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बिटचैट रिपॉजिटरी और साइबर सुरक्षा: सरकारी हस्तक्षेप और कानूनी प्रभाव

बिटचैट रिपॉजिटरी और साइबर सुरक्षा: सरकारी हस्तक्षेप और कानूनी प्रभाव

Delight News
📅 27 Jul2026

भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने बिटचैट होस्ट करने वाली तीन गिटहब रिपॉजिटरी को हटाने का निर्देश दिया है। यह कार्रवाई सुरक्षा एजेंसियों द्वारा डिजिटल प्लेटफॉर्मों के दुरुपयोग को रोकने और राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा ढांचे को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत की गई है।

शीर्षक: बिटचैट रिपॉजिटरी और साइबर सुरक्षा: सरकारी हस्तक्षेप और कानूनी प्रभाव
सारांश:
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने बिटचैट होस्ट करने वाली तीन गिटहब रिपॉजिटरी को हटाने का निर्देश दिया है। यह कार्रवाई सुरक्षा एजेंसियों द्वारा डिजिटल प्लेटफॉर्मों के दुरुपयोग को रोकने और राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा ढांचे को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत की गई है।
साइबर अपराध और बिटचैट का संदर्भ
बिटचैट एक ऐसी तकनीक है जो पीयर-टू-पीयर (P2P) संचार मॉडल पर आधारित है। इसे अक्सर एन्क्रिप्टेड संदेश भेजने और गुमनाम रहने के लिए विकसित किया जाता है। हालिया प्रकरण में, सुरक्षा एजेंसियों ने पाया कि इन रिपॉजिटरी का उपयोग साइबर अपराधियों द्वारा अवैध गतिविधियों, डेटा चोरी और दुर्भावनापूर्ण कोड साझा करने के लिए किया जा रहा था। गिटहब जैसे ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म पर ऐसे टूल की उपलब्धता ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए चुनौती उत्पन्न कर दी थी, क्योंकि ये टूल बिना किसी केंद्रीय सर्वर के कार्य करते हैं।
वैधानिक ढांचा और सरकारी कार्रवाई
गृह मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत I4C ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम और आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 69A का उपयोग करते हुए यह निर्देश जारी किए। धारा 69A सरकार को भारत की संप्रभुता, अखंडता, रक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में किसी भी सूचना को सार्वजनिक पहुंच से ब्लॉक करने का अधिकार प्रदान करती है। गिटहब को दी गई यह निर्देश भारत में डिजिटल स्पेस को सुरक्षित बनाने और अपराधियों द्वारा एन्क्रिप्शन का दुरुपयोग रोकने की दिशा में एक कदम है।
डिजिटल सुरक्षा चुनौतियां
ओपन-सोर्स रिपॉजिटरी में मैलवेयर और अवैध सॉफ्टवेयर का प्रसार एक वैश्विक चिंता का विषय है। बिटचैट जैसे प्लेटफॉर्म 'विकेंद्रीकृत' प्रकृति के कारण ट्रेसिंग करना कठिन बना देते हैं। इससे साइबर अपराधों की जांच में बाधा उत्पन्न होती है। I4C द्वारा की गई इस कार्रवाई का उद्देश्य डिजिटल बुनियादी ढांचे का दुरुपयोग कर रहे तत्वों की पहचान करना और उन्हें रोकना है। यह मामला डिजिटल सुरक्षा और नागरिक गोपनीयता के बीच संतुलन की बहस को भी जन्म देता है, जहां राज्य का प्राथमिक उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा और साइबर अपराध पर नियंत्रण सुनिश्चित करना है।
भविष्य के निहितार्थ
इस कार्रवाई से स्पष्ट है कि सरकार अब डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर अधिक सतर्कता बरत रही है। भविष्य में उन सभी तकनीकी रिपॉजिटरी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की संभावना है जिनका उपयोग राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों या साइबर अपराधों को अंजाम देने के लिए किया जाता है। प्रशासनिक स्तर पर यह कदम सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता और डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी में वृद्धि को दर्शाता है।
कॉर्पोरेट मित्र योजना: कॉर्पोरेट गवर्नेंस और कौशल विकास हेतु पहल

