
भारत बना वैश्विक जहाज पुनर्चक्रण में शीर्ष देश: एक विश्लेषण
वर्ष 2025-26 के नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत वैश्विक जहाज पुनर्चक्रण (Ship Recycling) उद्योग में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया है। गुजरात का अलंग (Alang) दुनिया का सबसे बड़ा जहाज पुनर्चक्रण यार्ड बनकर उभरा है। भारत ने हांगकांग अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन के मानकों को अपनाकर पर्यावरण-अनुकूल और सुरक्षित पुनर्चक्रण में यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है।
खबर का निचोड़ (Summary)
वर्ष 2025-26 के नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत वैश्विक जहाज पुनर्चक्रण (Ship Recycling) उद्योग में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया है। गुजरात का अलंग (Alang) दुनिया का सबसे बड़ा जहाज पुनर्चक्रण यार्ड बनकर उभरा है। भारत ने हांगकांग अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन के मानकों को अपनाकर पर्यावरण-अनुकूल और सुरक्षित पुनर्चक्रण में यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis)
वैश्विक जहाज पुनर्चक्रण में भारत की स्थिति
भारत वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा जहाज पुनर्चक्रण देश बन गया है, जो वैश्विक स्तर पर स्क्रैप किए जाने वाले जहाजों के एक महत्वपूर्ण हिस्से का प्रबंधन करता है। देश में जहाज पुनर्चक्रण उद्योग मुख्य रूप से गुजरात के भावनगर जिले में स्थित अलंग-सोसिया यार्ड में केंद्रित है। केंद्र सरकार की नीतियों और अवसंरचनात्मक सुधारों के कारण भारत ने पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों जैसे बांग्लादेश और पाकिस्तान को पीछे छोड़ते हुए बाजार हिस्सेदारी में शीर्ष स्थान हासिल किया है।
वैधानिक और नीतिगत ढांचा
भारत के जहाज पुनर्चक्रण उद्योग की इस सफलता के पीछे 'जहाज पुनर्चक्रण अधिनियम, 2019' (Ship Recycling Act, 2019) की केंद्रीय भूमिका है। इस अधिनियम के तहत भारत ने 'मलबे के सुरक्षित और पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल पुनर्चक्रण के लिए हांगकांग अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन' (Hong Kong International Convention - HKC) की पुष्टि की है। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय द्वारा सागरमाला परियोजना के तहत रीसाइक्लिंग यार्डों के आधुनिकीकरण के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।
अलंग यार्ड का कायाकल्प और ग्रीन शिप रीसाइक्लिंग
अलंग-सोसिया में स्थित अधिकांश रीसाइक्लिंग यार्ड्स को अब 'ग्रीन रीसाइक्लिंग' (Green Recycling) मानकों के तहत अपग्रेड किया जा चुका है। इन यार्ड्स को प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण सोसायटियों से 'स्टेटमेंट ऑफ कम्प्लायंस' (SoC) प्राप्त हुआ है। इसके तहत जहाजों को काटने से पहले उनमें मौजूद खतरनाक कचरे, जैसे अभ्रक (Asbestos), भारी धातुएं और ओजोन क्षयकारी पदार्थों का सुरक्षित निस्तारण सुनिश्चित किया जाता है, जिससे श्रमिकों की सुरक्षा और तटीय पर्यावरण का संरक्षण होता है।
आर्थिक और रणनीतिक महत्व
जहाज पुनर्चक्रण उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था में दोहरे लाभ की स्थिति पैदा करता है। पहला, यह घरेलू इस्पात उद्योग को भारी मात्रा में द्वितीयक स्क्रैप स्टील (Secondary Scrap Steel) उपलब्ध कराता है, जिससे कच्चे लौह अयस्क और कोयले पर निर्भरता कम होती है। दूसरा, यह क्षेत्र तटीय क्षेत्रों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों रोजगार के अवसर पैदा करता है, जो 'आत्मनिर्भर भारत' और 'सर्कुलर इकोनॉमी' (Circular Economy) के दृष्टिकोण को सुदृढ़ करता है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Facts for UPSC/SSC)
शीर्ष स्थान: भारत वर्तमान में कुल वैश्विक जहाजों के टन भार (Gross Tonnage) के पुनर्चक्रण के मामले में दुनिया में पहले स्थान पर है।
प्रमुख हब: गुजरात का अलंग-सोसिया (Alang-Soshiya) तट विश्व का सबसे बड़ा जहाज पुनर्चक्रण क्लस्टर है।
