
नीति आयोग द्वारा ई-फास्ट इंडिया पहल और पीएक्ट का शुभारंभ
नीति आयोग ने 5वें ई-फास्ट इंडिया शिखर सम्मेलन 2026 में 'प्लेटफॉर्म फॉर एग्रीगेटिंग क्लीन ट्रांसपोर्ट' (PACT) का शुभारंभ किया। यह पहल मध्यम और भारी-ड्यूटी वाले इलेक्ट्रिक मालवाहक वाहनों को बढ़ावा देने, मांग को एकजुट करने और देश में शून्य-उत्सर्जन परिवहन के मार्ग को सुगम बनाने के लिए है।
नीति आयोग द्वारा ई-फास्ट इंडिया पहल और पीएक्ट का शुभारंभ
सारांश (Summary):
नीति आयोग ने 5वें ई-फास्ट इंडिया शिखर सम्मेलन 2026 में 'प्लेटफॉर्म फॉर एग्रीगेटिंग क्लीन ट्रांसपोर्ट' (PACT) का शुभारंभ किया। यह पहल मध्यम और भारी-ड्यूटी वाले इलेक्ट्रिक मालवाहक वाहनों को बढ़ावा देने, मांग को एकजुट करने और देश में शून्य-उत्सर्जन परिवहन के मार्ग को सुगम बनाने के लिए है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
ई-फास्ट इंडिया पहल की पृष्ठभूमि
ई-फास्ट इंडिया यानी इलेक्ट्रिक फ्रेट एक्सीलेटर फॉर सस्टेनेबल ट्रांसपोर्ट-इंडिया, नीति आयोग के नेतृत्व में स्थापित एक सरकारी-औद्योगिक मंच है। इसका मुख्य उद्देश्य देश में मध्यम और भारी-ड्यूटी वाले मालवाहक वाहनों को शून्य-उत्सर्जन वाले इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलना है। यह मंच सरकारी निकायों, मूल उपकरण निर्माताओं, रसद सेवा प्रदाताओं और चार्जिंग पॉइंट ऑपरेटरों को एक साझा मंच पर लाता है ताकि परिवहन क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सके।
पीएक्ट (PACT) की कार्यप्रणाली और उद्देश्य
हाल ही में आयोजित 5वें ई-फास्ट इंडिया शिखर सम्मेलन 2026 के दौरान नीति आयोग द्वारा 'प्लेटफॉर्म फॉर एग्रीगेटिंग क्लीन ट्रांसपोर्ट' (PACT) की शुरुआत की गई है। यह ई-फास्ट इंडिया का एक प्रमुख घटक है, जिसे शिपरों, रसद सेवा प्रदाताओं और अन्य हितधारकों की माल ढुलाई की मांग को एकत्रीकृत करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह मंच चिन्हित मालवाहक गलियारों में इलेक्ट्रिक वाहनों की तैनाती के अवसरों को बढ़ावा देता है। इसके माध्यम से मांग की दृश्यता में सुधार होता है, चार्जिंग बुनियादी ढांचे की योजना बनाने में सहायता मिलती है और इलेक्ट्रिक माध्यम व भारी-ड्यूटी वाहनों के लिए व्यावसायिक व्यवहार्यता मजबूत होती है।
बाजार की स्थिति और चुनौतियाँ
भारत के इलेक्ट्रिक फ्रेट बाजार में हाल के वर्षों में क्रमिक वृद्धि दर्ज की गई है। वित्तीय वर्ष 2025 से 2026 के दौरान ई-फ्रेट वाहनों की तैनाती में चार गुना से अधिक की वृद्धि हुई है, और वर्तमान में देश भर में तीन हजार से अधिक मध्यम व भारी-ड्यूटी इलेक्ट्रिक ट्रक संचालित हो रहे हैं। इसके बावजूद, उच्च वित्त पोषण लागत, बैटरी जीवन और रीसेल वैल्यू से जुड़ी अनिश्चितताएं इस क्षेत्र के विकास में मुख्य बाधाएं बनी हुई हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए नवीन वित्त पोषण मॉडल और गलियारा-आधारित चार्जिंग नेटवर्क का विकास अनिवार्य है।

डिजिटल आपदा प्रबंधन हेतु सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम का क्रियान्वयन
सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स (C-DoT) द्वारा विकसित सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम (CBS) एक स्वदेशी, जियो-टारगेटेड सार्वजनिक चेतावनी प्रणाली है। यह तकनीक आपदाओं के समय मोबाइल नेटवर्क पर भीड़भाड़ के बावजूद तात्कालिक, बहुभाषी और प्राथमिकता आधारित अलर्ट प्रसारित करने में सक्षम है, जो भारत की आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत बनाती है।
सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स (C-DoT) द्वारा विकसित सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम (CBS) एक स्वदेशी, जियो-टारगेटेड सार्वजनिक चेतावनी प्रणाली है। यह तकनीक आपदाओं के समय मोबाइल नेटवर्क पर भीड़भाड़ के बावजूद तात्कालिक, बहुभाषी और प्राथमिकता आधारित अलर्ट प्रसारित करने में सक्षम है, जो भारत की आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत बनाती है।
प्रौद्योगिकी और विकास पृष्ठभूमि
सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम दूरसंचार विभाग के अंतर्गत आने वाले सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और गृह मंत्रालय के सहयोग से विकसित एक स्वदेशी सार्वजनिक चेतावनी ढांचा है। यह प्रणाली अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ के मानकों के अनुरूप है और इसे राष्ट्रीय कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल आधारित 'सचेत' प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य पारंपरिक एसएमएस आधारित प्रणालियों की सीमाओं को दूर करना और देश के आपदा प्रबंधन को प्रतिक्रियात्मक से सक्रिय दृष्टिकोण में बदलना है।
मुख्य तकनीकी विशेषताएं
यह प्रणाली एक साथ किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र के सभी मोबाइल उपयोगकर्ताओं तक बिना किसी कतारबद्ध देरी के सूचना पहुंचाने की क्षमता रखती है। पारंपरिक टेक्स्ट संदेशों के विपरीत, यह व्यक्तिगत सेल टावरों या क्लस्टर स्तर पर सटीक जियो-टारगेटेड अलर्ट प्रसारित करती है। यह तकनीक 2G से लेकर 5G तक के सभी दूरसंचार नेटवर्क का समर्थन करती है और रोमिंग उपयोगकर्ताओं सहित लक्षित क्षेत्र के भीतर मौजूद सभी मोबाइल उपकरणों को कवर करती है। इसके संदेश नेटवर्क में अत्यधिक भीड़भाड़ होने की स्थिति में भी बिना किसी बाधा के सेकंडों में उपयोगकर्ताओं तक पहुंचते हैं।
कार्यप्रणाली और जन सुरक्षा प्रभाव
संकट के समय ये संदेश उच्च प्राथमिकता वाली अधिसूचनाओं के रूप में पॉप-अप विंडो में प्रदर्शित होते हैं, जिनके साथ विशिष्ट तीव्र स्वर और बहुभाषी पाठ होते हैं। यह तकनीक चक्रवात, सुनामी, भारी वर्षा, बाढ़ और औद्योगिक या रासायनिक दुर्घटना जैसी कम समय-सीमा वाली आपात स्थितियों के दौरान नागरिकों को समय पर सचेत करती है। इसके प्रभावी संचालन से आपातकालीन तैयारियों में सुधार होता है और आपदा के दौरान होने वाले जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करने में सहायता मिलती है।

हिंडन नदी: भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक महत्व और गंभीर प्रदूषण
यमुना की सहायक हिंडन नदी शिवालिक पहाड़ियों से निकलकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बहती है। यह हड़प्पा सभ्यता और 1857 के इतिहास से जुड़ी है। अनुपचारित कचरे के कारण अत्यधिक प्रदूषित होने के कारण सीपीसीबी ने इसे 'मृत नदी' घोषित किया है।
हिंडन नदी: भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक महत्व और गंभीर प्रदूषण
सारांश (Summary):
यमुना की सहायक हिंडन नदी शिवालिक पहाड़ियों से निकलकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बहती है। यह हड़प्पा सभ्यता और 1857 के इतिहास से जुड़ी है। अनुपचारित कचरे के कारण अत्यधिक प्रदूषित होने के कारण सीपीसीबी ने इसे 'मृत नदी' घोषित किया है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
भौगोलिक एवं जलशास्त्रीय विशेषताएँ
