
ब्रिक्स इंदौर घोषणापत्र: वैश्विक कृषि का नया मार्गदर्शक सिद्धांत
भारत की अध्यक्षता में आयोजित 16वें ब्रिक्स कृषि मंत्रियों के सम्मेलन में सर्वसम्मति से 'इंदौर घोषणापत्र' को अपनाया गया है। यह घोषणापत्र छोटे किसानों, खाद्य सुरक्षा, और जलवायु-अनुकूल कृषि को प्राथमिकता देता है। इसके तहत डिजिटल कृषि और कृषि-पारिस्थितिकी (Agroecology) को बढ़ावा देने के लिए चार नई महत्वपूर्ण संस्थागत पहलों की शुरुआत की गई है, जो वैश्विक खाद्य प्रणाली को मजबूत करेंगी।
खबर का निचोड़ (लगभग 60 शब्द)
भारत की अध्यक्षता में आयोजित 16वें ब्रिक्स कृषि मंत्रियों के सम्मेलन में सर्वसम्मति से 'इंदौर घोषणापत्र' को अपनाया गया है। यह घोषणापत्र छोटे किसानों, खाद्य सुरक्षा, और जलवायु-अनुकूल कृषि को प्राथमिकता देता है। इसके तहत डिजिटल कृषि और कृषि-पारिस्थितिकी (Agroecology) को बढ़ावा देने के लिए चार नई महत्वपूर्ण संस्थागत पहलों की शुरुआत की गई है, जो वैश्विक खाद्य प्रणाली को मजबूत करेंगी।
मुख्य समाचार और उसका महत्व
भारत के इंदौर शहर में 12-13 जून को आयोजित ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की उच्च स्तरीय बैठक के बाद इस नीतिगत दस्तावेज को आधिकारिक रूप से जारी किया गया है। वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, खाद्य असुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों से जूझ रही है, तब यह घोषणापत्र बहुपक्षीय सहयोग का एक नया ढांचा तैयार करता है। यूपीएससी और एसएससी जैसी परीक्षाओं के लिए यह अंतर्राष्ट्रीय संबंध (GS Paper 2) और कृषि व पर्यावरण (GS Paper 3) के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इंदौर घोषणापत्र की प्रमुख विशेषताएं और रणनीतिक बिंदु
इस घोषणापत्र का मुख्य केंद्र बिंदु 'किसान' हैं, विशेषकर छोटे और सीमांत किसान। बैठक में इस बात पर सहमति बनी है कि बिना छोटे किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त किए वैश्विक खाद्य सुरक्षा प्राप्त नहीं की जा सकती। इसके मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:
सतत और जलवायु-अनुकूल कृषि: पारंपरिक खेती के स्थान पर ऐसी तकनीकों को अपनाने पर बल दिया गया है जो पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाएं और सूखे या अत्यधिक बारिश जैसी चरम मौसमी घटनाओं को सहन कर सकें।
पारदर्शी व्यापार प्रणाली: ब्रिक्स देशों ने एक निष्पक्ष, न्यायसंगत, समावेशी और पारदर्शी बहुपक्षीय कृषि व्यापार प्रणाली का समर्थन किया है, ताकि खाद्य पदार्थों की कीमतों में कृत्रिम उतार-चढ़ाव को रोका जा सके।
सीमांत समूहों का सशक्तिकरण: 'छोटे किसान, महिलाएं और युवा' नामक एक विशेष मंत्रिस्तरीय संवाद का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य इन वर्गों को बाजार, वित्त और उन्नत तकनीक तक सीधी पहुंच प्रदान करना है।
चार नई संस्थागत पहलें और उनका कार्य
घोषणापत्र के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए चार दूरगामी पहलों की घोषणा की गई है, जो सीधे तौर पर परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं:
1. एग्रोइकोलॉजी और पुनर्योजी कृषि के लिए उत्कृष्टता केंद्रों का ब्रिक्स नेटवर्क: इसका समन्वय भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)–IIFSR, मोदीपुरम द्वारा किया जाएगा। यह नेटवर्क प्राकृतिक और जैविक खेती पर संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा देगा।
2. डिजिटल कृषि पर ब्रिक्स नेटवर्क: आईआईटी (IIT) दिल्ली के नेतृत्व में यह नेटवर्क आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), भू-स्थानिक प्रौद्योगिकियों और डेटा-संचालित कृषि समाधानों में सहयोग बढ़ाएगा।
3. बीज प्रणालियों में किसानों के अधिकारों पर वैश्विक मंच: इसका समन्वय नई दिल्ली स्थित 'पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण' (PPV&FRA) करेगा। इसका उद्देश्य स्वदेशी बीजों की विविधता और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा करना है।