हांगकांग कन्वेंशन (HKC): यह जहाजों के सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल पुनर्चक्रण के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) द्वारा 2009 में अपनाया गया एक समझौता है। भारत इसका अनुपालन करने वाला प्रमुख राष्ट्र है।
नियामक कानून: भारत में 'जहाज पुनर्चक्रण अधिनियम, 2019' इस पूरे उद्योग को संचालित और विनियमित करता है।
राष्ट्रीय प्राधिकरण: जहाजरानी महानिदेशालय (DG Shipping) को भारत में जहाज पुनर्चक्रण के लिए सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राधिकरण मनोनीत किया गया है।

अमोनिया गैस रिसाव: औद्योगिक उपयोग, पर्यावरणीय प्रभाव और सुरक्षा चुनौतियां
हाल ही में तमिलनाडु के तिरुवल्लुर जिले में एक निजी सीफूड प्रसंस्करण इकाई में अमोनिया गैस (NH_3) के रिसाव के कारण कई श्रमिक बीमार हो गए, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर औद्योगिक सुरक्षा मानकों, अमोनिया के रासायनिक गुणों और इसके मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को चर्चा में ला दिया है।
हाल ही में तमिलनाडु के तिरुवल्लुर जिले में एक निजी सीफूड प्रसंस्करण इकाई में अमोनिया गैस (NH_3) के रिसाव के कारण कई श्रमिक बीमार हो गए, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर औद्योगिक सुरक्षा मानकों, अमोनिया के रासायनिक गुणों और इसके मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को चर्चा में ला दिया है।
अमोनिया का रासायनिक परिचय और उत्पादन
अमोनिया (NH_3) एक तीखी, दम घोंटने वाली गंध वाली रंगहीन गैस है। यह नाइट्रोजन और हाइड्रोजन से बना एक सरल अकार्बनिक यौगिक है। प्राकृतिक रूप से यह कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के दौरान सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न होती है। औद्योगिक स्तर पर, इसे 'हैबर-बॉश प्रक्रिया' (Haber-Bosch Process) द्वारा निर्मित किया जाता है, जिसमें उच्च तापमान और दबाव पर आयरन उत्प्रेरक (Iron Catalyst) की उपस्थिति में वायुमंडलीय नाइट्रोजन की प्रतिक्रिया हाइड्रोजन से कराई जाती है।
प्रमुख औद्योगिक और कृषि अनुप्रयोग
वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर अमोनिया का सबसे बड़ा उपयोग उर्वरक उद्योग में होता है। उत्पादित होने वाली लगभग 80% से अधिक अमोनिया का उपयोग यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट और अमोनियम फॉस्फेट जैसे नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों को बनाने में किया जाता है। इसके अतिरिक्त, अपनी उच्च शीतलन दक्षता (Cooling Efficiency) के कारण, इसका उपयोग खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) उद्योगों, कोल्ड स्टोरेज और सीफूड एक्सपोर्ट इकाइयों में रेफ्रिजरेंट (प्रशीतक) के रूप में बड़े पैमाने पर किया जाता है।
मानव स्वास्थ्य पर अमोनिया का प्रभाव
अमोनिया गैस पानी में अत्यधिक घुलनशील होती है। मानव शरीर के संपर्क में आने पर, यह त्वचा, आंखों और श्वसन तंत्र में मौजूद नमी के साथ प्रतिक्रिया करके अत्यधिक संक्षारक अमोनियम हाइड्रॉक्साइड बनाती है। इसके प्रभाव से आंखों में तेज जलन, अंधापन, गले में सूजन और सांस लेने में गंभीर रुकावट आ सकती है। उच्च सांद्रता में इसके संपर्क में आने से फेफड़ों में पानी भर सकता है (पल्मोनरी एडिमा) और दम घुटने से मृत्यु भी हो सकती है।
सुरक्षा मानक और विनियामक ढांचा
भारत में अमोनिया जैसी खतरनाक गैसों के भंडारण, निर्माण और आयात को 'खतरनाक रसायन निर्माण, भंडारण और आयात नियम, 1989' के तहत विनियमित किया जाता है। कारखानों में रासायनिक दुर्घटनाओं को रोकने के लिए 'कारखाना अधिनियम, 1948' के तहत सख्त गाइडलाइंस तय की गई हैं। औद्योगिक इकाइयों के लिए नियमित सुरक्षा ऑडिट, रिसाव डिटेक्शन सिस्टम और श्रमिकों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) की उपलब्धता अनिवार्य है।
> परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Facts for Exam):
> रासायनिक सूत्र: NH_3 (हवा से हल्की गैस)।
> उत्पादन विधि: हैबर-बॉश प्रक्रिया (Haber-Bosch Process)।
> प्रकृति: अत्यधिक क्षारीय और पानी में अत्यधिक घुलनशील।
