
भारत में गिरती प्रजनन दर: जनसांख्यिकीय संक्रमण और नीतिगत चुनौतियां
भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 हो गई है, जो 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) से नीचे है। यह गिरावट जनसंख्या स्थिरीकरण की ओर एक महत्वपूर्ण संकेत है, लेकिन साथ ही यह भविष्य में घटते कार्यबल और बढ़ती बुजुर्ग आबादी जैसी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के प्रति भी सचेत करती है।
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भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 हो गई है, जो 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) से नीचे है। यह गिरावट जनसंख्या स्थिरीकरण की ओर एक महत्वपूर्ण संकेत है, लेकिन साथ ही यह भविष्य में घटते कार्यबल और बढ़ती बुजुर्ग आबादी जैसी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के प्रति भी सचेत करती है।
विस्तृत विश्लेषण
प्रजनन दर में गिरावट का सांख्यिकीय आधार
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) में निरंतर गिरावट दर्ज की गई है। 2.1 का प्रतिस्थापन स्तर वह दर है जिस पर एक पीढ़ी स्वयं को अगली पीढ़ी में प्रतिस्थापित करती है। 1.9 का आंकड़ा यह दर्शाता है कि भारत अब जनसंख्या विस्फोट के दौर से निकलकर जनसांख्यिकीय परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है।
गिरावट के प्रमुख कारक
इस गिरावट के पीछे शिक्षा का प्रसार, विशेषकर महिला साक्षरता में वृद्धि एक बड़ा कारण है। देर से विवाह, आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों तक पहुंच, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और शहरीकरण ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सामाजिक स्तर पर छोटे परिवार के प्रति बढ़ती स्वीकार्यता और बच्चों के पालन-पोषण की बढ़ती आर्थिक लागत ने भी प्रजनन दर को कम करने में योगदान दिया है।
जनसांख्यिकीय लाभांश और चुनौतियां
भारत के पास वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा युवा कार्यबल है, जिसे 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' कहा जाता है। हालांकि, प्रजनन दर में निरंतर गिरावट का अर्थ है कि आने वाले दशकों में युवाओं की संख्या कम होगी और बुजुर्गों की आबादी का अनुपात बढ़ेगा। इससे भविष्य में स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों और पेंशन योजनाओं पर दबाव बढ़ सकता है। यदि कार्यबल का अनुपात घटता है, तो आर्थिक विकास की गति बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी।
नीतिगत दृष्टिकोण और भावी राह
प्रजनन दर का प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आना जनसंख्या स्थिरता का संकेत तो है, लेकिन यह नीति निर्माताओं के लिए एक संकेत है कि अब फोकस 'जनसंख्या नियंत्रण' से हटकर 'मानव पूंजी विकास' पर होना चाहिए। कौशल विकास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश ही घटते कार्यबल के बीच उत्पादकता को बनाए रखने का एकमात्र उपाय है। भविष्य की नीतियों को बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा और देखभाल पर विशेष ध्यान केंद्रित करना होगा।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य (UPSC/SSC)
TFR (कुल प्रजनन दर): यह किसी महिला के जीवनकाल में पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या है।
प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level): स्थिर जनसंख्या के लिए आवश्यक 2.1 की दर।
SRS (सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम): यह भारत में जन्म और मृत्यु दर पर डेटा का सबसे विश्वसनीय सरकारी स्रोत है, जो भारत के महापंजीयक (Registrar General of India) कार्यालय द्वारा संचालित होता है।
जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend): किसी देश की कार्यशील आयु की जनसंख्या (15-64 वर्ष) का गैर-कार्यशील आयु पर अधिक होना।
जनसंख्या नीति: भारत की वर्तमान जनसंख्या नीति 2000 के उद्देश्यों के अनुरूप है, जो अब स्थिरता की ओर अग्रसर है।