कॉर्पोरेट मित्र योजना: कॉर्पोरेट गवर्नेंस और कौशल विकास हेतु पहल

Delight News
📅 27 Jul2026

कॉर्पोरेट मित्र योजना भारतीय कॉर्पोरेट कार्य संस्थान (IICA) की एक रणनीतिक पहल है, जिसका उद्देश्य युवाओं, छात्रों और MSMEs को कॉर्पोरेट गवर्नेंस, अनुपालन मानकों और उद्यमिता कौशल से सुसज्जित करना है। यह योजना उद्योग और अकादमिक जगत के बीच की दूरी को पाटकर एक कुशल और जागरूक कार्यबल तैयार करने पर केंद्रित है।

कॉर्पोरेट मित्र योजना: कॉर्पोरेट गवर्नेंस और कौशल विकास हेतु पहल
सारांश
कॉर्पोरेट मित्र योजना भारतीय कॉर्पोरेट कार्य संस्थान (IICA) की एक रणनीतिक पहल है, जिसका उद्देश्य युवाओं, छात्रों और MSMEs को कॉर्पोरेट गवर्नेंस, अनुपालन मानकों और उद्यमिता कौशल से सुसज्जित करना है। यह योजना उद्योग और अकादमिक जगत के बीच की दूरी को पाटकर एक कुशल और जागरूक कार्यबल तैयार करने पर केंद्रित है।
योजना का उद्देश्य और कार्यक्षेत्र
कॉर्पोरेट मित्र योजना का प्राथमिक लक्ष्य भारत के सुदूर और उभरते क्षेत्रों में कॉर्पोरेट साक्षरता का प्रसार करना है। यह पहल विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करती है जहाँ कॉर्पोरेट जगत के मानक और विनियामक ढांचे की जानकारी सीमित है। यह योजना प्रतिभागियों को कंपनियों अधिनियम, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR), और व्यावसायिक नैतिकता के व्यावहारिक पहलुओं से अवगत कराती है।
प्रमुख घटक और रणनीतिक महत्व
यह कार्यक्रम विभिन्न कार्यशालाओं, वेबिनार और प्रशिक्षण सत्रों के माध्यम से संचालित होता है। इसके मुख्य घटकों में कौशल संवर्धन, नियामक अनुपालन की समझ और व्यावसायिक जोखिम प्रबंधन शामिल हैं। MSMEs के लिए, यह योजना उन्हें सरकारी नियमों के अनुकूल बनने और परिचालन दक्षता बढ़ाने के लिए एक मार्गदर्शक तंत्र प्रदान करती है। छात्रों के लिए, यह कॉर्पोरेट जगत की कार्यप्रणाली को समझने और रोजगार क्षमता में सुधार लाने हेतु एक महत्वपूर्ण अवसर है।
IICA की भूमिका और प्रभाव
भारतीय कॉर्पोरेट कार्य संस्थान (IICA), जो कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के अंतर्गत एक थिंक-टैंक है, इस योजना के माध्यम से क्षमता निर्माण (Capacity Building) का कार्य कर रहा है। उत्तर-पूर्व भारत जैसे क्षेत्रों में इसका विस्तार स्थानीय उद्यमिता को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने का एक प्रयास है। यह पहल न केवल अनुपालन संस्कृति को बढ़ावा देती है, बल्कि देश में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of Doing Business) के परिवेश को भी सुदृढ़ करती है।
प्रतियोगी परीक्षा के लिए प्रासंगिकता
यूपीएससी और अन्य सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए, यह विषय सुशासन (Good Governance), समावेशी विकास, और कौशल भारत मिशन के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह योजना कॉर्पोरेट क्षेत्र में पारदर्शिता लाने और जमीनी स्तर पर आर्थिक सशक्तीकरण सुनिश्चित करने की सरकारी नीति का प्रतिनिधित्व करती है। सांवैधानिक और वैधानिक निकायों के कार्यों के साथ-साथ, नीतिगत नवाचारों के अंतर्गत इस प्रकार की योजनाओं का अध्ययन आवश्यक है।
सारनाथ का यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में ऐतिहासिक समावेशन