> संबंधित नोडल मंत्रालय: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) तथा रसायन और उर्वरक मंत्रालय।
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अमोनिया गैस रिसाव: औद्योगिक उपयोग, पर्यावरणीय प्रभाव और सुरक्षा चुनौतियां
हाल ही में तमिलनाडु के तिरुवल्लुर जिले में एक निजी सीफूड प्रसंस्करण इकाई में अमोनिया गैस (NH_3) के रिसाव के कारण कई श्रमिक बीमार हो गए, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर औद्योगिक सुरक्षा मानकों, अमोनिया के रासायनिक गुणों और इसके मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को चर्चा में ला दिया है।
हाल ही में तमिलनाडु के तिरुवल्लुर जिले में एक निजी सीफूड प्रसंस्करण इकाई में अमोनिया गैस (NH_3) के रिसाव के कारण कई श्रमिक बीमार हो गए, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर औद्योगिक सुरक्षा मानकों, अमोनिया के रासायनिक गुणों और इसके मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को चर्चा में ला दिया है।
अमोनिया का रासायनिक परिचय और उत्पादन
अमोनिया (NH_3) एक तीखी, दम घोंटने वाली गंध वाली रंगहीन गैस है। यह नाइट्रोजन और हाइड्रोजन से बना एक सरल अकार्बनिक यौगिक है। प्राकृतिक रूप से यह कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के दौरान सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न होती है। औद्योगिक स्तर पर, इसे 'हैबर-बॉश प्रक्रिया' (Haber-Bosch Process) द्वारा निर्मित किया जाता है, जिसमें उच्च तापमान और दबाव पर आयरन उत्प्रेरक (Iron Catalyst) की उपस्थिति में वायुमंडलीय नाइट्रोजन की प्रतिक्रिया हाइड्रोजन से कराई जाती है।
प्रमुख औद्योगिक और कृषि अनुप्रयोग
वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर अमोनिया का सबसे बड़ा उपयोग उर्वरक उद्योग में होता है। उत्पादित होने वाली लगभग 80% से अधिक अमोनिया का उपयोग यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट और अमोनियम फॉस्फेट जैसे नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों को बनाने में किया जाता है। इसके अतिरिक्त, अपनी उच्च शीतलन दक्षता (Cooling Efficiency) के कारण, इसका उपयोग खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) उद्योगों, कोल्ड स्टोरेज और सीफूड एक्सपोर्ट इकाइयों में रेफ्रिजरेंट (प्रशीतक) के रूप में बड़े पैमाने पर किया जाता है।
मानव स्वास्थ्य पर अमोनिया का प्रभाव
अमोनिया गैस पानी में अत्यधिक घुलनशील होती है। मानव शरीर के संपर्क में आने पर, यह त्वचा, आंखों और श्वसन तंत्र में मौजूद नमी के साथ प्रतिक्रिया करके अत्यधिक संक्षारक अमोनियम हाइड्रॉक्साइड बनाती है। इसके प्रभाव से आंखों में तेज जलन, अंधापन, गले में सूजन और सांस लेने में गंभीर रुकावट आ सकती है। उच्च सांद्रता में इसके संपर्क में आने से फेफड़ों में पानी भर सकता है (पल्मोनरी एडिमा) और दम घुटने से मृत्यु भी हो सकती है।
सुरक्षा मानक और विनियामक ढांचा
भारत में अमोनिया जैसी खतरनाक गैसों के भंडारण, निर्माण और आयात को 'खतरनाक रसायन निर्माण, भंडारण और आयात नियम, 1989' के तहत विनियमित किया जाता है। कारखानों में रासायनिक दुर्घटनाओं को रोकने के लिए 'कारखाना अधिनियम, 1948' के तहत सख्त गाइडलाइंस तय की गई हैं। औद्योगिक इकाइयों के लिए नियमित सुरक्षा ऑडिट, रिसाव डिटेक्शन सिस्टम और श्रमिकों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) की उपलब्धता अनिवार्य है।
> परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Facts for Exam):
> रासायनिक सूत्र: NH_3 (हवा से हल्की गैस)।
> उत्पादन विधि: हैबर-बॉश प्रक्रिया (Haber-Bosch Process)।
> प्रकृति: अत्यधिक क्षारीय और पानी में अत्यधिक घुलनशील।
> संबंधित नोडल मंत्रालय: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) तथा रसायन और उर्वरक मंत्रालय।