सीबीएसई का त्रि-भाषा सूत्र: शैक्षणिक लचीलापन और विदेश भाषा नीति
सीबीएसई ने स्पष्ट किया है कि कक्षा 7, 8 और 9 के छात्र अपनी पसंद की विदेशी भाषा को कक्षा 10 तक जारी रख सकते हैं। यह निर्णय त्रि-भाषा सूत्र के अंतर्गत छात्रों को अपनी भाषाई वरीयताओं को चुनने में लचीलापन प्रदान करता है, जिससे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों के अनुरूप बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा मिल सके।
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सीबीएसई ने स्पष्ट किया है कि कक्षा 7, 8 और 9 के छात्र अपनी पसंद की विदेशी भाषा को कक्षा 10 तक जारी रख सकते हैं। यह निर्णय त्रि-भाषा सूत्र के अंतर्गत छात्रों को अपनी भाषाई वरीयताओं को चुनने में लचीलापन प्रदान करता है, जिससे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों के अनुरूप बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा मिल सके।
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त्रि-भाषा सूत्र का नीतिगत आधार
भारत में त्रि-भाषा सूत्र का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना और बहुभाषी कौशल को विकसित करना है। इसकी नींव 1964-66 के कोठारी आयोग द्वारा रखी गई थी। यह नीति भारतीय भाषाओं के संरक्षण और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए विदेशी भाषाओं के समावेश के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती है। सीबीएसई की वर्तमान व्यवस्था इस नीति के तहत स्कूलों को यह अनुमति देती है कि वे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्णित भाषाओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओं को भी पाठ्यक्रम में शामिल कर सकें।
नवीनतम स्पष्टीकरण का महत्व
शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई द्वारा हालिया स्पष्टीकरण उन छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है जो कक्षा 7, 8 और 9 में विदेशी भाषाओं का अध्ययन कर रहे थे। पूर्व में नीतिगत अस्पष्टता के कारण छात्रों को कक्षा 10 तक इन भाषाओं को जारी रखने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था। अब आधिकारिक निर्देश के अनुसार, यदि कोई छात्र इन कक्षाओं में विदेशी भाषा पढ़ रहा है, तो उसे अपनी शिक्षा पूरी करने तक उस भाषा को चुनने की स्वतंत्रता दी गई है। यह कदम छात्रों के शैक्षणिक तनाव को कम करने और उनकी रुचि के अनुरूप सीखने की प्रक्रिया को निर्बाध बनाने के लिए उठाया गया है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और भाषाई लचीलापन
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी त्रि-भाषा सूत्र के कार्यान्वयन पर जोर देती है, लेकिन इसमें लचीलेपन की वकालत की गई है। इसके अनुसार, किसी भी राज्य या स्कूल पर किसी विशेष भाषा को थोपा नहीं जाना चाहिए। विदेशी भाषाओं का अध्ययन छात्रों को वैश्विक नागरिक के रूप में तैयार करने में सहायक है। सीबीएसई का यह निर्णय इसी नीतिगत ढांचे का एक हिस्सा है, जो छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
कोठारी आयोग (1964-66): इस आयोग ने पहली बार त्रि-भाषा सूत्र की सिफारिश की थी।
आठवीं अनुसूची: भारतीय संविधान में वर्तमान में 22 भाषाएं शामिल हैं, जिन्हें संवैधानिक मान्यता प्राप्त है।
सीबीएसई की भूमिका: यह बोर्ड भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त निकाय है, जो संबद्ध स्कूलों में शैक्षणिक नीतियों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करता है।
संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 351 हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश देता है, जबकि त्रि-भाषा सूत्र शैक्षिक प्रशासनिक स्तर पर भाषाई विविधता को बनाए रखने का एक उपकरण है।

वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कार: संपूर्ण विवरण एवं विश्लेषण
