
CAG रिपोर्ट: ग्रीन इंडिया मिशन में भारी विफलताओं का खुलासा
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल मिशन फॉर ए ग्रीन इंडिया (GIM) में वन आवरण विस्तार लक्ष्य का लगभग 98 प्रतिशत shortfall दर्ज किया गया है। वर्ष 2015-16 से 2024-25 के दौरान वित्त पोषण की कमी, कुप्रबंधन और लचर प्रशासनिक निगरानी के कारण यह राष्ट्रीय महत्व की महत्वाकांक्षी योजना गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
CAG रिपोर्ट: ग्रीन इंडिया मिशन में भारी विफलताओं का खुलासा
सारांश (Summary)
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल मिशन फॉर ए ग्रीन इंडिया (GIM) में वन आवरण विस्तार लक्ष्य का लगभग 98 प्रतिशत shortfall दर्ज किया गया है। वर्ष 2015-16 से 2024-25 के दौरान वित्त पोषण की कमी, कुप्रबंधन और लचर प्रशासनिक निगरानी के कारण यह राष्ट्रीय महत्व की महत्वाकांक्षी योजना गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis)
राष्ट्रीय हरित भारत मिशन का परिचय
राष्ट्रीय एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज (NAPCC) के तहत शुरू किया गया नेशनल मिशन फॉर ए ग्रीन इंडिया (GIM) भारत के वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने का एक प्रमुख केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम है। इसका मुख्य उद्देश्य देश में घटते वन क्षेत्र को पुनर्जीवित करना और पारिस्थितिक संतुलन स्थापित करना था।
निष्पादन में भारी विसंगतियां और शार्टफॉल
CAG द्वारा हाल ही में प्रस्तुत किए गए परफॉर्मेंस ऑडिट के अनुसार, समीक्षाधीन अवधि (2015-16 से 2024-25) के दौरान मिशन अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में बुरी तरह विफल रहा है। इस समयावधि में वन-आवरण विस्तार के तय लक्ष्यों में लगभग 98 प्रतिशत की भारी कमी पाई गई, जो सरकारी स्तर पर नीतिगत क्रियान्वयन की विफलता को उजागर करती है।
वित्तीय कुप्रबंधन और धन का उपयोग
ऑडिट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि आवंटित फंड का समय पर और उचित उपयोग नहीं किया गया। राज्यों को मिलने वाले वित्तीय संसाधनों में देरी, बजट कटौती और फंड का डायवर्जन इस विफलता के मुख्य कारण रहे। वित्तीय वर्ष के अंत में भारी मात्रा में धन का अप्रयुक्त रहना प्रशासनिक अकुशलता को दर्शाता है।
निगरानी और समन्वय का अभाव
केन्द्र और राज्य स्तर की एजेंसियों के बीच आपसी समन्वय की भारी कमी देखी गई है। जमीनी स्तर पर वनीकरण कार्यों के मूल्यांकन के लिए कोई मजबूत और पारदर्शी मैकेनिज्म मौजूद नहीं था। जिला और स्थानीय स्तर पर वन समितियों की निष्क्रियता के कारण पौधे लगाने के बाद उनके रख-रखाव पर कोई ध्यान नहीं दिया गया, जिससे रोपे गए पौधों का जीवित रहना सुनिश्चित नहीं हो सका।

कावेरी बेसिन प्रबंधन हेतु एकीकृत नदी बोर्ड का गठन आवश्यक
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के अध्यक्ष सौमित्र कुमार Haldar द्वारा सम्पूर्ण कावेरी बेसिन के जलाशयों के स्वामित्व, संचालन और विनियमन के लिए एक एकीकृत 'रिवर बोर्ड' के गठन की वकालत की गई है। इस पहल का उद्देश्य अंतर-राज्यीय जल विवादों का स्थायी समाधान और जल संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करना है।
सारांश (Summary): कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के अध्यक्ष सौमित्र कुमार Haldar द्वारा सम्पूर्ण कावेरी बेसिन के जलाशयों के स्वामित्व, संचालन और विनियमन के लिए एक एकीकृत 'रिवर बोर्ड' के गठन की वकालत की गई है। इस पहल का उद्देश्य अंतर-राज्यीय जल विवादों का स्थायी समाधान और जल संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करना है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
कावेरी बेसिन प्रबंधन की पृष्ठभूमि
कावेरी नदी जल का मुद्दा भारत के दक्षिणी राज्यों, विशेष रूप से तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच दशकों से विवाद का विषय रहा है। वर्तमान में जल वितरण की निगरानी के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) कार्यरत है, किंतु जलाशयों के एकीकृत नियंत्रण के अभाव में जल संकट के समय गंभीर असहमतियाँ उत्पन्न होती हैं। इस पृष्ठभूमि में एक केंद्रीयकृत संस्था की अनिवार्यता महसूस की जा रही है।
एकीकृत रिवर बोर्ड की परिकल्पना