4. ब्रिक्स एग्रीन (BRICS AgriN): यह नेटवर्क कृषि-इनपुट, आनुवंशिक संसाधनों और सूचनाओं के आदान-प्रदान को मजबूत करेगा, जिससे उन सदस्य देशों को मदद मिलेगी जिनकी पहुंच उन्नत संसाधनों तक सीमित है।
ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज (BRICS Grain Exchange) पर प्रगति
इस बैठक के दौरान 'ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज' की स्थापना को लेकर भी गंभीर चर्चा हुई। इसका उद्देश्य ब्रिक्स देशों के बीच अनाज के सीधे व्यापार को सुगम बनाना है। यदि यह पूर्ण रूप से क्रियान्वित होता है, तो यह वैश्विक अनाज व्यापार में पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती दे सकता है और सदस्य देशों की भू-राजनीतिक स्थिति को मजबूत करेगा।
संभावित चुनौतियां
इस घोषणापत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती वाणिज्यिक बीज बाजार और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) व्यवस्थाओं के बीच संतुलन स्थापित करना है। अंतर्राष्ट्रीय संधियों (जैसे UPOV और ITPGRFA) के साथ किसानों के पारंपरिक अधिकारों का सामंजस्य बिठाना एक जटिल प्रक्रिया होगी, जिसके लिए निरंतर कूटनीतिक संवाद की आवश्यकता है।
परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रश्न 1 (प्रारंभिक परीक्षा - UPSC/SSC): हाल ही में चर्चा में रहा 'इंदौर घोषणापत्र' (Indore Declaration) निम्नलिखित में से किस क्षेत्र से संबंधित है?
(a) शहरी अपशिष्ट प्रबंधन और स्वच्छता
(b) ब्रिक्स देशों द्वारा सतत और डिजिटल कृषि को बढ़ावा देना
(c) डिजिटल डेटा सुरक्षा और साइबर सुरक्षा
(d) नवीकरणीय ऊर्जा के लिए वैश्विक रणनीति
उत्तर: (b)
प्रश्न 2 (मुख्य परीक्षा - UPSC): "जलवायु परिवर्तन के दौर में वैश्विक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए छोटे किसानों को सशक्त करना और डिजिटल तकनीकों को अपनाना अपरिहार्य है।" 16वें ब्रिक्स कृषि मंत्रियों के सम्मेलन में अपनाए गए 'इंदौर घोषणापत्र' के आलोक में इस कथन का विश्लेषण कीजिए।

भारत-फ्रांस 'भारत इनोवेट्स 2026' शिखर सम्मेलन और डीप-टेक गठबंधन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने फ्रांस के नीस (Nice) में आयोजित 'भारत इनोवेट्स 2026' (Bharat Innovates 2026) शिखर सम्मेलन का संयुक्त रूप से उद्घाटन किया है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित यह तीन दिवसीय उच्च-स्तरीय वैश्विक आयोजन भारत और यूरोप के बीच डीप-टेक (Deep Tech), उन्नत कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को एक नए शिखर पर ले जाने के उद्देश्य से शुरू हुआ है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने फ्रांस के नीस (Nice) में आयोजित 'भारत इनोवेट्स 2026' (Bharat Innovates 2026) शिखर सम्मेलन का संयुक्त रूप से उद्घाटन किया है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित यह तीन दिवसीय उच्च-स्तरीय वैश्विक आयोजन भारत और यूरोप के बीच डीप-टेक (Deep Tech), उन्नत कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को एक नए शिखर पर ले जाने के उद्देश्य से शुरू हुआ है।
शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि और रणनीतिक महत्व
'भारत इनोवेट्स 2026' का आयोजन 14 से 16 जून 2026 तक किया जा रहा है। इसका प्राथमिक उद्देश्य भारत के तेजी से बढ़ते डीप-टेक इकोसिस्टम (Deep Tech Ecosystem) को वैश्विक मंच प्रदान करना और भारत-यूरोप के बीच तकनीकी गलियारों को मजबूत करना है। इस वैश्विक सम्मलेन में 120 से अधिक भारतीय नवोन्मेषकों (Innovators), 15 से अधिक उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) और दुनिया भर के लगभग 500 से अधिक हितधारकों (ग्लोबल सीईओ, उद्योग जगत के नेता और उद्यम पूंजीपति) ने भाग लिया है।