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में वर्ष 2026 के लिए 65 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया। इस वर्ष कुल 131 पुरस्कारों की घोषणा गणतंत्र दिवस पर की गई थी, जिनमें 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्म श्री शामिल हैं। यह आयोजन राष्ट्र निर्माण में उत्कृष्ट योगदान को मान्यता देता है।
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में वर्ष 2026 के लिए 65 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया। इस वर्ष कुल 131 पुरस्कारों की घोषणा गणतंत्र दिवस पर की गई थी, जिनमें 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्म श्री शामिल हैं। यह आयोजन राष्ट्र निर्माण में उत्कृष्ट योगदान को मान्यता देता है।
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पद्म पुरस्कारों की पृष्ठभूमि और महत्व
भारत सरकार द्वारा वर्ष 1954 में स्थापित पद्म पुरस्कार देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक हैं। ये पुरस्कार कला, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा, खेल और सार्वजनिक सेवा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण और विशिष्ट सेवा प्रदान करने वाले व्यक्तियों को प्रदान किए जाते हैं। ये सम्मान किसी भी भेदभाव के बिना, योग्यता आधारित सार्वजनिक पहचान के प्रतीक हैं।
पुरस्कारों का श्रेणीकरण
पद्म पुरस्कारों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
पद्म विभूषण: यह भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है, जो किसी भी क्षेत्र में असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए दिया जाता है।
पद्म भूषण: यह तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जो उच्च क्रम की विशिष्ट सेवा के लिए प्रदान किया जाता है।
पद्म श्री: यह चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जो किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट सेवा के लिए दिया जाता है।
सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' है, जो कला, साहित्य, विज्ञान और सार्वजनिक सेवा के क्षेत्रों में अद्वितीय प्रदर्शन के लिए दिया जाता है।
चयन प्रक्रिया और पारदर्शिता
इन पुरस्कारों के लिए नामांकन प्रक्रिया अत्यंत व्यापक है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, केंद्र शासित प्रदेश, विभिन्न मंत्रालय और प्रबुद्ध नागरिक किसी भी योग्य व्यक्ति का नाम प्रस्तावित कर सकते हैं। नामांकन प्राप्त होने के बाद, प्रधानमंत्री द्वारा गठित 'पद्म पुरस्कार समिति' इन नामों की गहन समीक्षा करती है। समिति की अनुशंसाओं पर अंतिम अनुमोदन के लिए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। यह प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि जमीनी स्तर पर उत्कृष्ट कार्य करने वाले 'गुमनाम नायकों' (Unsung Heroes) को भी राष्ट्रीय मंच पर सम्मान प्राप्त हो सके।
महत्वपूर्ण तथ्य और परीक्षा उपयोगी बिंदु
पुरस्कारों की घोषणा प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर की जाती है।
पद्म पुरस्कार मरणोपरांत (Posthumously) भी दिए जा सकते हैं।
एक वर्ष में दिए जाने वाले कुल पुरस्कारों की संख्या (मरणोपरांत और विदेशियों को छोड़कर) 120 से अधिक नहीं होनी चाहिए।
यह सम्मान कोई उपाधि नहीं है और प्राप्तकर्ता इसे अपने नाम के साथ प्रत्यय या उपसर्ग के रूप में उपयोग नहीं कर सकते।
पुरस्कार समारोह सामान्यतः मार्च या अप्रैल के महीने में राष्ट्रपति भवन में आयोजित किए जाते हैं।

BHARATI कार्यक्रम: भारतीय कृषि-खाद्य स्टार्टअप्स को वैश्विक पहचान दिलाने की पहल
एपीडा (APEDA) द्वारा शुरू किया गया 'BHARATI' (भारत का हब फॉर एग्रीटेक, रेजिलिएंस, एडवांसमेंट एंड इनक्यूबेशन फॉर एक्सपोर्ट इनोवेशन) कार्यक्रम एक महत्वाकांक्षी एक्सपोर्ट एक्सीलरेसन पहल है। इसका उद्देश्य कृषि-खाद्य स्टार्टअप्स और एफपीसी (FPCs) को वैश्विक मानक के अनुरूप ढालकर भारत के 2030 तक 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर के कृषि निर्यात लक्ष्य को प्राप्त करना है।