प्रस्तावित एकीकृत रिवर बोर्ड का मुख्य कार्य कावेरी बेसिन के सभी प्रमुख जलाशयों का स्वामित्व अपने हाथ में लेना और उनका संचालन तथा विनियमन करना होगा। नदी बेसिन दृष्टिकोण (River Basin Approach) के तहत जल का वैज्ञानिक दोहन और वितरण सुनिश्चित किया जाएगा, जिससे किसी एक राज्य द्वारा जल के एकाधिकार या अविवेकपूर्ण उपयोग पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।
संवैधानिक और कानूनी ढांचा
भारत के संविधान के अनुच्छेद 262 के अंतर्गत संसद को अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के जल के उपयोग, नियंत्रण तथा वितरण से संबंधित विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। इसी शक्ति के तहत नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (River Boards Act, 1956) अधिनियमित किया गया था, जिसके प्रावधानों के अंतर्गत ऐसे बोर्डों के गठन का मार्ग प्रशस्त होता है।
संभावित लाभ और चुनौतियाँ
इस प्रकार के बोर्ड के गठन से जल वितरण में पारदर्शिता आएगी और मानसून की अनिश्चितता के दौरान भी सहयोगात्मक तरीके से जल का प्रबंधन किया जा सकेगा। हालांकि, राज्यों की स्वायत्तता का हनन होने की आशंका और राजनीतिक सहमति का अभाव इस दिशा में मुख्य प्रशासनिक बाधाएँ हैं, जिनके समाधान के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच व्यापक आम सहमति की आवश्यकता है।

भारत द्वारा 2033 तक स्वदेशी छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों का विकास
भारत सरकार ने न्यूक्लियर एनर्जी मिशन के तहत 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) को विकसित करने और संचालित करने की योजना बनाई है। यह पहल 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने के दीर्घकालिक लक्ष्य के अनुरूप है।
सारांश (Summary): भारत सरकार ने न्यूक्लियर एनर्जी मिशन के तहत 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) को विकसित करने और संचालित करने की योजना बनाई है। यह पहल 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने के दीर्घकालिक लक्ष्य के अनुरूप है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
नीतिगत पृष्ठभूमि और लक्ष्य
सरकार ने अपनी नवनिर्मित परमाणु ऊर्जा नीति के अंतर्गत संसद के निचले सदन यानी लोकसभा को सूचित किया है कि देश में परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े बदलाव की तैयारी की जा रही है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक बड़े परमाणु संयंत्रों के साथ-साथ छोटे और लचीले ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना है। भारत का लक्ष्य वर्ष 2047 तक अपनी कुल परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 100 गीगावाट इलेक्ट्रिकल (GWe) तक पहुंचाना है, जिसमें ये रिएक्टर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों की विशेषताएं
छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) उन्नत परमाणु रिएक्टर होते हैं जिनका आकार पारंपरिक परमाणु रिएक्टरों की तुलना में काफी छोटा होता है। इनकी क्षमता सामान्यतः 300 मेगावाट इलेक्ट्रिकल प्रति यूनिट तक होती है। इन्हें कारखानों में निर्मित करके असेंबली के लिए गंतव्य स्थल पर आसानी से पहुंचाया जा सकता है। इनका मॉड्यूलर डिजाइन न केवल निर्माण लागत को कम करता है, बल्कि सुरक्षा के उन्नत मानकों और कम समय में स्थापना की सुविधा भी प्रदान करता है।
रणनीतिक और पर्यावरणीय महत्व
इन रिएक्टरों का विकास देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। SMRs का उपयोग दूरदराज के क्षेत्रों, औद्योगिक क्लस्टर और ग्रिड से दूर स्थित स्थानों पर निरंतर बिजली की आपूर्ति के लिए किया जा सकता है। स्वदेशी तकनीक पर आधारित होने के कारण यह पहल देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है और आयात पर निर्भरता को कम करती है।

भारत ऑप्टेल लिमिटेड द्वारा 'गरुड़' उच्च-विभेदन दूरबीन का अनावरण
भारत ऑप्टेल लिमिटेड ने नागरिक बाजार के लिए स्वदेशी 'गरुड़' उच्च-विभेदन दूरबीन का शुभारंभ किया है। यह पहल रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है और आयात निर्भरता को कम करते हुए घरेलू स्तर पर अत्याधुनिक ऑप्टिकल उपकरणों के निर्माण और नागरिक सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सारांश (Summary): भारत ऑप्टेल लिमिटेड ने नागरिक बाजार के लिए स्वदेशी 'गरुड़' उच्च-विभेदन दूरबीन का शुभारंभ किया है। यह पहल रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है और आयात निर्भरता को कम करते हुए घरेलू स्तर पर अत्याधुनिक ऑप्टिकल उपकरणों के निर्माण और नागरिक सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
