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भारतीय नौसेना की माहे-श्रेणी की दूसरी पनडुब्बी रोधी पोत 'आईएनएस मालवण' का अनावरण

भारतीय नौसेना की माहे-श्रेणी की दूसरी पनडुब्बी रोधी पोत 'आईएनएस मालवण' का अनावरण

Delight News
📅 17 Jul2026

भारतीय नौसेना की स्वदेशीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, 'माहे' श्रेणी का दूसरा पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW-SWC) 'मालवण' तैयार है। यह पोत तटीय रक्षा को सुदृढ़ करने, उथले जल में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक गेम-चेंजर साबित होगा, जो आत्मनिर्भर भारत के विजन को गति देता है।

भारतीय नौसेना की माहे-श्रेणी की दूसरी पनडुब्बी रोधी पोत 'आईएनएस मालवण' का अनावरण:
सारांश:
भारतीय नौसेना की स्वदेशीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, 'माहे' श्रेणी का दूसरा पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW-SWC) 'मालवण' तैयार है। यह पोत तटीय रक्षा को सुदृढ़ करने, उथले जल में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक गेम-चेंजर साबित होगा, जो आत्मनिर्भर भारत के विजन को गति देता है।
विस्तृत विश्लेषण:
परियोजना और निर्माण की पृष्ठभूमि:
आईएनएस मालवण का निर्माण 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत किया गया है। यह पोत पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता (ASW-SWC) परियोजना का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत कुल आठ पोतों का निर्माण किया जा रहा है। इनका मुख्य कार्य तटीय जल में एंटी-सबमरीन ऑपरेशन्स, कम तीव्रता वाले समुद्री ऑपरेशन्स और खान बिछाने जैसे कार्यों को अंजाम देना है। इन पोतों का डिजाइन और निर्माण घरेलू स्तर पर किया गया है, जो भारतीय रक्षा निर्माण उद्योग की परिपक्वता को दर्शाता है।
तकनीकी विनिर्देश और मारक क्षमता:
मालवण जैसे एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी पोत अत्याधुनिक सोनार सूट से लैस हैं, जो उथले जल में भी पनडुब्बियों का सटीक पता लगाने में सक्षम हैं। इनकी गतिशीलता और मारक क्षमता इन्हें तटीय क्षेत्रों में निगरानी रखने के लिए उपयुक्त बनाती है। ये पोत टॉरपीडो, रॉकेट लॉन्चर और खदानों से लैस हैं, जो उन्हें दुश्मन की किसी भी घुसपैठ को नाकाम करने के लिए पूरी तरह सक्षम बनाते हैं। इनका हल्का वजन और उच्च गति इन्हें तटवर्ती रक्षा रणनीति के लिए अत्यंत प्रभावी बनाती है।
सामरिक महत्व और समुद्री सुरक्षा:
हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच, मालवण जैसे पोतों का कमीशनिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये पोत न केवल भारतीय तटरेखा की सुरक्षा करेंगे, बल्कि समुद्री सीमाओं की निगरानी में भी तैनात रहेंगे। ये 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम के तहत स्वदेशी रक्षा हार्डवेयर को बढ़ावा देने में मील का पत्थर हैं, जिससे विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी और नौसेना की परिचालन तत्परता में वृद्धि होगी। इन पोतों की तैनाती से भारतीय नौसेना की 'ब्लू वॉटर' क्षमता और तटीय रक्षा तंत्र को नई मजबूती मिलेगी।
भविष्य की भूमिका:
मालवण का समावेश नौसेना के आधुनिकीकरण के व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। ये पोत भविष्य के युद्ध परिदृश्यों में उथले समुद्र की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार किए गए हैं। इनका स्वदेशी होना यह सुनिश्चित करता है कि भारतीय नौसेना के पास ऐसे अत्याधुनिक उपकरण हैं जो न केवल प्रभावी हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता के प्रतीक भी हैं। यह कदम भारतीय नौसेना की समुद्री प्रभुत्व और सुरक्षा क्षमताओं को वैश्विक मानकों के अनुरूप नई ऊंचाइयों पर ले जाने का कार्य करेगा।
व्हाइट रैबिट टेक्नोलॉजी: भारत का नया मानक समय वितरण नेटवर्क