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एपीडा (APEDA) द्वारा शुरू किया गया 'BHARATI' (भारत का हब फॉर एग्रीटेक, रेजिलिएंस, एडवांसमेंट एंड इनक्यूबेशन फॉर एक्सपोर्ट इनोवेशन) कार्यक्रम एक महत्वाकांक्षी एक्सपोर्ट एक्सीलरेसन पहल है। इसका उद्देश्य कृषि-खाद्य स्टार्टअप्स और एफपीसी (FPCs) को वैश्विक मानक के अनुरूप ढालकर भारत के 2030 तक 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर के कृषि निर्यात लक्ष्य को प्राप्त करना है।
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कार्यक्रम की पृष्ठभूमि और उद्देश्य
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत एपीडा ने भारतीय कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के लिए 'BHARATI' का शुभारंभ किया है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र में नवाचार (Innovation) और निर्यात-उन्मुख उद्यमिता को प्रोत्साहित करना है। यह पहल न केवल स्टार्टअप्स को तकनीकी सहायता प्रदान करती है, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों और स्वच्छता प्रोटोकॉल (SPS) से भी परिचित कराती है।
निर्यात क्षमता का विस्तार और रणनीतिक लक्ष्य
भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक एपीडा-अनुसूचित उत्पादों के निर्यात को 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। BHARATI कार्यक्रम इसी लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो एक मजबूत 'एक्सपोर्ट-रेडी' एंटरप्राइज पाइपलाइन तैयार कर रहा है। यह पहल विशेष रूप से उन चुनौतियों का समाधान करती है जो लघु और मध्यम उद्यमों को वैश्विक बाजारों में प्रवेश करने से रोकती हैं, जैसे कि जटिल अनुपालन प्रक्रियाएं, लॉजिस्टिक्स बाधाएं और ब्रांडिंग की कमी।
पात्रता और समावेशी विकास
इस कार्यक्रम की एक प्रमुख विशेषता इसकी समावेशी प्रकृति है। इसके माध्यम से केवल तकनीकी स्टार्टअप्स ही नहीं, बल्कि किसान उत्पादक कंपनियों (FPCs) और अनुसंधानकर्ताओं को भी एक साझा मंच मिला है। पात्रता के लिए स्टार्टअप का पांच वर्ष से कम पुराना होना और वार्षिक टर्नओवर 10 करोड़ रुपये से अधिक नहीं होना अनिवार्य है। साथ ही, 17 से 75 वर्ष तक के उद्यमियों की भागीदारी यह प्रदर्शित करती है कि कृषि निर्यात में नवाचार किसी एक आयु वर्ग तक सीमित नहीं है।
कार्यक्रम की कार्यप्रणाली और वैश्विक एक्सपोजर
BHARATI के तहत चयनित स्टार्टअप्स को 120 घंटे का सघन प्रशिक्षण प्रदान किया गया, जिसमें निर्यात तत्परता, नियामक अनुपालन, बिजनेस स्केलिंग और निवेशक जुड़ाव जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया। इसके अतिरिक्त, टॉप-परफॉर्मिंग स्टार्टअप्स को गल्फूड 2026 जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना उत्पाद प्रदर्शित करने का अवसर दिया गया है, जो उन्हें सीधे वैश्विक खरीदारों और वितरकों के संपर्क में लाता है। यह कार्यक्रम भारतीय कृषि उत्पादों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक विश्वसनीय और उच्च गुणवत्ता वाले ब्रांड के रूप में स्थापित करने में सहायक सिद्ध होगा।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
नोडल एजेंसी: कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA)।
लक्ष्य: 2030 तक 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर का कृषि निर्यात।
प्रमुख फोकस: स्वच्छता और पादप स्वच्छता (SPS) समाधान और निर्यात-प्रथम दृष्टिकोण।
चयन प्रक्रिया: 700 से अधिक आवेदनों में से प्रथम चरण में 100 स्टार्टअप्स का चयन किया गया।
वैश्विक भागीदारी: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्यात को बढ़ावा देने के लिए दुबई स्थित 'गल्फूड' जैसे आयोजनों को मंच के रूप में चुना गया है।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा डिजिटल भुगतान धोखाधड़ी पर संशोधित मुआवजा ढांचा