इस ऐतिहासिक आयोजन के पहले ही दिन भारत और यूरोपीय देशों के बीच नवाचार-केंद्रित समझौता ज्ञापनों (MoUs) और संयुक्त घोषणाओं सहित 30 से अधिक रणनीतिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। यह पहल भारत की वैश्विक नवाचार नेटवर्क (Global Innovation Network) में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में भूमिका को और अधिक सुदृढ़ करती है।
डीप-टेक और मुख्य तकनीकी क्षेत्रों पर फोकस
इस शिखर सम्मेलन का मुख्य ध्यान 13 महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों पर केंद्रित है। इसमें सबसे प्रमुख निम्नलिखित क्षेत्र शामिल हैं:
उन्नत कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर: भारत ने देश में 'भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0' (ISM 2.0) के तहत वैश्विक चिप मूल्य श्रृंखला (Global Chip Value Chain) में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के रोडमैप को प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच सिलिकॉन कार्बाइड फैब (Silicon Carbide Fab) और उन्नत पैकेजिंग इकाइयों को लेकर तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई।
अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (Space Technology): अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत के बढ़ते स्टार्टअप्स को वैश्विक बाजार और यूरोप के टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड (Technology Adoption Fund) के साथ एकीकृत करने पर सहमति बनी है, जो उन्नत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा देगा।
बायोटेक्नोलॉजी और हेल्थकेयर: जैव-प्रौद्योगिकी में रणनीतिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए 'बायोफार्मा शक्ति' (Biopharma SHAKTI) जैसी पहलों के माध्यम से द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने पर बल दिया गया।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए इन्फोसिस के संस्थापक एन. आर. नारायण मूर्ति ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी तकनीकी उद्यमों के निर्माण में शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों (Academia) की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
भारत और वैश्विक नवाचार सूचकांक पर इसका प्रभाव
यह द्विपक्षीय और बहुपक्षीय डीप-टेक गठबंधन भारत को 'लेट एंट्रेंस' (देर से प्रवेश करने वाले देश) की छवि से बाहर निकालकर एक वैश्विक नवाचार केंद्र (Global Innovation Hub) के रूप में स्थापित कर रहा है। देश में अब तक 2 लाख से अधिक स्टार्टअप्स का एक मजबूत नेटवर्क तैयार हो चुका है, जो इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय तकनीकी हस्तांतरण (Technology Transfer) और निवेश गलियारों के माध्यम से और अधिक सुदृढ़ होगा। फ्रांस के साथ यह 'नवाचार रोडमैप 2030' (Innovation Roadmap 2030) के लक्ष्यों को प्राप्त करने और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।
मुख्य परीक्षा और प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
डीप-टेक (Deep Tech): ऐसी प्रौद्योगिकियां जो महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों या इंजीनियरिंग नवाचारों पर आधारित होती हैं, जैसे एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और बायोटेक।
भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0: इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और विनिर्माण के घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए भारत सरकार की प्रमुख नीति।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति: विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से भारत-फ्रांस और भारत-यूरोपीय संघ (EU) के बीच द्विपक्षीय संबंधों का सुदृढ़ीकरण।
संभावित परीक्षा प्रश्न
प्रश्न 1 (प्रारंभिक परीक्षा हेतु):
हाल ही में समाचारों में रहा 'भारत इनोवेट्स 2026' (Bharat Innovates 2026) शिखर सम्मेलन निम्नलिखित में से किस देश में आयोजित किया गया और इसका प्राथमिक ध्यान किस क्षेत्र पर केंद्रित है?