व्हाइट रैबिट टेक्नोलॉजी: भारत का नया मानक समय वितरण नेटवर्क

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📅 17 Jul2026

केंद्रीय मंत्री ने बेंगलुरु में 'व्हाइट रैबिट' तकनीक पर आधारित भारतीय मानक समय (IST) वितरण प्रदर्शन नेटवर्क का उद्घाटन किया है। यह नवाचार समय सटीकता और डेटा ट्रांसफर में नैनो-सेकंड स्तर की शुद्धता सुनिश्चित करता है। इससे रक्षा, फिनटेक, दूरसंचार और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक सटीक समय सिंक्रोनाइज़ेशन प्राप्त होगा।

व्हाइट रैबिट टेक्नोलॉजी: भारत का नया मानक समय वितरण नेटवर्क:
सारांश (Summary):
केंद्रीय मंत्री ने बेंगलुरु में 'व्हाइट रैबिट' तकनीक पर आधारित भारतीय मानक समय (IST) वितरण प्रदर्शन नेटवर्क का उद्घाटन किया है। यह नवाचार समय सटीकता और डेटा ट्रांसफर में नैनो-सेकंड स्तर की शुद्धता सुनिश्चित करता है। इससे रक्षा, फिनटेक, दूरसंचार और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक सटीक समय सिंक्रोनाइज़ेशन प्राप्त होगा।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
व्हाइट रैबिट तकनीक का परिचय:
व्हाइट रैबिट (White Rabbit - WR) एक अत्याधुनिक ईथरनेट-आधारित तकनीक है, जिसे मूल रूप से सीईआरएन (CERN) द्वारा विकसित किया गया था। यह तकनीक पैकेट-स्विच्ड नेटवर्क पर नैनो-सेकंड (एक सेकंड का एक अरबवां हिस्सा) से कम की सटीकता के साथ समय और आवृत्ति वितरण प्रदान करने में सक्षम है। यह पारंपरिक नेटवर्क समय प्रोटोकॉल (NTP) की तुलना में कहीं अधिक सटीक और विश्वसनीय है, जो समय के विचलन को न्यूनतम करने का कार्य करती है।
नेटवर्क की आवश्यकता और महत्व:
वर्तमान में, डिजिटल युग में सटीक समय का महत्व निरंतर बढ़ रहा है। विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों में समय के मामूली अंतर से भी भारी वित्तीय हानि या सुरक्षा चूक हो सकती है। व्हाइट रैबिट आधारित नेटवर्क के माध्यम से भारतीय मानक समय को पूरे देश में डिजिटल रूप से वितरित किया जा सकेगा। यह प्रणाली विभिन्न केंद्रों के बीच समय के अंतर को लगभग समाप्त कर देगी, जिससे उच्च-सटीक डेटा प्रविष्टि और सटीक टाइम-स्टैम्पिंग संभव हो पाएगी।
तकनीकी कार्यप्रणाली:
यह तकनीक सिंक्रोनस ईथरनेट और प्रिसिजन टाइम प्रोटोकॉल का एक अनूठा संयोजन है। यह ऑप्टिकल फाइबर के माध्यम से डेटा को प्रसारित करती है और इसमें अंतर्निहित त्रुटि सुधार तंत्र मौजूद है। जब डेटा एक नोड से दूसरे नोड पर भेजा जाता है, तो यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि समय की जानकारी में कोई विलंब (Latency) या अनिश्चितता न हो। यह विशेष रूप से उन अनुप्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण है जहाँ नैनो-सेकंड की सटीकता अनिवार्य है।
अनुप्रयोग और भविष्य के प्रभाव:
इस तकनीक के कार्यान्वयन से भारत की डिजिटल संप्रभुता को मजबूती मिलेगी। इसके प्राथमिक लाभों में शेयर बाजार में हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग, 5जी/6जी दूरसंचार नेटवर्क का प्रबंधन, स्मार्ट ग्रिड बिजली वितरण और उपग्रह-आधारित नेविगेशन शामिल हैं। इसके अलावा, रक्षा क्षेत्र में सटीक मिसाइल मार्गदर्शन और संचार प्रणालियों की दक्षता में भी क्रांतिकारी सुधार होने की संभावना है। यह पहल भारत को वैश्विक स्तर पर सटीक समय मापन और वितरण के क्षेत्र में अग्रणी देशों की श्रेणी में स्थापित करेगी।
चेंगदू जे-20: चीन की वायु शक्ति और भू-राजनीतिक सुरक्षा प्रभाव

