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अष्टलक्ष्मी: भारत की विकास गाथा का नया केंद्र बनता पूर्वोत्तर क्षेत्र

अष्टलक्ष्मी: भारत की विकास गाथा का नया केंद्र बनता पूर्वोत्तर क्षेत्र

Delight News
📅 23 Jun2026

हाल ही में केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर क्षेत्र को भारत की 'अष्टलक्ष्मी' (आठ राज्यों का प्रतीक) बताते हुए 'एक्ट ईस्ट' नीति को 'एक्ट फास्ट' दृष्टिकोण में बदलने की प्रतिबद्धता जताई है। इसका मुख्य उद्देश्य कनेक्टिविटी, बुनियादी ढांचे, सांस्कृतिक एकीकरण और रणनीतिक सुरक्षा को मजबूत कर पूर्वोत्तर को देश के विकास का मुख्य इंजन बनाना है।

अष्टलक्ष्मी: भारत की विकास गाथा का नया केंद्र बनता पूर्वोत्तर क्षेत्र
हाल ही में केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर क्षेत्र को भारत की 'अष्टलक्ष्मी' (आठ राज्यों का प्रतीक) बताते हुए 'एक्ट ईस्ट' नीति को 'एक्ट फास्ट' दृष्टिकोण में बदलने की प्रतिबद्धता जताई है। इसका मुख्य उद्देश्य कनेक्टिविटी, बुनियादी ढांचे, सांस्कृतिक एकीकरण और रणनीतिक सुरक्षा को मजबूत कर पूर्वोत्तर को देश के विकास का मुख्य इंजन बनाना है।
रणनीतिक भौगोलिक स्थिति और अष्टलक्ष्मी की अवधारणा
भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र (NER) आठ राज्यों—अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा से मिलकर बना है। यह क्षेत्र भूटान, चीन, म्यांमार और बांग्लादेश के साथ लगभग 5,300 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों के तहत इन आठ राज्यों को समृद्धि की आठ देवियों यानी 'अष्टलक्ष्मी' के रूप में देखा जा रहा है। यह क्षेत्र 200 से अधिक जनजातीय समूहों और विविध सांस्कृतिक पहचानों के साथ भारत के लिए दक्षिण-पूर्वी एशिया का प्रवेश द्वार है।
'एक्ट ईस्ट' से 'एक्ट फास्ट' का परिवर्तन
सरकार ने नीतिगत सुस्ती को समाप्त करने के लिए 'एक्ट ईस्ट' नीति को 'एक्ट फास्ट' में अपग्रेड किया है। इसके तहत बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की समय-सीमा को आधा करने और बजटीय आवंटन को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। पीएम-देवआइन (PM-DevINE) योजना के माध्यम से पूर्वोत्तर में सामाजिक विकास और आजीविका के साधनों को सीधे वित्तपोषित किया जा रहा है।
बुनियादी ढांचा और कनेक्टिविटी का विस्तार