(A) भारत; डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI)
(B) फ्रांस; डीप-टेक और उन्नत तकनीकी साझेदारी
(C) जर्मनी; हरित और सतत ऊर्जा
(D) ब्रिटेन; कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और साइबर सुरक्षा
उत्तर: (B)
प्रश्न 2 (मुख्य परीक्षा हेतु):
"डीप-टेक (Deep Tech) और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय साझेदारी भारत को वैश्विक नवाचार केंद्र (Global Innovation Hub) बनाने की दिशा में अपरिहार्य है।" हाल ही में आयोजित 'भारत इनोवेट्स 2026' शिखर सम्मेलन के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)

क्रिटिकल मिनरल्स मिशन: रणनीतिक खनिजों पर वैश्विक निर्भरता घटाने की महायोजना
भारत सरकार ने घरेलू स्तर पर लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) के खनन और प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए 'क्रिटिकल मिनरल्स मिशन' के क्रियान्वयन को तेज कर दिया है। यह कदम स्वच्छ ऊर्जा, रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों के लिए रणनीतिक रूप से आवश्यक है। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी आयात पर निर्भरता को कम करना और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाना है, जो आगामी परीक्षाओं के आर्थिक भूगोल, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और सुरक्षा खंड के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
खबर का निचोड़
भारत सरकार ने घरेलू स्तर पर लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) के खनन और प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए 'क्रिटिकल मिनरल्स मिशन' के क्रियान्वयन को तेज कर दिया है। यह कदम स्वच्छ ऊर्जा, रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों के लिए रणनीतिक रूप से आवश्यक है। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी आयात पर निर्भरता को कम करना और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाना है, जो आगामी परीक्षाओं के आर्थिक भूगोल, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और सुरक्षा खंड के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आधुनिक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण खनिजों की भूमिका
लिथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफाइट और दुर्लभ पृथ्वी तत्व (Rare Earth Elements - REEs) जैसे महत्वपूर्ण खनिज आधुनिक और भविष्य की उन्नत तकनीकों की रीढ़ हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरियों से लेकर सौर पैनलों, पवन टर्बाइनों, सेमीकंडक्टर चिप्स और उन्नत रक्षा उपकरणों के निर्माण में इन खनिजों का कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है। वर्तमान में, इन रणनीतिक खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और इनके प्रसंस्करण पर कुछ ही देशों, विशेष रूप से चीन का एकाधिकार है। भारत द्वारा शुरू किया गया यह मिशन इसी भू-राजनीतिक जोखिम को कम करने और देश की विनिर्माण क्षमता को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा नीतिगत कदम है।
मिशन के मुख्य घटक और घरेलू अन्वेषण रणनीतियां
इस मिशन के तहत भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) और खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) को देश के भीतर और बाहर इन रणनीतिक खनिजों की खोज और अधिग्रहण का विशेष जिम्मा सौंपा गया है। घरेलू स्तर पर, जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़, झारखंड और राजस्थान जैसे राज्यों में लिथियम और अन्य दुर्लभ तत्वों के संभावित भंडारों के गहन अन्वेषण और ब्लॉकों की नीलामी प्रक्रिया को काफी सुव्यवस्थित किया गया है। सरकार ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन करके निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया है, ताकि अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से गहरे दबे खनिजों का पर्यावरण-अनुकूल निष्कर्षण सुनिश्चित किया जा सके।
विदेशी अधिग्रहण और खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP)