चेंगदू जे-20: चीन की वायु शक्ति और भू-राजनीतिक सुरक्षा प्रभाव

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📅 17 Jul2026

चेंगदू जे-20 'माइटी ड्रैगन' चीन का प्रथम स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान है। यह विमान वायु श्रेष्ठता और सटीक प्रहार क्षमता में सक्षम है। अपनी उन्नत एवियोनिक्स, सेंसर फ्यूजन और स्टील्थ तकनीकी के साथ, यह विमान इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की सैन्य क्षमताओं को एक नई ऊंचाई प्रदान करता है।

चेंगदू जे-20: चीन की वायु शक्ति और भू-राजनीतिक सुरक्षा प्रभाव:
चेंगदू जे-20 'माइटी ड्रैगन' चीन का प्रथम स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान है। यह विमान वायु श्रेष्ठता और सटीक प्रहार क्षमता में सक्षम है। अपनी उन्नत एवियोनिक्स, सेंसर फ्यूजन और स्टील्थ तकनीकी के साथ, यह विमान इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की सैन्य क्षमताओं को एक नई ऊंचाई प्रदान करता है।
जे-20 का तकनीकी विकास और सामरिक महत्व:
चेंगदू जे-20 को चेंगदू एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन (CAC) द्वारा जे-XX कार्यक्रम के अंतर्गत विकसित किया गया है। वर्ष 2011 में अपनी पहली उड़ान भरने के बाद, यह 2017 में आधिकारिक रूप से पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स (PLAAF) में शामिल हुआ। यह विमान चीन के रक्षा उद्योग में आए आत्मनिर्भरता के बड़े बदलाव को दर्शाता है, जो उसे वैश्विक स्तर पर चुनिंदा स्टील्थ लड़ाकू विमान निर्माता देशों की श्रेणी में खड़ा करता है।
डिज़ाइन और तकनीकी विशेषताएं:
इस लड़ाकू विमान का निर्माण 'कैनार्ड-डेल्टा' कॉन्फ़िगरेशन के आधार पर किया गया है, जो इसे उच्च गति और असाधारण चपलता (manoeuvrability) प्रदान करता है। इसके डिजाइन में शामिल डाइवर्टरलेस सुपरसोनिक इनटेक (DSI) और स्टील्थ कोटिंग इसे रडार की नजरों से ओझल रखने में मदद करती है। सेंसर के मामले में, इसमें एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल टारगेटिंग सिस्टम (EOTS) का उपयोग किया गया है, जो पायलट को युद्धक्षेत्र की एक व्यापक और वास्तविक समय की जानकारी प्रदान करते हैं।
इंजन क्षमता और प्रदर्शन:
शुरुआती दौर में रूसी इंजनों पर निर्भरता के बाद, अब जे-20 स्वदेशी WS-10C और उन्नत WS-15 इंजनों से सुसज्जित है। ये इंजन न केवल विमान को अधिक शक्ति प्रदान करते हैं, बल्कि इसे 'सुपरक्रूज' (बिना आफ्टरबर्नर के सुपरसोनिक गति पर उड़ान भरना) की क्षमता भी देते हैं। यह तकनीकी विकास पीएलएएएफ की लंबी दूरी तक मार करने और विवादित हवाई क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की क्षमता को काफी बढ़ा देता है।
क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रभाव:
जे-20 का परिचालन होना हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा समीकरणों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह विमान न केवल चीन की आक्रामक रक्षा नीति का प्रतीक है, बल्कि यह पड़ोसी देशों के लिए एक रणनीतिक चुनौती भी पेश करता है। भारतीय वायुसेना के संदर्भ में, जे-20 की बढ़ती संख्या का आकलन वायु रक्षा प्रणालियों के आधुनिकीकरण और भविष्य की हवाई युद्ध की तैयारी के लिए अनिवार्य हो गया है।
कुडनकुलम डेटा लीक: साइबर सुरक्षा और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की चुनौतियां:

