाले क्रेन (ब्लैक-नेक्ड क्रेन) अंडे देने के लिए आते हैं। इसके अलावा ब्राह्मणी बत्तख, बार-headed गीज़ और ग्रेट क्रेस्टेड ग्रेब जैसे पक्षी भी पाए जाते हैं। स्तनधारियों में जंगली गधे की सबसे बड़ी प्रजाति कियांग के साथ-साथ ibex, हिम तेंदुए और स्नो फॉक्स भी इस पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। स्थानीय खम्पा जनजाति के लोग झील के तटों से नमक एकत्र कर अपनी आजीविका चलाते हैं।
रामसर अभिसमय एवं संरक्षण महत्व
पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील इस क्षेत्र के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2020 में त्सो कर को रामसर कन्वेंशन के तहत 'अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि' घोषित किया गया था। जलवायु परिवर्तन और जल स्तर में आ रही लगातार कमी के कारण इस अद्वितीय झील के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा था, जिससे निपटने के लिए प्रशासन द्वारा जल डायवर्जन जैसी महत्वपूर्ण परियोजना को क्रियान्वित किया जा रहा है।

भारतीय नौसेना के गाइडेड मिसाइल पोत आईएनएस कुलिश की कंबोडिया यात्रा
भारतीय नौसेना के कोरा श्रेणी के गाइडेड मिसाइल पोत आईएनएस कुलिश ने पूर्वी बेड़े की ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट के तहत कंबोडिया के रीम नेवल बेस का दौरा किया है। यह सामरिक यात्रा भारत और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के बीच द्विपक्षीय समुद्री सहयोग और सुरक्षा साझेदारी को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सारांश
भारतीय नौसेना के कोरा श्रेणी के गाइडेड मिसाइल पोत आईएनएस कुलिश ने पूर्वी बेड़े की ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट के तहत कंबोडिया के रीम नेवल बेस का दौरा किया है। यह सामरिक यात्रा भारत और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के बीच द्विपक्षीय समुद्री सहयोग और सुरक्षा साझेदारी को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
आईएनएस कुलिश भारतीय नौसेना का एक प्रमुख कोरा श्रेणी का गाइडेड मिसाइल पोत है। संस्कृत भाषा में 'कुलिश' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'वज्र' होता है। इस पोत का निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) द्वारा पूर्णतः स्वदेशी तकनीक से किया गया था। इसे वर्ष 1995 से 2001 के बीच निर्मित किया गया और वर्ष 2001 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया।
तकनीकी विशेषताएं एवं मारक क्षमता
इस युद्धपोत की विस्थापन क्षमता लगभग 1,500 टन है। यह पोत ट्विन डीजल इंजनों द्वारा संचालित होता है, जो इसे 25 नॉट तक की अधिकतम गति प्रदान करते हैं। यह पोत बिना किसी रीप्लेनिशमेंट के 2,500 समुद्री मील की विस्तारित रेंज तक संचालन करने में सक्षम है। इसकी प्राथमिक मारक क्षमता रूसी मूल की ख-35 एंटी-शिप क्रूज मिसाइल है। इसके अतिरिक्त, यह आधुनिक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलों, लंबी दूरी की बंदूकों और आत्म-रक्षा के लिए सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से लैस है। इस पर चेतक हेलीकॉप्टर के संचालन की सुविधा भी उपलब्ध है, जो इसके सामरिक संचालन में लचीलेपन को बढ़ाती है।
रणनीतिक और सामरिक महत्व
पूर्वी बेड़े के हिस्से के रूप में इस पोत की कंबोडिया यात्रा भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा और विकास के दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। यह रणनीतिक तैनाती मित्र देशों के साथ समुद्री सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देने, अंतर-संचालन क्षमता विकसित करने और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आधुनिक सेंसर और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लैस यह पोत भारतीय नौसेना की तकनीकी आत्मनिर्भरता और समुद्री प्रभाव का प्रतीक है।

जलवायु-अनुकूल मोंठ बीन किस्में और शुष्क कृषि प्रणाली
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) ने मोंठ बीन की नई जलवायु-अनुकूल किस्में विकसित की हैं। ये किस्में अत्यधिक तापमान, परिवर्तनशील वर्षा और लंबे शुष्क दौर का सामना करने में सक्षम हैं, जो पश्चिमी भारत के मरुस्थलीय क्षेत्रों में खाद्य और पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करती हैं।
सारांश (Summary):
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) ने मोंठ बीन की नई जलवायु-अनुकूल किस्में विकसित की हैं। ये किस्में अत्यधिक तापमान, परिवर्तनशील वर्षा और लंबे शुष्क दौर का सामना करने में सक्षम हैं, जो पश्चिमी भारत के मरुस्थलीय क्षेत्रों में खाद्य और पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करती हैं।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान का नवाचार
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत आने वाले केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI), जोधपुर द्वारा मोंठ बीन की चार नई उन्नत किस्में—CAZRI Moth-4, CAZRI Moth-5, CAZRI Moth-6 और CAZRI Moth-7 विकसित की गई हैं। इन किस्मों को व्यापक शोध और आनुवंशिक सुधार कार्यक्रमों के माध्यम से तैयार किया गया है, जो विशेष रूप से अल नीनो वर्ष के दौरान उत्पन्न होने वाली गंभीर जल कमी और शुष्क परिस्थितियों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करती हैं।
मोंठ बीन की वानस्पतिक विशेषताएं और अनुकूलन
वैज्ञानिक रूप से 'विग्ना एकॉन्टिफोलिया' (Vigna aconitifolia) के रूप में जानी जाने वाली मोंठ बीन फैबेसी परिवार से संबंधित एक अत्यंत सहनशील दलहनी फसल है। यह मुख्य रूप से भारत के उत्तर-पश्चिमी शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों विशेषकर राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और महाराष्ट्र में उगाई जाती है। इस पौधे की गहरी पैठ बनाने वाली मूसला जड़ प्रणाली (Taproot system) इसे मिट्टी की निचली परतों से नमी प्राप्त करने में सहायता करती है। इसके अतिरिक्त, इनमें विकासात्मक सुनम्यता (Developmental plasticity) पाई जाती है, जिसके कारण यह पौधे उपलब्ध मृदा नमी के अनुसार अपनी वृद्धि और परिपक्वता को समायोजित कर लेते हैं।
जलवायु संबंधी आवश्यकताएं और कृषि-पारिस्थितिकी महत्व
यह फसल 24 से 32 डिग्री सेल्सियस के तापमान में सर्वोत्तम रूप से विकसित होती है, किंतु 45 डिग्री सेल्सियस तक के उच्च तापमान को भी सहन कर सकती है। यह 200 से 300 मिलीमीटर की न्यूनतम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी जीवित रहने की क्षमता रखती है। मोंठ बीन न केवल शुष्क क्षेत्रों के किसानों के लिए प्रोटीन युक्त दाल और उच्च गुणवत्ता वाला पशुचारा प्रदान करती है, बल्कि यह हरी खाद के रूप में मृदा की उर्वरता बढ़ाकर मरुस्थलीकरण को रोकने और रेत के टीलों को स्थिर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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