अपनी घरेलू सीमाओं से परे जाते हुए, भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'खनिज सुरक्षा साझेदारी' (Mineral Security Partnership - MSP) जैसी वैश्विक पहलों में एक रणनीतिक भागीदार के रूप में सक्रिय रूप से शामिल हुआ है। भारत की सरकारी संयुक्त उद्यम कंपनी 'काबिल' (KABIL) ने अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया और चिली जैसे खनिज-समृद्ध देशों में लिथियम और कोबाल्ट की खदानों के दीर्घकालिक अधिग्रहण और संयुक्त अन्वेषण के लिए महत्वपूर्ण व्यावसायिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। यह बहुआयामी रणनीति भारत को भविष्य में किसी भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक तनाव या वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले अचानक व्यवधानों से सुरक्षित रखने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करती है।
आर्थिक, तकनीकी और पर्यावरणीय प्रभाव
यह महत्वाकांक्षी मिशन भारत के 'नेट-जीरो' (Net-Zero) उत्सर्जन लक्ष्यों और आगामी वर्षों में गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने के संकल्प को पूरा करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा। इसके सफल क्रियान्वयन से देश के ऑटोमोबाइल क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों की उत्पादन लागत में भारी कमी आएगी, जिससे हरित परिवहन को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, इस मिशन के सामने पर्यावरणीय मंजूरी में होने वाली देरी, जटिल निष्कर्षण तकनीक और घरेलू रीसाइक्लिंग बुनियादी ढांचे की कमी जैसी कुछ मुख्य चुनौतियां भी मौजूद हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार 'अर्बन माइनिंग' (अर्थात ई-कचरे से मूल्यवान खनिजों का पुनर्चक्रण) और स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास (R&D) को भी इस नीतिगत ढांचे के दायरे में शामिल कर रही है।
परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रश्न 1 (UPSC मुख्य परीक्षा के लिए):
"वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के बीच, 'क्रिटिकल मिनरल्स मिशन' भारत की आर्थिक संप्रभुता और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने में किस प्रकार एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम साबित हो सकता है? विश्लेषण कीजिए।"
प्रश्न 2 (प्रारंभिक परीक्षा / SSC के लिए MCQ):
हाल ही में चर्चा में रहे महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) के संदर्भ में, विदेशों से रणनीतिक खनिजों के अधिग्रहण और अन्वेषण के लिए गठित भारतीय संयुक्त उद्यम कंपनी का क्या नाम है?
(A) राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (NMDC)
(B) खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL)
(C) भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI)
(D) हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL)
उत्तर: (B) खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL)

पीएम-ईबस सेवा योजना: शहरी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का हरित रूपांतरण
आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने देश के 169 शहरों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए 'पीएम-ईबस सेवा' (PM-eBus Sewa) योजना के कार्यान्वयन में तेजी ला दी है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत 10,000 इलेक्ट्रिक बसें संचालित करना है। यह पहल पर्यावरण संरक्षण, वायु प्रदूषण में कमी और टिकाऊ शहरी विकास की दिशा में भारत सरकार का एक बड़ा कदम है, जो आगामी परीक्षाओं के बुनियादी ढांचे, पर्यावरण और सरकारी नीतियों के खंड के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
खबर का निचोड़
आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने देश के 169 शहरों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए 'पीएम-ईबस सेवा' (PM-eBus Sewa) योजना के कार्यान्वयन में तेजी ला दी है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत 10,000 इलेक्ट्रिक बसें संचालित करना है। यह पहल पर्यावरण संरक्षण, वायु प्रदूषण में कमी और टिकाऊ शहरी विकास की दिशा में भारत सरकार का एक बड़ा कदम है, जो आगामी परीक्षाओं के बुनियादी ढांचे, पर्यावरण और सरकारी नीतियों के खंड के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
शहरी परिवहन के आधुनिकीकरण की नई पहल