सारनाथ का यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में ऐतिहासिक समावेशन

Delight News
📅 26 Jul2026

उत्तर प्रदेश की बौद्ध स्थली सारनाथ को दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित यूनेस्को विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया गया है। यह उपलब्धि भारत के बौद्ध सर्किट को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर प्रतिष्ठित करने के साथ ही सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

सारनाथ का यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में ऐतिहासिक समावेशन
सारांश
उत्तर प्रदेश की बौद्ध स्थली सारनाथ को दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित यूनेस्को विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया गया है। यह उपलब्धि भारत के बौद्ध सर्किट को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर प्रतिष्ठित करने के साथ ही सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
वाराणसी के निकट स्थित सारनाथ भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का प्रमुख केंद्र है। यहीं पर भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपना प्रथम उपदेश 'धर्मचक्रप्रवर्तन' दिया था। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, यह स्थान मौर्य सम्राट अशोक द्वारा निर्मित धमेख स्तूप, अशोक स्तंभ और अनेक बौद्ध मठों के अवशेषों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। सारनाथ की वास्तुकला और शिलालेख भारतीय कला के प्राचीन वैभव को प्रदर्शित करते हैं।
यूनेस्को सूची का महत्व
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में स्थान मिलना किसी स्थल की वैश्विक मान्यता को दर्शाता है। सारनाथ के शामिल होने से उत्तर प्रदेश में विश्व धरोहर स्थलों की संख्या चार हो गई है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण, अनुसंधान और संवर्धन के लिए अतिरिक्त संसाधनों एवं तकनीकी विशेषज्ञता तक पहुंच सुनिश्चित करता है। इससे न केवल ऐतिहासिक संरचनाओं का बेहतर रखरखाव संभव होगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग को भी गति मिलेगी।
बौद्ध सर्किट एवं पर्यटन पर प्रभाव
सारनाथ का विश्व धरोहर के रूप में चयन भारत सरकार की 'बौद्ध सर्किट' परियोजना के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह कुशीनगर, श्रावस्ती और लुंबिनी जैसे अन्य बौद्ध स्थलों के साथ संपर्क को सुदृढ़ करेगा। इस वैश्विक पहचान से विदेशी पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होने और सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूती मिलने की प्रबल संभावना है। साथ ही, यह स्थल अब यूनेस्को के मानकों के अनुरूप वैश्विक पर्यटन के केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा।
चयन प्रक्रिया एवं समिति की भूमिका
यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति प्रतिवर्ष विभिन्न देशों द्वारा प्रस्तावित स्थलों का मूल्यांकन करती है। सारनाथ के नामांकन के लिए पिछले 28 वर्षों से निरंतर प्रयास किए जा रहे थे। बुसान में आयोजित 48वें सत्र में समिति ने इसके उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य (Outstanding Universal Value), अखंडता और संरक्षण की स्थिति की गहन समीक्षा की, जिसके पश्चात इसे आधिकारिक रूप से सूची में अंकित किया गया।
बोरोफीन आधारित जैव-स्नेहक: औद्योगिक ऊर्जा दक्षता में एक क्रांतिकारी नवाचार

बोरोफीन आधारित जैव-स्नेहक: औद्योगिक ऊर्जा दक्षता में एक क्रांतिकारी नवाचार

Delight News
📅 23 Jul2026

गुवाहाटी स्थित 'इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी' (IASST) के वैज्ञानिकों ने कैस्टर ऑयल (अरंडी के तेल) में 'बोरोफीन' को बायो-लुब्रिकेंट एडिटिव के रूप में उपयोग करने में सफलता प्राप्त की है। यह नवाचार घर्षण को 42 प्रतिशत तक कम कर मशीनों की कार्यक्षमता बढ़ाने और ऊर्जा संरक्षण में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकता है।