परिचय और लॉन्च पृष्ठभूमि
भारत ऑप्टेल लिमिटेड (IOL), जो रक्षा मंत्रालय के अधीन एक मिनी रत्न श्रेणी-I रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (DPSU) है, ने नई दिल्ली स्थित डीपीएसयू भवन में आधिकारिक तौर पर 'गरुड़' (GARUD) उच्च-विभेदन दूरबीन को नागरिक बाजार के लिए लॉन्च किया है। यह उत्पाद देश के रक्षा और नागरिक क्षेत्रों में स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
तकनीकी विशेषताएं और उपयोगिता
'गरुड़' दूरबीन अत्याधुनिक ऑप्टिकल तकनीक से सुसज्जित है, जो लंबी दूरी से भी अत्यंत स्पष्ट और उच्च-विभेदन (High-Resolution) वाली छवियां प्रदान करती है। इसे विभिन्न प्रकार की कठिन और प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका उपयोग वन्यजीव संरक्षण, सुरक्षा निगरानी, साहसिक पर्यटन और नागरिक प्रशासन के विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकेगा।
रणनीतिक और आर्थिक महत्व
इस स्वदेशी उत्पाद के लॉन्च से देश की रक्षा विनिर्माण इकाइयों की तकनीकी दक्षता का पता चलता है। यह पहल भारत सरकार के 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' अभियानों के अनुरूप है। नागरिक बाजार में इस प्रकार के उच्च-गुणवत्ता वाले स्वदेशी उपकरणों की उपलब्धता से विदेशी आयात पर निर्भरता घटेगी और देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ता मिलेगी।

निजी क्षेत्र का पहला एफएफएससी 'ईवेरेस्ट' रॉकेट इंजन लॉन्च
बेंगलुरु स्थित अंतरिक्ष स्टार्टअप एस्ट्रोब्रेस स्पेस टेक्नोलॉजीज ने भारत के पहले निजी रूप से निर्मित 800 किलोन्यूटन 'फुल-फ्लो स्टेज्ड कम्बशन' (FFSC) एलओएक्स-मीथेन रॉकेट इंजन 'ईवेरेस्ट' का अनावरण किया है। यह उन्नत इंजन देश के पुनर्चक्रण योग्य मध्यम-भार प्रक्षेपण वाहनों को सशक्त बनाने और वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
सारांश:
बेंगलुरु स्थित अंतरिक्ष स्टार्टअप एस्ट्रोब्रेस स्पेस टेक्नोलॉजीज ने भारत के पहले निजी रूप से निर्मित 800 किलोन्यूटन 'फुल-फ्लो स्टेज्ड कम्बशन' (FFSC) एलओएक्स-मीथेन रॉकेट इंजन 'ईवेरेस्ट' का अनावरण किया है। यह उन्नत इंजन देश के पुनर्चक्रण योग्य मध्यम-भार प्रक्षेपण वाहनों को सशक्त बनाने और वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
विस्तृत विश्लेषण:
'ईवेरेस्ट' इंजन की तकनीकी विशेषताएँ और संरचना
एस्ट्रोब्रेस स्पेस टेक्नोलॉजीज द्वारा विकसित 'ईवेरेस्ट' एक 80-टन वर्ग का उच्च-थ्रस्ट (800 किलोन्यूटन) तरल-प्रोपेलेंट रॉकेट इंजन है। यह लिक्विड ऑक्सीजन (LOX) और लिक्विड मीथेन के संयोजन (मेथालॉक्स) का उपयोग करता है। यह इंजन दुनिया की सबसे उन्नत और जटिल 'फुल-फ्लो स्टेज्ड कम्बशन' (FFSC) आर्किटेक्चर पर आधारित है, जिसमें ईंधन और ऑक्सीडाइज़र दोनों को मुख्य दहन कक्ष में प्रवेश करने से पहले पूरी तरह से गैसीकृत किया जाता है। इससे इंजन की दक्षता, चेंबर का दबाव और विशिष्ट आवेग (लगभग 340 सेकंड) अत्यधिक बढ़ जाता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य और भारत की स्थिति
एफएफएससी (FFSC) तकनीक अपनी अत्यधिक जटिल टर्बोमैचरी और थर्मल स्थितियों के कारण वैश्विक स्तर पर बेहद दुर्लभ है। इस तकनीक के विकास के साथ भारत, अमेरिका, रूस और चीन के बाद इस विशिष्ट तकनीक को हासिल करने वाला चौथा देश बन गया है, जबकि एस्ट्रोब्रेस वैश्विक स्तर पर ऐसी उच्च-थ्रस्ट इंजन विकसित करने वाली चुनिंदा वाणिज्यिक कंपनियों में शामिल हो गई है। यह उपलब्धि पारंपरिक अंतरिक्ष शक्तियों के समकक्ष भारतीय निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की तकनीकी परिपक्वता को दर्शाती है।
औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र और भविष्य के अनुप्रयोग
यह इंजन विशेष रूप से अगली पीढ़ी के पुनर्चक्रण योग्य (reusable) मध्यम-भार वाले लॉन्च वाहनों के लिए डिज़ाइन किया गया है, जो लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 30 टन तक के पेलोड को ले जाने में सक्षम हैं। कंपनी का उद्देश्य उन्नत धातु 3D-प्रिंटिंग तकनीकों का उपयोग करके वार्षिक आधार पर 50 इंजनों के निर्माण की क्षमता विकसित करना है। अंतरिक्ष मिशनों में तीव्र प्रतिक्रिया और लॉन्च-ऑन-डिमांड क्षमताओं को बढ़ावा देने के लिए यह पहल भारत के बढ़ते अंतरिक्ष उद्योग में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
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