कुडनकुलम डेटा लीक: साइबर सुरक्षा और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की चुनौतियां:

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📅 17 Jul2026

हाल ही में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (KKNPP) से संबंधित डेटा लीक की घटना ने भारत के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की साइबर सुरक्षा पर चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह घटना सीधे संयंत्र के कोर सिस्टम का उल्लंघन नहीं थी, बल्कि एक थर्ड-पार्टी ठेकेदार के क्लाउड सर्वर की संवेदनशीलता के कारण घटित हुई, जो आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा की महत्ता को दर्शाता है।

कुडनकुलम डेटा लीक: साइबर सुरक्षा और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की चुनौतियां:
(Summary):
हाल ही में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (KKNPP) से संबंधित डेटा लीक की घटना ने भारत के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की साइबर सुरक्षा पर चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह घटना सीधे संयंत्र के कोर सिस्टम का उल्लंघन नहीं थी, बल्कि एक थर्ड-पार्टी ठेकेदार के क्लाउड सर्वर की संवेदनशीलता के कारण घटित हुई, जो आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा की महत्ता को दर्शाता है।
विस्तृत विश्लेषण
घटना का तकनीकी परिप्रेक्ष्य:
कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र से संबंधित लगभग 14.3 जीबी डेटा का लीक होना एक गंभीर सुरक्षा घटना है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह सेंध एनपीसीआईएल (NPCIL) के मुख्य परमाणु रिएक्टर सिस्टम या 'एयर-गैप्ड' सैन्य ग्रेड नेटवर्क तक नहीं पहुंची थी। इसके बजाय, यह डेटा एक निजी उप-ठेकेदार द्वारा उपयोग किए जा रहे क्लाउड सर्वर से प्राप्त किया गया था, जिसे एक साइबर अपराधी गिरोह द्वारा एक्सफ़िल्ट्रेट किया गया था।
आपूर्ति श्रृंखला साइबर सुरक्षा के जोखिम:
इस घटना ने 'सप्लाई चेन साइबर रिस्क' (Supply Chain Cyber Risk) को रेखांकित किया है। सरकारी संस्थाएं अक्सर अपने मुख्य प्रणालियों को अत्यंत सुरक्षित रखती हैं, परंतु उन प्रणालियों के निर्माण या रखरखाव से जुड़े निजी विक्रेता या तृतीय-पक्ष कंपनियां साइबर हमलों के प्रति कमजोर हो सकती हैं। हैकर्स इन्हीं कमजोर कड़ियों के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की तकनीकी ड्राइंग, लेआउट और प्रशासनिक विवरण तक पहुंच प्राप्त कर लेते हैं, जो भविष्य में बड़े हमलों के लिए 'टोही जानकारी' (Reconnaissance mapping) के रूप में कार्य कर सकते हैं।
भारत की साइबर सुरक्षा संरचना:
भारत में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए 'इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम' (CERT-In) एक नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करती है। संवेदनशील प्रतिष्ठानों के लिए 'एयर-गैपिंग' की नीति अनिवार्य है, जिसका अर्थ है कि रिएक्टर नियंत्रण प्रणालियों को सार्वजनिक इंटरनेट से पूरी तरह अलग रखा जाता है। इसके अतिरिक्त, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act), 2000 और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम के तहत डेटा सुरक्षा के कड़े मानक निर्धारित किए गए हैं।
सुधारात्मक उपाय और भविष्य की राह:
आगामी समय में केवल सरकारी नेटवर्क ही नहीं, बल्कि विक्रेताओं और ठेकेदारों के लिए भी साइबर सुरक्षा ऑडिट को अनिवार्य बनाने की आवश्यकता है। महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों के साथ काम करने वाली सभी निजी कंपनियों के लिए 'एंडपॉइंट सुरक्षा' और डेटा एन्क्रिप्शन प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करना प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही, राष्ट्रीय साइबर समन्वय केंद्र (NCCC) को अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से ऐसे साइबर सिंडिकेट्स की निगरानी और सक्रिय रोकथाम पर अधिक बल देना होगा।
भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन: हरित रेलवे की ओर एक ऐतिहासिक कदम

भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन: हरित रेलवे की ओर एक ऐतिहासिक कदम

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📅 17 Jul2026

भारत ने अपनी प्रथम स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन का परिचालन शुरू कर हरित ऊर्जा की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित किया है। 'मेक इन इंडिया' पहल के अंतर्गत विकसित यह ट्रेन जींद-सोनीपत रूट पर संचालित होगी। यह परियोजना शून्य उत्सर्जन परिवहन के लक्ष्य को प्राप्त करने और रेलवे के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन: हरित रेलवे की ओर एक ऐतिहासिक कदम
सारांश
भारत ने अपनी प्रथम स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन का परिचालन शुरू कर हरित ऊर्जा की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित किया है। 'मेक इन इंडिया' पहल के अंतर्गत विकसित यह ट्रेन जींद-सोनीपत रूट पर संचालित होगी। यह परियोजना शून्य उत्सर्जन परिवहन के लक्ष्य को प्राप्त करने और रेलवे के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
परियोजना का विहंगम अवलोकन
भारत सरकार द्वारा शुरू की गई यह हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना 'ग्रीन हाइड्रोजन मिशन' का एक अभिन्न अंग है। रेलवे ने डीजल इंजनों के उपयोग को कम करने और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए हाइड्रोजन ईंधन सेल तकनीक को अपनाया है। जींद से सोनीपत तक 89 किलोमीटर के इस पायलट प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य पहाड़ी और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र वाले क्षेत्रों में इस तकनीक की व्यवहार्यता का परीक्षण करना है।
तकनीकी विशेषताएँ और नवाचार
यह ट्रेन अत्याधुनिक ईंधन सेल (Fuel Cell) तकनीक पर आधारित है, जिसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से बिजली उत्पन्न की जाती है। इस प्रक्रिया का एकमात्र उप-उत्पाद जलवाष्प है, जो इसे पूर्णतः पर्यावरण अनुकूल बनाता है। यह न केवल कार्बन फुटप्रिंट को कम करता है, बल्कि पारंपरिक डीजल इंजनों की तुलना में ध्वनि प्रदूषण में भी उल्लेखनीय कमी लाता है। पूर्णतः स्वदेशी तकनीक का उपयोग भारतीय रेलवे की आत्मनिर्भरता और इंजीनियरिंग क्षमता को प्रदर्शित करता है।
रणनीतिक महत्व और भविष्य की कार्ययोजना
इस ट्रेन का परिचालन भारतीय रेलवे के डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization) के लक्ष्य में मील का पत्थर है। इस पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के उपरांत, रेलवे का लक्ष्य दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे जैसे यूनेस्को विश्व धरोहर मार्गों और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में कुल 35 हाइड्रोजन ट्रेनें तैनात करना है। इससे न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में प्रदूषण के स्तर को न्यूनतम रखने में मदद मिलेगी।
प्रतियोगी परीक्षा के लिए निष्कर्ष
यह नवाचार सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) विशेषकर SDG 7 (सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा) और SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) के साथ सीधा जुड़ाव रखता है। परीक्षा की दृष्टि से, यह विकास 'ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन', 'सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर' और 'तकनीकी आत्मनिर्भरता' जैसे विषयों के लिए एक महत्वपूर्ण केस स्टडी के रूप में कार्य करता है।

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