बोरोफीन आधारित जैव-स्नेहक: औद्योगिक ऊर्जा दक्षता में एक क्रांतिकारी नवाचार
सारांश
गुवाहाटी स्थित 'इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी' (IASST) के वैज्ञानिकों ने कैस्टर ऑयल (अरंडी के तेल) में 'बोरोफीन' को बायो-लुब्रिकेंट एडिटिव के रूप में उपयोग करने में सफलता प्राप्त की है। यह नवाचार घर्षण को 42 प्रतिशत तक कम कर मशीनों की कार्यक्षमता बढ़ाने और ऊर्जा संरक्षण में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकता है।
विस्तृत विश्लेषण
बोरोफीन: एक अद्वितीय नैनो-सामग्री
बोरोफीन एक द्वि-आयामी (2D) नैनो-सामग्री है, जो पूरी तरह से बोरॉन परमाणुओं से निर्मित होती है। ग्राफीन के विपरीत, बोरोफीन अत्यधिक 'बहुरूपी' (polymorphic) है, जिसका अर्थ है कि इसे विभिन्न संरचनात्मक विन्यासों में व्यवस्थित किया जा सकता है। अपनी विशिष्ट भौतिक और रासायनिक विशेषताओं जैसे कि उच्च यांत्रिक शक्ति, लचीलापन, तापीय और विद्युत चालकता के कारण यह सामग्री वर्तमान में शोध का केंद्र बनी हुई है। अब तक इसका उपयोग मुख्य रूप से बैटरी, सुपरकैपेसिटर और ईंधन सेल जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों में करने के लिए किया जाता रहा है।
लुब्रिकेशन में तकनीकी breakthrough
औद्योगिक मशीनरी में घर्षण और टूट-फूट ऊर्जा हानि के प्रमुख कारण हैं। कैस्टर ऑयल एक नवीकरणीय और जैव-निम्नीकरणीय (biodegradable) स्नेहक है, लेकिन इसके प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए इसमें एडिटिव्स की आवश्यकता होती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि कैस्टर ऑयल में केवल 0.1 प्रतिशत (वजन के अनुसार) बोरोफीन मिलाने से इसके घर्षण-रोधी गुणों में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। यह मिश्रण किसी भी रासायनिक संशोधन के बिना आसानी से घुल जाता है।
कार्यप्रणाली और लाभ
जब यह बोरोफीन-युक्त स्नेहक मशीनरी में कार्य करता है, तो यह संपर्क सतहों पर एक टिकाऊ 'ट्राइबोफिल्म' (tribofilm) का निर्माण करता है। यह सुरक्षात्मक परत आयरन ऑक्साइड, कार्बनयुक्त प्रजातियों और बोरॉन-आधारित यौगिकों से बनी होती है। यह परत कतरनी तनाव (shear stress) को कम करती है, भार वहन क्षमता को बढ़ाती है और मशीनी पुर्जों की घिसावट को न्यूनतम करती है।
भविष्य की संभावनाएं
यह अनुसंधान न केवल मशीन की दक्षता में सुधार करता है, बल्कि परिचालन लागत को कम करने में भी सहायक है। इसकी 'ग्रीन लुब्रिकेशन' क्षमता नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, समुद्री अनुप्रयोगों और टिकाऊ विनिर्माण उद्योगों के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। यह तकनीक पर्यावरण के अनुकूल स्नेहकों के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो दीर्घकाल में वैश्विक औद्योगिक ऊर्जा खपत को कम करने में योगदान दे सकती है।
भारतीय नौसेना की माहे-श्रेणी की दूसरी पनडुब्बी रोधी पोत 'आईएनएस मालवण' का अनावरण