हिंडन नदी यमुना नदी प्रणाली की एक अत्यंत महत्वपूर्ण सहायक नदी है। इसका उद्गम उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के अंतर्गत शिवालिक पहाड़ियों से होता है, जहाँ इसकी उत्पत्ति समुद्र तल से लगभग 800 मीटर की ऊंचाई पर होती है। यह नदी हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सघन औद्योगिक बेल्ट से प्रवाहित होते हुए नोएडा के निकट यमुना नदी में मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 400 किलोमीटर है। यह पूरी तरह से मानसूनी वर्षा पर आधारित नदी है, जिसके कारण शुष्क महीनों में इसका जलस्तर कम हो जाता है, जबकि मानसून ऋतु में इसके प्रवाह में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जाती है। काली (पश्चिम) और कृष्णा नदियाँ इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।
ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हिंडन नदी का बेसिन अत्यंत समृद्ध रहा है। इसके तटों पर हुए पुरातात्विक उत्खनन में सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता के प्राचीन अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनके स्थल लगभग 2500 ईसा पूर्व तक पुराने हैं। इसके अतिरिक्त, वर्ष 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह नदी क्षेत्र भारतीय सैनिकों और ब्रिटिश सेना के बीच कई ऐतिहासिक संघर्षों और झड़पों का गवाह रहा है। इसमें बादली-की-सराय की लड़ाई भी शामिल है, और आज भी इस क्षेत्र में ब्रिटिश सैनिकों तथा अधिकारियों की कब्रें सुरक्षित हैं जो इस क्षेत्र के औपनिवेशिक इतिहास को दर्शाती हैं।
पर्यावरण संकट और प्रदूषण की स्थिति
वर्तमान में हिंडन नदी गंभीर पारिस्थितिकीय संकट का सामना कर रही है और यह गंगा नदी बेसिन के सबसे अधिक प्रदूषित जलमार्गों में से एक बन चुकी है। शहरी क्षेत्रों के घरेलू मल-जल, कृषि अपशिष्ट और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले जहरीले कचरे को बिना किसी पर्याप्त उपचार के सीधे नदी में गिराया जाता है। इस अनियंत्रित प्रदूषण के कारण वर्ष 2015 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने इसके प्रदूषण स्तर को इतना गंभीर पाया कि इसे आधिकारिक रूप से 'मृत नदी' घोषित कर दिया। नदी के अधिकांश खंड स्नान के लिए भी पूरी तरह से अनुपयुक्त हो चुके हैं।

मिंडोरो ब्लीडिंग-हार्ट कबूतर: दो दशकों बाद वन्यजीवों में पुनरुत्पत्ति
फिलीपींस के मिंडोरो द्वीप पर दो दशकों से अधिक समय तक लापता रहे दुर्लभ 'मिंडोरो ब्लीडिंग-हार्ट कबूतर' को कैमरे में दर्ज किया गया है। यह खोज इसकी प्रजाति के जीवित होने की पुष्टि करती है। आईयूसीएन रेड लिस्ट में गंभीर रूप से संकटग्रस्त इस ग्राउंड-ड्वेलिंग पक्षी का अस्तित्व आवास क्षरण और अवैध शिकार के कारण खतरे में है।
मिंडोरो ब्लीडिंग-हार्ट कबूतर: दो दशकों बाद वन्यजीवों में पुनरुत्पत्ति
सारांश (Summary):
फिलीपींस के मिंडोरो द्वीप पर दो दशकों से अधिक समय तक लापता रहे दुर्लभ 'मिंडोरो ब्लीडिंग-हार्ट कबूतर' को कैमरे में दर्ज किया गया है। यह खोज इसकी प्रजाति के जीवित होने की पुष्टि करती है। आईयूसीएन रेड लिस्ट में गंभीर रूप से संकटग्रस्त इस ग्राउंड-ड्वेलिंग पक्षी का अस्तित्व आवास क्षरण और अवैध शिकार के कारण खतरे में है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
परिचय एवं भौतिक विशेषताएं
मिंडोरो ब्लीडिंग-हार्ट कबूतर फिलीपींस के मिंडोरो द्वीप की एक स्थानीय (एंडेमिक) और जमीन पर रहने वाली पक्षी प्रजाति है। यह 'ब्लड-हार्ट' कबूतरों की सात ज्ञात प्रजातियों में से एक है, जिनमें से पाँच फिलीपींस में पाई जाती हैं। इसकी लंबाई लगभग 30 सेंटीमीटर होती है। इसके सफेद सीने पर एक विशिष्ट नारंगी-लाल रंग का धब्बा होता है, जो ऐसा प्रतीत होता है जैसे खुला हुआ खून बहता हुआ घाव हो। इसके सिर और गर्दन पर इंद्रधनुषी हरे रंग के पंख होते हैं, जो इसे अन्य प्रजातियों से अलग पहचान देते हैं। नर और मादा दोनों दिखने में लगभग एक जैसे होते हैं।
हालिया खोज और भौगोलिक स्थिति