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने डिजिटल भुगतान धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों के मद्देनजर अपने मुआवजा ढांचे में व्यापक संशोधन किया है। अब यह ढांचा सोशल इंजीनियरिंग, डिजिटल अरेस्ट और क्रेडेंशियल चोरी जैसी आधुनिक धोखाधड़ी को भी शामिल करता है। इस पहल का उद्देश्य ग्राहकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रति विश्वास को सुदृढ़ करना है।
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने डिजिटल भुगतान धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों के मद्देनजर अपने मुआवजा ढांचे में व्यापक संशोधन किया है। अब यह ढांचा सोशल इंजीनियरिंग, डिजिटल अरेस्ट और क्रेडेंशियल चोरी जैसी आधुनिक धोखाधड़ी को भी शामिल करता है। इस पहल का उद्देश्य ग्राहकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रति विश्वास को सुदृढ़ करना है।
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पृष्ठभूमि और आवश्यकता
वर्ष 2017 में लागू पूर्ववर्ती ढांचा मुख्य रूप से उन अनाधिकृत लेनदेन तक सीमित था जिनमें ग्राहक की कोई भूमिका नहीं होती थी, जैसे कि हैकिंग। हालांकि, डिजिटल परिदृश्य में हुए परिवर्तन के साथ 'सोशल इंजीनियरिंग' (धोखाधड़ी, प्रलोभन या जबरन लेनदेन की स्वीकृति) के मामले तेजी से बढ़े हैं। इस बदलते परिवेश को देखते हुए RBI ने धोखाधड़ी की परिभाषा का विस्तार किया है।
संशोधित दायरे में शामिल प्रमुख बिंदु
नए दिशानिर्देशों के तहत डिजिटल अरेस्ट, ओटीपी (OTP) की धोखाधड़ी से प्राप्ति, बैंकिंग क्रेडेंशियल की चोरी और बैंक की लापरवाही या थर्ड-पार्टी सुरक्षा खामियों के कारण होने वाले लेनदेन को मुआवजे के दायरे में लाया गया है। यह व्यवस्था उन मामलों को भी कवर करती है जहां ग्राहक को प्रताड़ित या मजबूर करके लेनदेन के लिए राजी किया गया हो।
मुआवजा और पात्रता मानदंड
पात्रता के लिए, ग्राहक को घटना के पांच कैलेंडर दिनों के भीतर राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन पर रिपोर्ट करना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, बैंक को निर्धारित समय सीमा के भीतर सूचित करना आवश्यक है। यदि कोई लेनदेन रिपोर्ट करने के बाद होता है, तो उसका पूर्ण रिफंड देय होगा। 50,000 रुपये तक के सकल नुकसान पर, ग्राहक को शुद्ध नुकसान का 85% या 25,000 रुपये (जो भी कम हो) का मुआवजा एक बार के लिए दिया जाएगा। इस राशि का अधिकांश हिस्सा स्वयं RBI द्वारा वहन किया जाएगा, शेष का वितरण संबंधित बैंकों के बीच होगा।
अस्वीकृति की शर्तें और ग्राहक की जिम्मेदारी
मुआवजे का लाभ उन ग्राहकों को नहीं मिलेगा जिन्होंने बैंकों द्वारा जारी धोखाधड़ी संबंधी चेतावनियों की अनदेखी की है। इसके अतिरिक्त, यदि किसी ग्राहक ने अपने मोबाइल नंबर या ईमेल आईडी को बैंक के साथ अपडेट नहीं रखा है, तो इसे ग्राहक की लापरवाही माना जा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप मुआवजे का दावा खारिज किया जा सकता है।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts for Exams)
नोडल एजेंसी: इस तंत्र के लिए प्राथमिक रिपोर्टिंग बिंदु 'राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन' है।
शून्य देयता (Zero Liability): धोखाधड़ी की सूचना बैंक को देने के बाद हुए किसी भी अनाधिकृत लेनदेन के लिए ग्राहक की जिम्मेदारी शून्य होगी।
सोशल इंजीनियरिंग: यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें उपयोगकर्ता को मनोवैज्ञानिक हेरफेर के जरिए गोपनीय जानकारी साझा करने या भुगतान करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
RBI का अधिदेश: यह संशोधन भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम के तहत डिजिटल सुरक्षा को अधिक कठोर बनाने के प्रयास का हिस्सा है।
सावधानी का सिद्धांत: मुआवजा तभी देय है जब ग्राहक ने 'बोनफाइड' (सद्भावपूर्ण) प्रयास किए हों और बैंक के सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया हो।
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