भारत के बढ़ते शहरीकरण के साथ-साथ शहरों में स्वच्छ, सुरक्षित और विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन की मांग तेजी से बढ़ी है। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने 'पीएम-ईबस सेवा' योजना को प्राथमिकता के आधार पर लागू किया है। वर्तमान में अधिकांश भारतीय शहरों में सार्वजनिक बस सेवाएं या तो अपर्याप्त हैं या पुरानी डीजल बसों पर निर्भर हैं, जो वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण हैं। यह नई योजना न केवल शहरों में परिवहन की कमी को दूर करेगी, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल ई-बसों को बढ़ावा देकर देश के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में भी मदद करेगी।
पीपीपी मॉडल और वित्तीय संरचना
इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता इसका संचालन मॉडल है। इसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के अंतर्गत 'पब्लिक बस ऑपरेशंस' मॉडल पर तैयार किया गया है। इसके तहत निजी क्षेत्र की कंपनियां इन इलेक्ट्रिक बसों की खरीद, संचालन और रखरखाव का जिम्मा संभालेंगी, जबकि राज्य सरकारें या स्थानीय शहरी निकाय उनके परिचालन की निगरानी करेंगे। केंद्र सरकार इस योजना के लिए कुल 57,613 करोड़ रुपये के बजट में से 20,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। यह बजटीय सहायता बसों के संचालन के आधार पर प्रति किलोमीटर के हिसाब से दी जाएगी, जिससे स्थानीय निकायों पर वित्तीय बोझ कम होगा।
लक्षित शहर और बुनियादी ढांचे का विकास
योजना के तहत मुख्य रूप से उन शहरों को प्राथमिकता दी जा रही है जिनकी आबादी 3 लाख से अधिक है और जहां वर्तमान में कोई सुव्यवस्थित बस सेवा उपलब्ध नहीं है। इसमें उत्तर-पूर्वी राज्यों की राजधानियों, केंद्र शासित प्रदेशों और पहाड़ी क्षेत्रों के शहरों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बसों के संचालन के साथ-साथ इस योजना में शहरों के भीतर डिपो बुनियादी ढांचे के विकास और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे सब-स्टेशन और चार्जिंग स्टेशन) के निर्माण को भी शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त, योजना के दूसरे हिस्से के रूप में 'ग्रीन अर्बन मोबिलिटी इनिशिएटिव' के तहत बस रैपिड ट्रांजिट (BRT) परियोजनाओं और डिजिटल टिकटिंग प्रणालियों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव
यह योजना भारत के 'नेट-जीरो' (Net-Zero) कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। 10,000 इलेक्ट्रिक बसों के सड़कों पर आने से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी और बड़े शहरों में पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे हानिकारक कणों के स्तर में भारी गिरावट आएगी। सामाजिक दृष्टिकोण से, यह योजना शहरी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा करेगी, विशेषकर ई-बसों के विनिर्माण, चार्जिंग स्टेशनों के प्रबंधन और तकनीकी रखरखाव के क्षेत्र में। साथ ही, यह आम नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सुरक्षित और सस्ती यात्रा सुनिश्चित करेगी।
परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रश्न 1 (UPSC मुख्य परीक्षा के लिए):
"पीपीपी मॉडल पर आधारित 'पीएम-ईबस सेवा' योजना देश के शहरी सार्वजनिक परिवहन में मौजूद कमियों को दूर करने के साथ-साथ भारत के जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में कैसे सहायक है? चर्चा कीजिए।"
प्रश्न 2 (प्रारंभिक परीक्षा / SSC के लिए MCQ):
हाल ही में चर्चा में रही 'पीएम-ईबस सेवा' योजना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसे पूर्ण रूप से केंद्र सरकार द्वारा शत-प्रतिशत वित्तीय सहायता से संचालित किया जा रहा है।
2. इसका कार्यान्वयन सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत किया जा रहा है।
उपरोक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (B) केवल 2

सिंधु जल संधि: भारत द्वारा छह दशक पुराने समझौते की समीक्षा की मांग
भारत ने पाकिस्तान को नोटिस जारी कर वर्ष 1960 की 'सिंधु जल संधि' (Indus Waters Treaty - IWT) की समीक्षा और उसमें संशोधन करने की मांग की है। भारत का रुख है कि पिछले छह दशकों में जनसंख्या वृद्धि, जलवायु परिवर्तन और नई पर्यावरणीय चुनौतियों के कारण जल उपयोग की परिस्थितियों में व्यापक बदलाव आया है। इसके अतिरिक्त, सीमा पार आतंकवाद की निरंतरता ने भी इस रणनीतिक कदम को प्रेरित किया है। यह द्विपक्षीय विकास आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और जल कूटनीति (Water Diplomacy) खंड के अंतर्गत अत्यंत महत्वपूर्ण है।
खबर का निचोड़