यह प्रजाति पिछले दो दशकों से अधिक समय से वैज्ञानिक रूप से दर्ज नहीं की गई थी, जिसके कारण इसे 'लॉस्ट बर्ड्स' की सूची में शामिल किया गया था। पुर्तो गजेरा वर्षावन क्षेत्र में स्थानीय स्वदेशी समुदायों के सहयोग से स्थापित कैमरा ट्रैप के माध्यम से इसकी पहली आधिकारिक तस्वीर प्राप्त हुई है। यह पक्षी पारंपरिक रूप से तराई वाले वनों (400 से 800 मीटर की ऊंचाई) में पाया जाता है, लेकिन इसका हालिया रिकॉर्ड 900 मीटर से अधिक ऊंचाई पर दर्ज किया गया है, जो इसके सिमटते हुए निचले आवासों की ओर संकेत करता है।
संरक्षण स्थिति एवं प्रमुख खतरे
अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में इस प्रजाति को 'गंभीर रूप से संकटग्रस्त' (Critically Endangered) श्रेणी में रखा गया है। इस दुर्लभ पक्षी के अस्तित्व के समक्ष सबसे बड़ी बाधा मानव जनित गतिविधियां हैं। वनों की कटाई, झूम खेती (slash-and-burn agriculture), कृषि प्रसार, रट्टन (बेंत) की कटाई और संगमरमर उत्खनन के कारण इसका प्राकृतिक आवास तेजी से नष्ट हो रहा है। इसके अलावा, अन्य वन्यजीवों के शिकार के लिए लगाए गए फंदे और स्नारे इस ग्राउंड-ड्वेलिंग पक्षी की मृत्यु का प्रमुख कारण बनते हैं।

बरकुर में दुर्लभ सिदिताले वीरगाथा पत्थर और ऐतिहासिक महत्व
कर्नाटक के उडुपी जिले में सीता नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक बंदरगाह शहर बरकुर के पंचलिंगेश्वर मंदिर में एक दुर्लभ सिदिताले वीरगाथा पत्थर की खोज की गई है। यह प्राचीन नगर अलुपा, होयसाल और विजयनगर जैसे प्रमुख राजवंशों के अधीन वाणिज्यिक और राजनीतिक केंद्र रहा है।
कर्नाटक के उडुपी जिले में सीता नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक बंदरगाह शहर बरकुर के पंचलिंगेश्वर मंदिर में एक दुर्लभ सिदिताले वीरगाथा पत्थर की खोज की गई है। यह प्राचीन नगर अलुपा, होयसाल और विजयनगर जैसे प्रमुख राजवंशों के अधीन वाणिज्यिक और राजनीतिक केंद्र रहा है।
भौगोलिक स्थिति और प्राचीन इतिहास
बरकुर, जिसे प्राचीन काल में वराकुल, बरकनूर और बरहकन्यापुर के नाम से जाना जाता था, कर्नाटक के उडुपी जिले में सीता नदी के तट पर स्थित एक प्राचीन बंदरगाह शहर है। यह स्थान अरब सागर तट से लगभग पाँच किलोमीटर पूर्व में स्थित है। यह क्षेत्र दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से ही एक व्यस्त वाणिज्यिक केंद्र रहा है, जहां हाल ही में मेगालिथ और मेसोलिथ युग के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं। इस समुद्री बंदरगाह ने विदेशी राष्ट्रों के साथ बड़े पैमाने पर आर्थिक समृद्धि के साथ व्यापार किया था।
राजनीतिक और राजवंशों का प्रभाव
अलुपा शासकों ने इस वाणिज्यिक केंद्र को 10वीं से 11वीं शताब्दी के दौरान अपनी राजधानी बनाकर एक प्रमुख राजनीतिक केंद्र में परिवर्तित कर दिया, जिससे तुलुवा संस्कृति का अभूतपूर्व विकास हुआ। इसके उपरांत, यह शहर होयसाल साम्राज्य और बाद में विजयनगर साम्राज्य का प्रांतीय मुख्यालय बना। विजयनगर काल के दौरान शहर का विस्तार एक नवीन किले के निर्माण के साथ किया गया। इसके इतिहास में केलदी नायकों, मैसूर के हैदर अली और टीपू सुल्तान तथा ब्रिटिश शासन का कालखंड भी शामिल है।
स्थापत्य कला और हालिया पुरातात्विक खोज
यह नगर अपनी अनूठी बसावट के लिए प्रसिद्ध था, जिसमें पेशेवर निवासियों के नाम पर दस विस्तार थे और प्रत्येक के पास एक टैंक व कई मंदिर हुआ करते थे। एक समय में यहां 365 मंदिरों का एक नेटवर्क था। दक्षिण छोर पर स्थित पंचलिंगेश्वर मंदिर यहां का सर्वाधिक प्रतिष्ठित मंदिर है। वर्तमान में इसी मंदिर के एक एपिग्राफिकल सर्वेक्षण के दौरान एक ऐतिहासिक 'सिदिताले' वीरगाथा पत्थर की खोज की गई है, जो इस क्षेत्र के समृद्ध पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है।
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