क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए व्यापक स्तर पर कार्य चल रहा है। राष्ट्रीय राजमार्गों के नेटवर्क का विस्तार, बोगीबील जैसे रणनीतिक पुलों का निर्माण, और असम के साथ-साथ अन्य राज्यों को ब्रॉडगेज रेलवे लाइनों से जोड़ना इसमें शामिल है। इसके अतिरिक्त, 'उड़ान' (UDAN) योजना के तहत नए हवाई अड्डों का विकास और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग तथा कलादान मल्टी-मोडल पारगमन परिवहन परियोजना जैसी अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं के माध्यम से इस क्षेत्र को वैश्विक व्यापार मार्ग पर स्थापित किया जा रहा है।
आंतरिक सुरक्षा और शांति स्थापना
विकास को गति देने के लिए केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र में दशकों पुराने उग्रवाद को समाप्त करने की दिशा में ऐतिहासिक शांति समझौते किए हैं, जैसे बोडो शांति समझौता और कार्बी आंगलोंग समझौता। सुरक्षा स्थिति में सुधार के कारण असम, नागालैंड और मणिपुर के कई हिस्सों से सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) को आंशिक रूप से हटा लिया गया है, जिससे निवेश के लिए एक अनुकूल और सुरक्षित माहौल तैयार हुआ है।
परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts for Competitive Exams)
भौगोलिक तथ्य: सिक्किम को वर्ष 2002 में पूर्वोत्तर परिषद (NEC) के आठवें सदस्य के रूप में शामिल किया गया था। सिक्किम को पूर्वोत्तर के 'सात बहनों' (Seven Sisters) का 'एकमात्र भाई' भी कहा जाता है।
संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान की छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के लिए स्वायत्त जिला परिषदों (ADCs) के माध्यम से विशेष प्रशासनिक सुरक्षा प्रदान करती है।
रणनीतिक गलियारा: पूर्वोत्तर क्षेत्र मुख्य भूमि भारत से 'सिलिगुड़ी कॉरिडोर' के माध्यम से जुड़ता है, जिसे 'चिकन नेक' (Chicken's Neck) भी कहा जाता है। यह रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है।
प्रमुख विकास योजनाएं: PM-DevINE (Prime Minister’s Development Initiative for North Eastern Region) योजना पूरी तरह से केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसे शत-प्रतिशत केंद्रीय वित्तपोषण प्राप्त है।
अंतरराष्ट्रीय सीमाएं: अरुणाचल प्रदेश तीन देशों (भूटान, चीन, म्यांमार) के साथ सीमा साझा करता है, जबकि त्रिपुरा तीन तरफ से बांग्लादेश से घिरा हुआ है।
भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र: वैश्विक महत्वाकांक्षा, आत्मनिर्भरता और $45 बिलियन की अर्थव्यवस्था का रोडमैप

भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र: वैश्विक महत्वाकांक्षा, आत्मनिर्भरता और $45 बिलियन की अर्थव्यवस्था का रोडमैप

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📅 23 Jun2026

पिछले एक दशक में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम राष्ट्रीय संप्रभुता और तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनकर उभरा है। वर्तमान में $8 बिलियन मूल्य वाली भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की वैश्विक हिस्सेदारी 2–3% है, जिसे वर्ष 2030 तक 8% और अगले दशक में $40-45 बिलियन तक पहुंचाने का रणनीतिक लक्ष्य रखा गया है।

भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र: वैश्विक महत्वाकांक्षा, आत्मनिर्भरता और $45 बिलियन की अर्थव्यवस्था का रोडमैप
खबर का निचोड़
पिछले एक दशक में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम राष्ट्रीय संप्रभुता और तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनकर उभरा है। वर्तमान में $8 बिलियन मूल्य वाली भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की वैश्विक हिस्सेदारी 2–3% है, जिसे वर्ष 2030 तक 8% और अगले दशक में $40-45 बिलियन तक पहुंचाने का रणनीतिक लक्ष्य रखा गया है।
विस्तृत विश्लेषण
अंतरिक्ष क्षेत्र का निजीकरण और नीतिगत सुधार
भारत सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए ऐतिहासिक सुधार किए हैं। 'भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023' (Indian Space Policy 2023) के तहत गैर-सरकारी संस्थाओं (NGEs) को एंड-टू-एंड अंतरिक्ष गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) मानदंडों को उदार बनाते हुए उपग्रह निर्माण में 74%, लॉन्च वाहनों में 49% और उपग्रह घटकों के निर्माण में 100% तक ऑटोमैटिक रूट के तहत निवेश की अनुमति दी गई है।
इन-स्पेस और न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड की भूमिका
अंतरिक्ष विभाग (DoS) के तहत 'इन-स्पेस' (IN-SPACe) को एक एकल खिड़की नोडल एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया है, जो निजी क्षेत्र और इसरो (ISRO) के बीच एक सेतु का कार्य करती है। वहीं, इसरो की वाणिज्यिक शाखा 'न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड' (NSIL) घरेलू स्तर पर विकसित अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के व्यावसायिक हस्तांतरण और वैश्विक स्तर पर वाणिज्यिक लॉन्च सेवाओं के विपणन को संभाल रही है, जिससे भारत एक प्रमुख कमर्शियल लॉन्च हब बन गया है।
आगामी महत्वाकांक्षी मिशन और भविष्य का रोडमैप
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब केवल उपग्रह प्रक्षेपण तक सीमित नहीं है। 'गगनयान मिशन' के माध्यम से भारत अपने पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान की तैयारी कर रहा है। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2035 तक 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' (BAS) की स्थापना और वर्ष 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को भेजने का दीर्घकालिक विजन तैयार किया गया है। 'चंद्रयान-3' और 'आदित्य-एल1' की सफलताओं ने इस वैश्विक महत्वाकांक्षा को और सुदृढ़ किया है।
परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण तथ्य (Exam-Oriented Facts)
बाजार हिस्सेदारी और लक्ष्य: वर्तमान में वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2-3% है, जिसे 2030 तक बढ़ाकर 8% करने का लक्ष्य रखा गया है।
एफडीआई (FDI) सीमा: अंतरिक्ष क्षेत्र में नए एफडीआई नियमों के तहत उपग्रह उप-प्रणालियों के लिए 100%, उपग्रह स्थापना और संचालन के लिए 74% तथा प्रक्षेपण वाहनों (Launch Vehicles) के लिए 49% तक स्वचालित मार्ग (Automatic Route) की अनुमति है।
IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र): यह अंतरिक्ष विभाग के तहत एक स्वायत्त नोडल एजेंसी है, जिसका मुख्यालय अहमदाबाद, गुजरात में है।
महत्वपूर्ण विजन वर्ष: भारत का लक्ष्य 2035 तक अपना स्वयं का अंतरिक्ष स्टेशन (भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन) स्थापित करना और 2040 तक चंद्रमा पर मानव भेजना है।
भारत के सांख्यिकीय डेटाबेस में सुधार: आर्थिक संकेतकों का आधुनिकीकरण

