
सेबियों का आईटी रेजिलिएंसी इंडेक्स: वित्तीय बाजार अवसंरचना हेतु एक नया मानक *
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा शुरू किया गया आईटी रेजिलिएंसी इंडेक्स (ITRI) बाजार अवसंरचना संस्थानों (MIIs) के लिए एक मात्रात्मक तकनीक स्वास्थ्य स्कोरकार्ड है। यह सूचकांक तकनीकी बुनियादी ढांचे की मजबूती, सुरक्षा और परिचालन स्थिरता का मूल्यांकन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा शुरू किया गया आईटी रेजिलिएंसी इंडेक्स (ITRI) बाजार अवसंरचना संस्थानों (MIIs) के लिए एक मात्रात्मक तकनीक स्वास्थ्य स्कोरकार्ड है। यह सूचकांक तकनीकी बुनियादी ढांचे की मजबूती, सुरक्षा और परिचालन स्थिरता का मूल्यांकन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने बाजार अवसंरचना संस्थानों (MIIs) के तकनीकी जोखिमों को कम करने और उनकी प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ाने के उद्देश्य से आईटी रेजिलिएंसी इंडेक्स (ITRI) की शुरुआत की है। स्टॉक एक्सचेंज, समाशोधन निगम और डिपॉजिटरी जैसे संस्थान वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जिनमें किसी भी प्रकार की तकनीकी बाधा संपूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। इस सूचकांक का मुख्य उद्देश्य इन संस्थानों की आईटी क्षमताओं का पारदर्शी और मानकीकृत मूल्यांकन करना है।
कार्यप्रणाली और मूल्यांकन के आधार
यह सूचकांक विभिन्न संकेतकों के माध्यम से तकनीकी स्वास्थ्य की गणना करता है। इसमें मुख्य रूप से सिस्टम अपटाइम, आपदा पुनर्प्राप्ति (डिजास्टर रिकवरी) की तैयारी, साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल, घटना प्रतिक्रिया समय और बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण को शामिल किया जाता है। इसके तहत प्रत्येक संस्थान को उसके प्रदर्शन के आधार पर एक निश्चित स्कोर प्रदान किया जाता है, जिससे नियामक संस्था को उनकी तकनीकी कमजोरियों की पहचान करने में सहायता मिलती है।
महत्व और संभावित प्रभाव
इस स्कोरकार्ड के लागू होने से बाजार अवसंरचना संस्थानों में सुशासन और उत्तरदायित्व में वृद्धि होगी। यह निवेशकों के विश्वास को मजबूत करता है क्योंकि यह उच्च स्तर की तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है। साथ ही, यह नियामकों को किसी भी संभावित तकनीकी खतरे या साइबर हमले से निपटने के लिए पूर्व-चेतावनी प्रणाली के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाता है, जिससे वित्तीय बाजारों की स्थिरता दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित रहती है।

असम के ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्र में दुर्लभ वॉटरस्पाउट का भौगोलिक महत्व
असम के बारपेटा जिले में ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपर एक दुर्लभ वॉटरस्पाउट (जल-स्तंभ) देखा गया। यह मौसमी परिघटना मुख्य रूप से तीव्र संवहनीय गतिविधियों और क्युनिमोनिम्बस बादलों के विकास के कारण उत्पन्न होती है, जो जल निकायों के ऊपर चक्रवातीय भंवर के रूप में प्रकट होती है।
सारांश (Summary): असम के बारपेटा जिले में ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपर एक दुर्लभ वॉटरस्पाउट (जल-स्तंभ) देखा गया। यह मौसमी परिघटना मुख्य रूप से तीव्र संवहनीय गतिविधियों और क्युनिमोनिम्बस बादलों के विकास के कारण उत्पन्न होती है, जो जल निकायों के ऊपर चक्रवातीय भंवर के रूप में प्रकट होती है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
वॉटरस्पाउट की परिभाषा और प्रकार
वॉटरस्पाउट एक तीव्र घूर्णन वाला वायु स्तंभ होता है जो किसी जल निकाय के ऊपर विकसित होता है। यह क्युनिमोनिम्बस बादलों के आधार से नीचे की ओर बढ़ता है। इसे मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: टर्नेडिक वॉटरस्पाउट और फेयर-वेदर वॉटरस्पाउट। टर्नेडिक वॉटरस्पाउट भूमि पर उत्पन्न होने वाले बवंडर (Tornadoes) के समान होते हैं और अधिक खतरनाक होते हैं। वहीं, फेयर-वेदर वॉटरस्पाउट आमतौर पर शांत मौसम में जल सतह पर कम तीव्रता के साथ बनते हैं और तटीय क्षेत्रों या बड़ी नदियों के ऊपर अधिक सामान्य होते हैं।
भौगोलिक और मौसमी कारण
इस प्रकार की मौसमी परिघटना के लिए उच्च तापमान, उच्च आर्द्रता और वायुमंडल में तीव्र अस्थिरता आवश्यक होती है। ब्रह्मपुत्र नदी घाटी की भौगोलिक स्थिति, स्थानीय स्थलाकृति और मानसूनी सत्र के दौरान नमी की प्रचुर मात्रा इस तरह के वायुमंडलीय भंवरों के निर्माण के अनुकूल परिस्थितियां प्रदान करती हैं। जब ठंडी हवा गर्म और नम हवा के संपर्क में आती है, तो संवहन प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे घूर्णन गति उत्पन्न होती है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