भारतीय नौसेना की माहे-श्रेणी की दूसरी पनडुब्बी रोधी पोत 'आईएनएस मालवण' का अनावरण

Delight News
📅 17 Jul2026

भारतीय नौसेना की स्वदेशीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, 'माहे' श्रेणी का दूसरा पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW-SWC) 'मालवण' तैयार है। यह पोत तटीय रक्षा को सुदृढ़ करने, उथले जल में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक गेम-चेंजर साबित होगा, जो आत्मनिर्भर भारत के विजन को गति देता है।

भारतीय नौसेना की माहे-श्रेणी की दूसरी पनडुब्बी रोधी पोत 'आईएनएस मालवण' का अनावरण:
सारांश:
भारतीय नौसेना की स्वदेशीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, 'माहे' श्रेणी का दूसरा पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW-SWC) 'मालवण' तैयार है। यह पोत तटीय रक्षा को सुदृढ़ करने, उथले जल में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक गेम-चेंजर साबित होगा, जो आत्मनिर्भर भारत के विजन को गति देता है।
विस्तृत विश्लेषण:
परियोजना और निर्माण की पृष्ठभूमि:
आईएनएस मालवण का निर्माण 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत किया गया है। यह पोत पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता (ASW-SWC) परियोजना का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत कुल आठ पोतों का निर्माण किया जा रहा है। इनका मुख्य कार्य तटीय जल में एंटी-सबमरीन ऑपरेशन्स, कम तीव्रता वाले समुद्री ऑपरेशन्स और खान बिछाने जैसे कार्यों को अंजाम देना है। इन पोतों का डिजाइन और निर्माण घरेलू स्तर पर किया गया है, जो भारतीय रक्षा निर्माण उद्योग की परिपक्वता को दर्शाता है।
तकनीकी विनिर्देश और मारक क्षमता:
मालवण जैसे एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी पोत अत्याधुनिक सोनार सूट से लैस हैं, जो उथले जल में भी पनडुब्बियों का सटीक पता लगाने में सक्षम हैं। इनकी गतिशीलता और मारक क्षमता इन्हें तटीय क्षेत्रों में निगरानी रखने के लिए उपयुक्त बनाती है। ये पोत टॉरपीडो, रॉकेट लॉन्चर और खदानों से लैस हैं, जो उन्हें दुश्मन की किसी भी घुसपैठ को नाकाम करने के लिए पूरी तरह सक्षम बनाते हैं। इनका हल्का वजन और उच्च गति इन्हें तटवर्ती रक्षा रणनीति के लिए अत्यंत प्रभावी बनाती है।
सामरिक महत्व और समुद्री सुरक्षा:
हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच, मालवण जैसे पोतों का कमीशनिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये पोत न केवल भारतीय तटरेखा की सुरक्षा करेंगे, बल्कि समुद्री सीमाओं की निगरानी में भी तैनात रहेंगे। ये 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम के तहत स्वदेशी रक्षा हार्डवेयर को बढ़ावा देने में मील का पत्थर हैं, जिससे विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी और नौसेना की परिचालन तत्परता में वृद्धि होगी। इन पोतों की तैनाती से भारतीय नौसेना की 'ब्लू वॉटर' क्षमता और तटीय रक्षा तंत्र को नई मजबूती मिलेगी।
भविष्य की भूमिका:
मालवण का समावेश नौसेना के आधुनिकीकरण के व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। ये पोत भविष्य के युद्ध परिदृश्यों में उथले समुद्र की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार किए गए हैं। इनका स्वदेशी होना यह सुनिश्चित करता है कि भारतीय नौसेना के पास ऐसे अत्याधुनिक उपकरण हैं जो न केवल प्रभावी हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता के प्रतीक भी हैं। यह कदम भारतीय नौसेना की समुद्री प्रभुत्व और सुरक्षा क्षमताओं को वैश्विक मानकों के अनुरूप नई ऊंचाइयों पर ले जाने का कार्य करेगा।

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