भारत के सांख्यिकीय डेटाबेस में सुधार: आर्थिक संकेतकों का आधुनिकीकरण

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📅 23 Jun2026

भारत सरकार ने देश के प्रमुख आर्थिक संकेतकों के आधार वर्ष (Base Year), कार्यप्रणाली और कवरेज में व्यापक बदलाव करते हुए सांख्यिकीय डेटाबेस के आधुनिकीकरण की शुरुआत की है। यह कदम राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी की गुणवत्ता पर आईएमएफ (IMF) की चिंताओं को दूर करने और भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक एवं समकालीन तस्वीर पेश करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

भारत के सांख्यिकीय डेटाबेस में सुधार: आर्थिक संकेतकों का आधुनिकीकरण
खबर का निचोड़
भारत सरकार ने देश के प्रमुख आर्थिक संकेतकों के आधार वर्ष (Base Year), कार्यप्रणाली और कवरेज में व्यापक बदलाव करते हुए सांख्यिकीय डेटाबेस के आधुनिकीकरण की शुरुआत की है। यह कदम राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी की गुणवत्ता पर आईएमएफ (IMF) की चिंताओं को दूर करने और भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक एवं समकालीन तस्वीर पेश करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
विस्तृत विश्लेषण
डेटाबेस में सुधार की तात्कालिक आवश्यकता
हाल के वर्षों में वैश्विक सांख्यिकीय मानकों और भारतीय अर्थव्यवस्था के वास्तविक स्वरूप के बीच अंतर देखा जा रहा था। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी की गुणवत्ता पर उठाए गए सवालों और सांख्यिकीय आंकड़ों के पुराने पड़ चुके आधार वर्ष के कारण यह सुधार अपरिहार्य हो गया था। वर्तमान डिजिटल अर्थव्यवस्था, नए सेवा क्षेत्रों और बदलते उपभोग पैटर्न को पुराने सांख्यिकीय ढांचे में सटीक रूप से शामिल नहीं किया पा रहा था।
सांख्यिकीय संकेतकों का आधुनिकीकरण और आधार वर्ष में बदलाव
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने सकल घरेलू उत्पाद (GDP), औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) जैसे प्रमुख संकेतकों के आधार वर्ष को अपडेट करने की प्रक्रिया तेज कर दी है। इसके तहत घरेलू उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (HCES) के नवीनतम आंकड़ों को शामिल किया गया है, ताकि महंगाई और विकास दर की गणना समकालीन बाजार वास्तविकताओं के अनुरूप की जा सके। यह बदलाव नीति निर्माताओं को अधिक सटीक और विश्वसनीय आर्थिक डेटा प्रदान करेगा।
कवरेज का विस्तार और तकनीकी समावेशन
नए सांख्यिकीय ढांचे में असंगठित क्षेत्र, गिग इकोनॉमी (Gig Economy) और डिजिटल विनिर्माण जैसे उभरते क्षेत्रों को विशेष रूप से शामिल किया जा रहा है। प्रशासनिक डेटासेट, जैसे कि जीएसटी (GST) पोर्टल, ई-श्रम और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के आंकड़ों का एकीकरण किया जा रहा है। इससे सांख्यिकीय डेटा की आवृत्ति (Frequency) और सटीकता में सुधार होगा, जिससे वास्तविक समय (Real-time) के करीब आर्थिक निर्णय लेना संभव हो सकेगा।
परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण तथ्य
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सांख्यिकीय सुधारों से जुड़े निम्नलिखित प्रशासनिक और तकनीकी तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
मंत्रालय और नोडल एजेंसी: भारत में राष्ट्रीय लेखा, जीडीपी और मुद्रास्फीति के आंकड़ों के संकलन की प्राथमिक जिम्मेदारी सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के तहत आने वाले राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (NSO) की है।
सांख्यिकीय सुधारों के लिए समितियां: भारत में सांख्यिकीय प्रणालियों में सुधार और डेटा गुणवत्ता की निगरानी के लिए राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (NSC) और राष्ट्रीय सांख्यिकी पर स्थायी समिति (SCONS) जैसी संस्थाएं कार्य करती हैं।
वैश्विक मानक: भारत आईएमएफ के 'विशेष डेटा प्रसार मानक' (SDDS) का पालन करता है, जो राष्ट्रीय आर्थिक डेटा की पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता है।
महंगाई और राष्ट्रीय आय का आकलन: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य और ईंधन वस्तुओं के भारांक (Weightage) को हालिया उपभोग पैटर्न के आधार पर पुनर्गठित किया जा रहा है, जिससे मौद्रिक नीति निर्माण में सटीकता आएगी।
भारत का सांस्कृतिक कूटनीति विज़न: वैश्विक मंच पर स्थानीय विरासत का प्रदर्शन

भारत का सांस्कृतिक कूटनीति विज़न: वैश्विक मंच पर स्थानीय विरासत का प्रदर्शन

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📅 23 Jun2026

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया फ्रांस और स्लोवाकिया यात्रा के दौरान विदेशी शासनाध्यक्षों को भारत के पारंपरिक और जीआई (GI) प्रमाणित उत्पाद उपहार में दिए गए हैं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य 'लोकल फॉर ग्लोबल' के तहत भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक हस्तशिल्प और क्षेत्रीय विविधताओं को वैश्विक कूटनीति के केंद्र में लाना है।