संघ लोक सेवा आयोग और राज्य सिविल सेवा परीक्षाओं के भूगोल पाठ्यक्रम में जलवायु विज्ञान (Climatology) और वायुमंडलीय आपदाओं के अंतर्गत ऐसे विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस तरह की प्राकृतिक परिघटनाएं प्रत्यक्ष रूप से चक्रवात निर्माण, बादलों के प्रकार, और सूक्ष्म जलवायु परिवर्तन से जुड़ी होती हैं। सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में इन अवधारणाओं से जुड़े कथन आधारित प्रश्न पूछे जा सकते हैं, जबकि मुख्य परीक्षा में यह भौगोलिक घटनाओं के विश्लेषण के लिए प्रासंगिक है।

ग्रामीण विकास हेतु 'मिशन समृद्ध गाँव' का हुआ शुभारंभ
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा आरंभ 'मिशन समृद्ध गाँव' का उद्देश्य ग्रामीण भारत में सर्वांगीण विकास, बुनियादी ढांचे का सुदृढ़ीकरण और आजीविका के अवसरों में वृद्धि करना है। मध्य प्रदेश के दो ब्लॉकों से इसके पायलट चरण की शुरुआत की गई है, जो भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्धारण का आधार बनेगा।
सारांश (Summary):
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा आरंभ 'मिशन समृद्ध गाँव' का उद्देश्य ग्रामीण भारत में सर्वांगीण विकास, बुनियादी ढांचे का सुदृढ़ीकरण और आजीविका के अवसरों में वृद्धि करना है। मध्य प्रदेश के दो ब्लॉकों से इसके पायलट चरण की शुरुआत की गई है, जो भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्धारण का आधार बनेगा।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री द्वारा नई दिल्ली स्थित कृषि भवन से 'मिशन समृद्ध गाँव' का औपचारिक शुभारंभ किया गया है। इस महत्वाकांक्षी पहल का मुख्य ध्येय ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक विकास योजनाओं से परे जाकर एक एकीकृत और लक्षित दृष्टिकोण अपनाना है। इसके माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के साथ-साथ शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और जन-भागीदारी को सुनिश्चित किया जाना है।
पायलट चरण का क्रियान्वयन
इस योजना के प्रारंभिक पायलट चरण के तहत मध्य प्रदेश राज्य के दो चुनिंदा ब्लॉकों का चयन किया गया है। इन क्षेत्रों में प्रशासनिक अभिसरण (कन्वर्जेंस) के माध्यम से विभिन्न केंद्रीय और राज्यीय योजनाओं को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा। इन दोनों ब्लॉकों के अनुभवों और परिणामों का विस्तृत मूल्यांकन करके इस मॉडल को देश के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तारित करने की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
प्रमुख उद्देश्य एवं आयाम
इस मिशन के प्राथमिक आयामों में ग्रामीण बुनियादी ढांचे का विकास, डिजिटल साक्षरता, कौशल विकास और कृषि तथा गैर-कृषि आधारित आजीविका के साधनों का सृजन शामिल है। इसका उद्देश्य पलायन को रोकना और ग्रामीण युवाओं को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है। इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता जैसी बुनियादी सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करना भी इस योजना की प्राथमिकता है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्व
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 (शासन व्यवस्था, सामाजिक न्याय) और प्रश्नपत्र-3 (भारतीय अर्थव्यवस्था, ग्रामीण विकास) के दृष्टिकोण से यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पहल सहकारी संघवाद, समावेशी विकास और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ग्रामीण क्षेत्रों में नीतिगत प्रभावशीलता और प्रशासन के विकेंद्रीकरण के लिहाज से इस मॉडल का अध्ययन प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों के लिए आवश्यक है।

कार्बोोसल्फान कीटनाशक पर प्रतिबंध
कृषि मंत्रालय ने मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर इसके गंभीर दुष्प्रभावों के मद्देनजर 'कीटनाशक अधिनियम, 1968' के तहत विशेषज्ञ सिफारिशों के आधार पर कार्बोोसल्फान पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया है। यह कदम रासायनिक कृषि आदानों के विनिमय और खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सारांश
कृषि मंत्रालय ने मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर इसके गंभीर दुष्प्रभावों के मद्देनजर 'कीटनाशक अधिनियम, 1968' के तहत विशेषज्ञ सिफारिशों के आधार पर कार्बोोसल्फान पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया है। यह कदम रासायनिक कृषि आदानों के विनिमय और खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कार्बोोसल्फान: परिचय और उपयोगिता