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वैश्विक खाद्य संकट: 13 'हॉटस्पॉट' में तीव्र भुखमरी बढ़ने की चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसियों (FAO और WFP) ने एक संयुक्त रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि संघर्ष, जलवायु आघातों और अभूतपूर्व फंडिंग की कमी के कारण दुनिया के 13 प्रमुख संकटग्रस्त क्षेत्रों (हॉटस्पॉट्स) में तीव्र खाद्य असुरक्षा और बदतर होने वाली है। वर्तमान में लगभग 26.6 करोड़ लोग उच्च स्तरीय तीव्र भूख का सामना कर रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसियों (FAO और WFP) ने एक संयुक्त रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि संघर्ष, जलवायु आघातों और अभूतपूर्व फंडिंग की कमी के कारण दुनिया के 13 प्रमुख संकटग्रस्त क्षेत्रों (हॉटस्पॉट्स) में तीव्र खाद्य असुरक्षा और बदतर होने वाली है। वर्तमान में लगभग 26.6 करोड़ लोग उच्च स्तरीय तीव्र भूख का सामना कर रहे हैं।
विस्तृत विश्लेषण
संकट के प्रमुख केंद्र और वर्गीकरण
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर खाद्य संकट अत्यंत गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है। सूडान, दक्षिण सूडान, यमन और फिलिस्तीन (गाजा) को 'उच्चतम चिंता वाले देशों' की श्रेणी में रखा गया है, जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही अकाल जैसी स्थितियों का सामना कर रहा है। इसके अतिरिक्त, नाइजीरिया और सोमालिया में बढ़ते अकाल के खतरों को देखते हुए इन्हें भी इस उच्च-जोखिम वाली सूची में शामिल कर दिया गया है। इन क्षेत्रों में भूख की स्थिति जीवन के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है।
खाद्य असुरक्षा के मुख्य कारण
इस तीव्र भुखमरी के पीछे तीन मुख्य कारक काम कर रहे हैं: निरंतर जारी सशस्त्र संघर्ष, चरम जलवायु घटनाएं (जैसे सूखा और बाढ़), तथा आर्थिक अस्थिरता। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के क्षेत्रीय प्रभाव और पूर्वी कांगो में इबोला जैसी महामारियों के प्रकोप ने स्थानीय आजीविका और सहायता आपूर्ति लाइनों को पूरी तरह से बाधित कर दिया है। इसके अलावा, बार-बार आने वाले जलवायु झटके कृषि उत्पादन को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
फंडिंग में भारी कटौती और मानवीय सहायता में बाधा
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू मानवीय सहायता के लिए मिलने वाले बजट में आई भारी गिरावट है। वर्ष 2022 की तुलना में खाद्य सहायता के वित्तपोषण (Funding) में लगभग 60 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। एक तरफ जहां मानवीय सहायता की आवश्यकताएं अपने रिकॉर्ड स्तर पर हैं, वहीं दूसरी तरफ बजट की इस भारी कमी के कारण सहायता एजेंसियों को मजबूरन अपने संकटकालीन राहत अभियानों में कटौती करनी पड़ रही है।
परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण संभावित तथ्य
एफएओ (FAO) और डब्ल्यूएफपी (WFP): खाद्य और कृषि संगठन (FAO) का मुख्यालय रोम, इटली में है और यह UN की एक विशेष एजेंसी है। विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय संगठन है जो भूख उन्मूलन पर केंद्रित है, इसका मुख्यालय भी रोम में है।
एकीकृत खाद्य सुरक्षा चरण वर्गीकरण (IPC): खाद्य असुरक्षा की गंभीरता को मापने के लिए IPC स्केल का उपयोग किया जाता है, जिसमें चरण 5 (Phase 5) 'अकाल/तबाही' (Famine/Catastrophe) को दर्शाता है।
सतत विकास लक्ष्य (SDG 2): यह रिपोर्ट सतत विकास लक्ष्य-2 यानी 'जीरो हंगर' (Zero Hunger) को 2030 तक प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ी चुनौती को रेखांकित करती है।
भू-राजनीतिक प्रभाव: सूडान में आंतरिक सैन्य संघर्ष, गाजा में जारी युद्ध और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) में स्वास्थ्य संकट इस भुखमरी के प्राथमिक भू-राजनीतिक चालक हैं।

भारतीय संविधान का प्रथम संशोधन: अभिव्यक्ति, समानता और भूमि सुधारों का ऐतिहासिक मोड़
18 जून 1951 को लागू हुआ प्रथम संविधान संशोधन स्वतंत्र भारत के संवैधानिक इतिहास की एक युगांतरकारी घटना है। इसने देश के पहले आम चुनाव से पहले ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और संपत्ति के अधिकार के दायरे को सीमित करते हुए न्यायिक समीक्षा से कानूनों को बचाने के लिए नौवीं अनुसूची जैसी नई व्यवस्थाओं को जन्म दिया।