भारत ने पाकिस्तान को नोटिस जारी कर वर्ष 1960 की 'सिंधु जल संधि' (Indus Waters Treaty - IWT) की समीक्षा और उसमें संशोधन करने की मांग की है। भारत का रुख है कि पिछले छह दशकों में जनसंख्या वृद्धि, जलवायु परिवर्तन और नई पर्यावरणीय चुनौतियों के कारण जल उपयोग की परिस्थितियों में व्यापक बदलाव आया है। इसके अतिरिक्त, सीमा पार आतंकवाद की निरंतरता ने भी इस रणनीतिक कदम को प्रेरित किया है। यह द्विपक्षीय विकास आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और जल कूटनीति (Water Diplomacy) खंड के अंतर्गत अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सिंधु जल संधि में संशोधन की आवश्यकता
भारत और पाकिस्तान के बीच सितंबर 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि को दुनिया के सबसे सफल जल-साझाकरण समझौतों में से एक माना जाता रहा है। विश्व बैंक की मध्यस्थता से बनी इस संधि ने कई युद्धों के बावजूद दोनों देशों के बीच पानी के प्रवाह को निर्बाध बनाए रखा। हालांकि, वर्तमान भू-राजनीतिक और पर्यावरणीय परिदृश्य को देखते हुए भारत ने इसमें औपचारिक बदलाव की प्रक्रिया शुरू की है। संधि के अनुच्छेद 12(4) के तहत भारत ने पाकिस्तान को अपनी चिंताओं से अवगत कराया है, जिसका उद्देश्य इस व्यवस्था को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप ढालना है।
भौगोलिक विभाजन और तकनीकी विवाद
मूल संधि के प्रावधानों के अनुसार, सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों को दो हिस्सों में विभाजित किया गया था। तीन पूर्वी नदियों (सतलुज, ब्यास और रावी) के पानी पर भारत को पूर्ण नियंत्रण दिया गया, जबकि तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चेनाब) का अधिकांश पानी पाकिस्तान को आवंटित किया गया। भारत को पश्चिमी नदियों पर केवल 'रन-ऑफ-द-रिवर' (बिना पानी रोके) जलविद्युत परियोजनाएं बनाने का सीमित अधिकार मिला। हाल के वर्षों में, भारत की 'किशनगंगा' (330 मेगावाट) और 'रतले' (850 मेगावाट) जलविद्युत परियोजनाओं के तकनीकी डिजाइन को लेकर पाकिस्तान द्वारा लगातार वैश्विक मंचों पर आपत्तियां उठाई गई हैं, जिससे भारत की बुनियादी ढांचा परियोजनाएं बाधित हुई हैं।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियां
पिछले 65 वर्षों में हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिकी में गंभीर बदलाव आए हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों में पानी का प्रवाह अनिश्चित हो गया है। कभी अत्यधिक बाढ़ तो कभी सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है। भारत का तर्क है कि 1960 की संधि में पर्यावरण संरक्षण, गाद प्रबंधन (Silt Management) और जलवायु लचीलेपन (Climate Resilience) जैसे आधुनिक और वैज्ञानिक विषयों को शामिल नहीं किया गया था। भारत इन नई चुनौतियों से निपटने के लिए संधि के तकनीकी मानदंडों और विवाद समाधान तंत्र का पुनर्मूल्यांकन करना चाहता है।
कूटनीतिक रुख और भविष्य की रणनीति
इस समीक्षा मांग के पीछे भारत का एक स्पष्ट संदेश यह भी है कि स्थायी द्विपक्षीय सहयोग के लिए एक अनुकूल और आतंक-मुक्त वातावरण का होना अनिवार्य है। भारत अब पानी के अधिकार और अपनी ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े हितों पर कोई समझौता नहीं करना चाहता। पाकिस्तान को भेजे गए इस नोटिस के माध्यम से भारत ने बातचीत के लिए 90 दिनों का समय निर्धारित किया है, ताकि दोनों पक्ष मिलकर संधि के अंतर्निहित प्रावधानों को नए सिरे से परिभाषित कर सकें। यदि पाकिस्तान इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं देता है, तो भारत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के अगले चरणों पर विचार कर सकता है।
परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रश्न 1 (UPSC मुख्य परीक्षा के लिए):
"बदलते जलवायु परिदृश्य और क्षेत्रीय भू-राजनीति के बीच, 1960 की सिंधु जल संधि को नए सिरे से परिभाषित करना भारत की जल सुरक्षा और कूटनीतिक हितों के लिए क्यों आवश्यक हो गया है? विश्लेषण कीजिए।"
प्रश्न 2 (प्रारंभिक परीक्षा / SSC के लिए MCQ):
सिंधु जल संधि (1960) के प्रावधानों के तहत, निम्नलिखित में से कौन सी नदियां भारत के पूर्ण नियंत्रण (पूर्वी नदियां) के अंतर्गत आती हैं?
(A) सिंधु, झेलम और चेनाब
(B) सतलुज, ब्यास और रावी
(C) रावी, चेनाब और झेलम
(D) सिंधु, ब्यास और सतलुज
उत्तर: (B) सतलुज, ब्यास और रावी
PAWAN PANGHAL
Founder & Editor-in-Chief
B.sc , M.A ( Hindi Literature ) , PGDT