भारत का सांस्कृतिक कूटनीति विज़न: वैश्विक मंच पर स्थानीय विरासत का प्रदर्शन
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया फ्रांस और स्लोवाकिया यात्रा के दौरान विदेशी शासनाध्यक्षों को भारत के पारंपरिक और जीआई (GI) प्रमाणित उत्पाद उपहार में दिए गए हैं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य 'लोकल फॉर ग्लोबल' के तहत भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक हस्तशिल्प और क्षेत्रीय विविधताओं को वैश्विक कूटनीति के केंद्र में लाना है।
कूटनीति में सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) का महत्व
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सांस्कृतिक कूटनीति 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) को बढ़ावा देने का एक सशक्त माध्यम है। भारत द्वारा विदेशी गणमान्य व्यक्तियों को विशिष्ट क्षेत्रीय उत्पाद उपहार में देना केवल एक औपचारिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि यह देश की विविध कलाकृतियों, ऐतिहासिक धरोहरों और आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करने की एक रणनीतिक कूटनीतिक पहुंच है।
कलमकारी महाभारत पेंटिंग (आंध्र प्रदेश)
कलमकारी आंध्र प्रदेश की एक अत्यंत प्राचीन और अनूठी हस्तशिल्प कला है, जिसमें सूती कपड़े पर प्राकृतिक रंगों और बांस की कलम (Pen) का उपयोग करके हाथ से चित्रकारी की जाती है। हालिया यात्रा में उपहार में दी गई इस पेंटिंग में भारतीय महाकाव्य 'महाभारत' के महत्वपूर्ण दृश्यों को दर्शाया गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कलमकारी कला के दो मुख्य रूप हैं—श्रीकालहस्ती शैली (जिसमें कलम से धार्मिक और पौराणिक चित्र बनाए जाते हैं) और मछलीपट्टनम शैली (जिसमें ब्लॉक प्रिंटिंग का उपयोग होता है)।
पोचमपल्ली सिल्क स्टोल (तेलंगाना)
तेलंगाना के नलगोंडा जिले के पोचमपल्ली गांव से संबंधित इस हस्तशिल्प को अपनी अनूठी बुनाई शैली के लिए भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त है। पोचमपल्ली को भारत के 'सिल्क सिटी' के रूप में भी जाना जाता है। इस स्टोल के निर्माण में पारंपरिक 'इकत' (Ikat) प्रतिरोध रंगाई (Resist-Dyeing) तकनीक का उपयोग किया जाता है, जहां बुनाई से पहले धागों को एक विशेष ज्यामितीय और फूलों के पैटर्न में रंगा जाता है। यह उत्पाद भारत की उत्कृष्ट कारीगरी और वस्त्र उद्योग की समृद्ध परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।
लकाडोंग हल्दी और ठेकुआ (मेघालय और बिहार)
मेघालय की जयंतिया हिल्स में उगाई जाने वाली लकाडोंग हल्दी को दुनिया की सबसे बेहतरीन हल्दियों में से एक माना जाता है, क्योंकि इसमें करक्यूमिन (Curcumin) की मात्रा सामान्य हल्दी की तुलना में बहुत अधिक (लगभग 7 से 12 प्रतिशत) होती है, जो इसे उच्च औषधीय गुणों से युक्त बनाती है। इसके साथ ही, बिहार के पारंपरिक व्यंजनों में शामिल 'ठेकुआ' को भी इस सूची में स्थान मिला है, जो मुख्य रूप से छठ पूजा के दौरान प्रसाद के रूप में बनाया जाता है। यह भारत की कृषि-विविधता और स्थानीय खाद्य संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने का प्रयास है।
राखीगढ़ी से मिले मानव कंकाल: सिंधु-सरस्वती सभ्यता के रहस्यों पर बड़ा वैज्ञानिक अनुसंधान

राखीगढ़ी से मिले मानव कंकाल: सिंधु-सरस्वती सभ्यता के रहस्यों पर बड़ा वैज्ञानिक अनुसंधान

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📅 22 Jun2026

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने हरियाणा के राखीगढ़ी (टीला संख्या 7) से हाल ही में खोजे गए प्राचीन मानव कंकालों को विस्तृत वैज्ञानिक जांच के लिए भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (AnSI) को सौंप दिया है। हालिया समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत किया गया यह हस्तांतरण सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लोगों के जीवन, आहार और आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) को समझने में मील का पत्थर साबित होगा।