18 जून 1951 को लागू हुआ प्रथम संविधान संशोधन स्वतंत्र भारत के संवैधानिक इतिहास की एक युगांतरकारी घटना है। इसने देश के पहले आम चुनाव से पहले ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और संपत्ति के अधिकार के दायरे को सीमित करते हुए न्यायिक समीक्षा से कानूनों को बचाने के लिए नौवीं अनुसूची जैसी नई व्यवस्थाओं को जन्म दिया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संशोधन की आवश्यकता
वर्ष 1950 में संविधान लागू होने के तुरंत बाद, सरकार के सामाजिक-आर्थिक सुधारों विशेषकर जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार कानूनों को अदालतों में कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कामेश्वर सिंह बनाम बिहार राज्य जैसे मामलों में उच्च न्यायालयों ने भूमि सुधारों को संपत्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन मानकर अमान्य घोषित कर दिया। इसके अतिरिक्त, रमेश थापर बनाम मद्रास राज्य मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोक व्यवस्था (पब्लिक ऑर्डर) के बीच टकराव खुलकर सामने आया। इन न्यायिक गतिरोधों को दूर करने और कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए तत्कालीन अंतरिम संसद को यह पहला संशोधन लाना पड़ा।
मौलिक अधिकारों पर 'युक्तियुक्त निर्बंधन'
इस संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 19(2) का दायरा व्यापक किया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर राज्य को नियंत्रण लगाने के लिए तीन नए आधार जोड़े गए: लोक व्यवस्था (Public Order), विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध और किसी अपराध के लिए उकसाना (Incitement to an offence)। इसके साथ ही 'युक्तियुक्त' (Reasonable) शब्द जोड़ा गया, जिसने यह सुनिश्चित किया कि इन प्रतिबंधों की तार्किकता की जांच अदालतें कर सकती हैं।
नौवीं अनुसूची और न्यायिक संरक्षण
संशोधन ने संविधान में अनुच्छेद 31A और 31B को शामिल किया। इसके तहत 'नौवीं अनुसूची' का निर्माण किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य भूमि सुधार और लोक कल्याणकारी कानूनों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर होने वाली न्यायिक समीक्षा से बचाना था। प्रारंभ में इसमें केवल 13 कानून शामिल थे। हालांकि, बाद में आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 24 अप्रैल 1973 (केशवानंद भारती केस का फैसला) के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानून भी न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं हैं यदि वे मूल ढांचे का उल्लंघन करते हैं।
सामाजिक समानता और पिछड़े वर्गों के लिए प्रावधान
मद्रास राज्य बनाम चंपकम दोरैराजन (1951) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद, सरकार ने सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 15(4) को जोड़ा। इस नए प्रावधान ने राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों (SEBCs), अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान या आरक्षण की व्यवस्था करने की शक्ति प्रदान की।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण संभावित तथ्य (Prelims & Mains Facts)
ऐतिहासिक संदर्भ: प्रथम संशोधन अधिनियम, 1951 को अंतरिम संसद द्वारा पारित किया गया था, क्योंकि भारत के पहले आम चुनाव और द्विसदनीय संसद का गठन 1952 में हुआ था।
नए अनुच्छेदों का समावेश: इस संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 15(4), 19(2) में संशोधन, 31A, 31B और नौवीं अनुसूची को जोड़ा गया था।
संबंधित महत्वपूर्ण वाद: रमेश थापर वाद (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), चंपकम दोरैराजन वाद (समानता का अधिकार/आरक्षण), और कामेश्वर सिंह वाद (भूमि सुधार) सीधे तौर पर इस संशोधन की पृष्ठभूमि से जुड़े हैं।
न्यायिक समीक्षा की सीमा: आई.आर. कोएल्हो वाद (2007) के अनुसार, नौवीं अनुसूची पूर्ण संरक्षण नहीं देती; यदि कोई कानून अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों के मूल दर्शन को नष्ट करता है, तो अदालत उसे रद्द कर सकती है।
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