कार्बोोसल्फान एक व्यापक स्पेक्ट्रम वाला कार्बोमैट कीटनाशक है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से कपास, धान, गन्ना और फल-सब्जियों जैसी प्रमुख फसलों में कीट नियंत्रण के लिए किया जाता है। यह कीटों के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर उन्हें नष्ट करता है। कृषि क्षेत्र में इसकी उच्च प्रभावकारिता के कारण इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता रहा है।
प्रतिबंध के प्रमुख कारण और खतरे
यह रसायन अत्यधिक विषैला होता है और इसके अवशेष खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करते हैं। इसके संपर्क में आने से तंत्रिका तंत्र संबंधी विकार, हार्मोनल असंतुलन और दीर्घकालिक बीमारियां होने का खतरा रहता है। इसके अलावा, यह जल स्रोतों को दूषित करता है और परागणकर्ता कीटों (जैसे मधुमक्खियां) तथा पक्षियों के लिए गंभीर संकट पैदा करता है, जिससे जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचता है।
वैधानिक और नीतिगत पृष्ठभूमि
कीटनाशक अधिनियम, 1968 के प्रावधानों के तहत कृषि मंत्रालय समय-समय पर खतरनाक रसायनों की समीक्षा करता है। इसी प्रक्रिया के तहत गठित विशेषज्ञ समितियों ने कार्बोोसल्फान के खतरों की पुष्टि की है। इस प्रतिबंध का प्रस्ताव पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा प्रशासनिक कदम है।

भारतीय नौसेना की सामर्थ्य बढ़ाएगा दूसरा स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट पोत 'निपुण'
भारतीय नौसेना की मारक क्षमता और सामरिक सुदृढ़ता को बढ़ाते हुए, विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा निर्मित दूसरे स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट पोत 'निपुण' को शामिल किया गया है। निस्तार-श्रेणी का यह उन्नत पोत गहरे समुद्र में गोताखोरी अभियानों, पनडुब्बी बचाव कार्यों और सामरिक अभियानों को संचालित करने में सक्षम है।
सारांश: भारतीय नौसेना की मारक क्षमता और सामरिक सुदृढ़ता को बढ़ाते हुए, विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा निर्मित दूसरे स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट पोत 'निपुण' को शामिल किया गया है। निस्तार-श्रेणी का यह उन्नत पोत गहरे समुद्र में गोताखोरी अभियानों, पनडुब्बी बचाव कार्यों और सामरिक अभियानों को संचालित करने में सक्षम है।
विशाखापत्तनम में निर्माण और रणनीतिक महत्ता
हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (HSL) द्वारा स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित 'निपुण' पोत आत्मनिर्भर भारत अभियान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह पोत भारतीय नौसेना की उस दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है, जिसके तहत गहरे समुद्र में पनडुब्बी बचाव और नौसैनिक साजो-सामान की मरम्मत से जुड़ी क्षमताओं को अभेद्य बनाया जा रहा है। इसका रणनीतिक महत्व इस बात में निहित है कि यह हिंद महासागर क्षेत्र में किसी भी आपातकालीन स्थिति में तुरंत राहत और बचाव कार्य संचालित कर सकता है।
तकनीकी विशेषताएं और गोताखोरी क्षमता
निस्तार-श्रेणी के इस दूसरे पोत में अत्याधुनिक डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (DSRV) प्रणालियों को जोड़ने की क्षमता है, जो गहरे समुद्र में फंसे पनडुब्बी कर्मियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए अत्यधिक उपयोगी मानी जाती हैं। इसमें विशेष डाइविंग टूल्स, सैचुरेशन डाइविंग सिस्टम और भारी क्रेनें लगी हैं जो समुद्र की अथाह गहराइयों में जटिल अभियानों को सुगम बनाती हैं। इसके अलावा, पोत का नेविगेशन और संचार तंत्र आधुनिक डिजिटल मानकों पर आधारित है।
हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा सुदृढ़ीकरण
यह पोत भारत की 'मैरीटाइम सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन' (SAGAR) की परिकल्पना को धरातल पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हिंद महासागर में बढ़ती भू-राजनीतिक गतिविधियों और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच, इस तरह के स्वदेशी पोतों की तैनाती से भारतीय नौसेना की नीली जल शक्ति (Blue Water Navy) को नया आयाम मिलेगा। यह पोत न केवल युद्धक तैयारियों को धार देगा, बल्कि समुद्र आधारित आपदा प्रबंधन में भी अग्रणी भूमिका निभाएगा।
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