राखीगढ़ी से मिले मानव कंकाल: सिंधु-सरस्वती सभ्यता के रहस्यों पर बड़ा वैज्ञानिक अनुसंधान
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने हरियाणा के राखीगढ़ी (टीला संख्या 7) से हाल ही में खोजे गए प्राचीन मानव कंकालों को विस्तृत वैज्ञानिक जांच के लिए भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (AnSI) को सौंप दिया है। हालिया समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत किया गया यह हस्तांतरण सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लोगों के जीवन, आहार और आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) को समझने में मील का पत्थर साबित होगा।
विस्तृत विश्लेषण
हालिया घटनाक्रम और संस्थागत सहयोग
Greater नोएडा स्थित भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण (ASI) की उत्खनन शाखा-II ने क्षेत्र सत्र 2025-26 के दौरान राखीगढ़ी के टीला संख्या 7 से आठ प्राचीन कब्रों की खोज की है। इनमें से तीन पूर्ण मानव कंकाल और अन्य अवशेषों को कोलकाता स्थित भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (AnSI) की प्राचीन मानव कंकाल भंडार और प्रयोगशाला में स्थानांतरित किया गया है। संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत इन दोनों शीर्ष संस्थानों के बीच हुआ यह सहयोग बहुविषयक (Multidisciplinary) अनुसंधान को बढ़ावा देगा।
राखीगढ़ी का ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व
हरियाणा के हिसार जिले में घग्गर-हाकरा नदी घाटी (प्राचीन सरस्वती नदी) में स्थित राखीगढ़ी लगभग 550 हेक्टेयर में फैला है। यह सिंधु-सरस्वती सभ्यता का सबसे बड़ा ज्ञात शहरी केंद्र और बस्ती है, जो आकार में मोहनजोदड़ो से भी बड़ा है। यहाँ से प्रारंभिक हड़प्पा काल से लेकर परिपक्व हड़प्पा काल तक के निरंतर बसावट के साक्ष्य मिलते हैं, जो इसकी दीर्घकालिक ऐतिहासिक प्रासंगिकता को दर्शाते हैं।
पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त साक्ष्य
राखीगढ़ी के उत्खनन से एक सुव्यवस्थित और नियोजित नगरीय विन्यास का पता चलता है। यहाँ से उत्कृष्ट जल निकासी व्यवस्था, पक्की ईंटों के मकान, शिल्प उत्पादन केंद्र, और व्यापक व्यापार नेटवर्क के प्रमाण मिले हैं। टीला संख्या 7, जिसे विशेष रूप से कब्रिस्तान (Burial Ground) के रूप में पहचाना गया है, प्राचीन अंतिम संस्कार की रीतियों और सामाजिक संरचना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वैज्ञानिक अनुसंधान के प्रमुख आयाम
भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (AnSI) इन कंकालों पर अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का अनुप्रयोग करेगा। इसके तहत प्राचीन डीएनए (aDNA) विश्लेषण, क्रैनियोफेशियल रिकंस्ट्रक्शन (चेहरे की संरचना का पुनर्निर्माण), और आइसोटोप विश्लेषण किया जाएगा। इससे प्राचीन निवासियों के स्वास्थ्य, पोषण, बीमारियों के पैटर्न, प्रवास (Migration) और समकालीन आबादी के साथ उनके आनुवंशिक संबंधों के बारे में प्रामाणिक डेटा प्राप्त हो सकेगा।
परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण तथ्य (Exam-Oriented Facts)
भौगोलिक स्थिति: राखीगढ़ी भारत के हरियाणा राज्य के हिसार जिले में स्थित है। यह स्थल घग्गर-हाकरा नदी तंत्र के क्षेत्र में आता है।
आकार और विस्तार: लगभग 550 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तृत राखीगढ़ी को भारतीय उपमहाद्वीप में सिंधु-सरस्वती सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल माना जाता है।
खोज और उत्खनन: इस स्थल की प्रारंभिक खोज अमरेंद्र नाथ द्वारा की गई थी, और बाद में डेक्कन कॉलेज के प्रोफेसर वसंत शिंदे और हाल के वर्षों में एएसआई द्वारा इसका विस्तृत उत्खनन किया गया।
टीला संख्या 7 का महत्व: यह क्षेत्र विशेष रूप से राखीगढ़ी का कब्रिस्तान (Necropolis) है, जहाँ से पहले भी प्रेमी जोड़े (Couple Burial) और अब 2025-26 में आठ नई कब्रें और तीन पूर्ण कंकाल मिले हैं।
संबंधित संस्थान: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (AnSI) दोनों ही भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत काम करते हैं। AnSI का मुख्यालय कोलकाता में स्थित है।
वैज्ञानिक तकनीकें: प्राचीन कंकालों के अध्ययन में डीएनए निष्कर्षण के लिए कान की पेट्रस हड्डी (Petrus Bone) का उपयोग सबसे सटीक माना जाता है, जिससे प्राचीन जीनोम अनुक्रमण (Genome Sequencing) संभव होता है।

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